एक गधा उत्तर प्रदेश में

Updated at : 03 Mar 2017 6:36 AM (IST)
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एक गधा उत्तर प्रदेश में

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार कृष्ण चंदर के पास एक गधा था, जिसकी आत्मकथा, वापसी और नेफा का यात्रा-वृत्तांत लिख कर वे प्रसिद्ध हो गये थे. इससे पता चलता है कि कि प्रसिद्ध होने के लिए आदमी के पास एक अदद गधा होना जरूरी है, फिर चाहे वह किसी भी रूप में हो. किसी के […]

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डॉ सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

कृष्ण चंदर के पास एक गधा था, जिसकी आत्मकथा, वापसी और नेफा का यात्रा-वृत्तांत लिख कर वे प्रसिद्ध हो गये थे. इससे पता चलता है कि कि प्रसिद्ध होने के लिए आदमी के पास एक अदद गधा होना जरूरी है, फिर चाहे वह किसी भी रूप में हो. किसी के चेहरे को देख कर गलतफहमी का शिकार होने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि बहुत-से गधे आदमी जैसे भी दिखते हैं.

उलटे, उस विद्वान कवि का अनुसरण करना चाहिए, जिसने कहा है कि ‘दिल को देखो, चेहरा न देखो, इस चेहरे ने लाखों को लूटा’, क्योंकि उस कवि की ही तरह अक्सर गधे की तलाश में निकला आदमी चेहरे की वजह से गधे को आदमी समझ कर छोड़ जाता है और अपना काम बिगाड़ लेता है.

लेखन हो या राजनीति या कोई भी अन्य क्षेत्र, बिना गधे के बहुत आगे तक नहीं जाया जा सकता.

नासमझ लेखक लिखते-लिखते मर जाता है, पर कहीं नहीं पहुंचता, जबकि समझदार लेखक अपने गधों के बल पर कहीं-का-कहीं पहुंच जाता है. मरने के बाद भले ही गाय वैतरणी पार कराने में सहायक होती हो, लेकिन जीते-जी तो गधा ही भवसागर पार कराता है. ‘जिन खोजा तिन पाइयां’ के अनुसार शिद्दत से गधे की खोज करनेवाले को गधा मिल भी जाता है. ऐसे बड़े खोजी को ही शायद खोजा कह कर पुकारा जाता है, जैसे कि खोजा नसीरुद्दीन. वैसे काफी गधे खुद भी अपने खोजी से मिलने की जुगत में रहते हैं और कोई उपयुक्त-सा खोजी मिलते ही घोषित कर देते हैं कि हम तुम्हारे लिए, तुम हमारे लिए, फिर जमाने का क्या है, हमारा न हो!

बचपन में मैं जब गांव में पढ़ता था, तो हमारे गुरुजी यह कह कर हमें पीटा, मतलब पढ़ाया करते थे कि मैंने कितने ही गधों को कलट्टर बना दिया है! यह सुन कर एक कुम्हार रोजाना अपने गधे को लेकर हमारे गुरुजी के पास आने लगा था और उनसे निवेदन करने लगा था कि मेहरबानी करके मेरे इस गधे को भी कलट्टर बना दें, तो इसके साथ-साथ मेरी जिंदगी भी सुधर जाये. उसके बहुत जोर देने पर गुरुजी ने उसके गधे को भी हम सबके साथ कलट्टर बनाने के लिए रख लिया था. मौका मिलने पर उन्होंने शायद उसे बेच-बाच दिया, क्योंकि बाद में वह हमें दिखना बंद हो गया. कुम्हार के पूछने पर उन्होंने उसे समझा दिया कि तुम्हारा गधा कलट्टर बन गया है और अब कलक्ट्रेट में ही मिलेगा.

सुनते हैं कि कुम्हार इस बात को सच मान कर कलक्ट्रेट जा पहुंचा और कलक्टर साहब को अपना गधा बताते हुए उनसे मिलने की कोशिश करने लगा. कलक्टर साहब द्वारा कोई आत्मीयता न दिखाने पर एक दिन उसने उन्हें घास दिखा कर ललचाने की भी कोशिश की, पर कामयाब नहीं हुआ. कलक्टर द्वारा उसकी इस हरकत पर उसे दो-चार लातें जड़ देने पर तो उसे पक्का यकीन हो गया कि बेशक यह उसका गधा ही है. बड़ी निराशा के साथ लौट कर उसने गुरुजी को बताया कि आपने तो मेरे गधे को कलट्टर बना दिया, पर बड़ा आदमी बन जाने के बाद उसने मुझे पहचानना छोड़ दिया है, अलबत्ता उसकी दुलत्ती झाड़ने की आदत वैसी की वैसी है.

इधर जब से प्रधानमंत्री ने गधों से प्रेरणा लेकर खुद भी उनकी तरह ही कठिन परिश्रम करने की बात कही है और अपने हार्ड वर्क को हार्वर्ड पर भारी बताते हुए शिक्षा को निरर्थक करार दिया है, तब से कृष्ण चंदर का गधा यूपी में हो रहे चुनावों में अपनी अहमियत दिखाने में लगा है. गधों से प्रेरित लोगों के उच्च पदों पर पहुंच जाने के बाद भविष्य में खुद गधों के भी उन पदों पर विराजमान होने का मार्ग प्रशस्त हो गया है.

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