वोटर तो अंगरेजी वाला फूल है

।। कमलेश सिंह ।। (इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक) आदमी क्या है? इस फलसफे की डोर को बहुतों ने सुलझाने की तमाम कोशिश की. उलझ कर रह गये. सिरा मिला नहीं. संस्कृत के वैज्ञानिक भाषा होने का फायदा यह है कि आप मूल में जा सकते हैं, मतलब निकाल सकते हैं. व्यक्ति व्यक्त […]
।। कमलेश सिंह ।।
(इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक)
आदमी क्या है? इस फलसफे की डोर को बहुतों ने सुलझाने की तमाम कोशिश की. उलझ कर रह गये. सिरा मिला नहीं. संस्कृत के वैज्ञानिक भाषा होने का फायदा यह है कि आप मूल में जा सकते हैं, मतलब निकाल सकते हैं. व्यक्ति व्यक्त होने की क्रिया है या भाव है. व्यक्ति वह है जो व्यक्त है. वह जो व्यक्त करे, वह अभिव्यक्ति. जो बोले वह वक्तव्य. मोटा-मोटी आप वही हैं, जो आप कहते हैं. बोल में मोल है, तो आप अनमोल हैं. बोल में झोल है, तो आप महाझोल हैं. कल जो आप बोल रहे थे, वही थे आप.
डीएमके के करुणानिधि जो मोदी को जयललिता से मित्रता के लिए काला चश्मा पहन कर कोसते थे, अभी मोदी की मुहब्बत की कसमें खा रहे हैं. जया तीसरे मोरचे में गयी हैं, तो मोदी के मोरचे में अपनी जगह बना रहे हैं. कल तक जिसे डंडे से भी नहीं छूने की प्रतिज्ञा की थी, उसके झंडे से लिपट कर चिल्ला रहे हैं. जगदंबिका पाल भी भाजपा में जा रहे हैं. कल कुछ और व्यक्त कर रहे थे. आज कुछ और व्यक्त कर रहे हैं. कल कोई और व्यक्ति थे, आज कोई और व्यक्ति हैं. यूपीए वाले राम विलास एनडीए वाले पासवान से अलग थे. उन्हें कल तक जिस बू से परेशानी थी, आज उस की खुशबू में नहा के निकले हैं. नये हो गये हैं. इस बिल्कुल नये व्यक्ति का स्वागत कीजिये.
यूपीए में पुराने हो गये थे. लालू जी लालटेन की रोशनी देते थे, मगर लालटेन नहीं. जब से बिजली गयी है, तब से एक ही सहारा है. नीतीशजी ने लालूजी के घर में शार्ट-सर्किट करने की कोशिश की. फेल हो गये. लालटेन में शार्ट-सर्किट नहीं होता. जदयू की जद में ना आ जाये, अंधड़ में लालटेन भकभकाके बुझ ना जाये, इसलिए लालूजी और सारा परिवार लालटेन को घेर के बैठ गये. आंधी के जाने का इंतजार किया. बुझने ना दिया. तेल कम ही सही, पर पेंदी से जो जमीन पर तेरह बूंद टपक गया था, उसमें से नौ वापस सोख के लालटेन में गारे हैं. चार बूंद निकला भी तो जमीन ही सोख लेगा. मद्धम ही सही, जब तक तेल है, इस दिये में दम है. पर इस मद्धम लालटेन से दो घरों को रोशन करना लालूजी के हाथ में नहीं था. एक हाथ राहुलजी के हाथ में था, दूसरे से गमछा पकड़ लालटेन बचायें या पासवान कुनबे के ‘घर’ में दीया दिखायें.
पिछले चुनाव के बहाव में जब पासवानजी की लुटिया लुढ़क गयी, तो लालूजी उन्हें बचा कर दिल्ली तक लाये थे. पासवान और लालू में जैसा समीकरण था, चिराग और तेजस्वी में वैसा ही होता क्या? तेजस्वी का लालटेन जलेगा, तो चिराग बेचारा क्या करेगा. और अगर लालटेन बुझ गया, तो चिराग को खुद जलना पड़ेगा रोशनी के लिए. उधार की रोशनी पर कब तक रह सकते हैं आप.
चिराग तो चिराग, राम विलास तक उदास थे. उधार की यह रोशनी जब टिमटिमाने लगी, तो पासवान को पुराना गाना याद आया: कोई चिराग जलाओ बहुत अंधेरा है. लालटेन किरासन तेल से जल जाता है, चिराग को तो घी चाहिए. दाग लगी तो दामन छोड़ा था, पकड़ लेंगे तो हम धो देंगे. तुम मुङो घी दो, हम तुम्हें लेजिटिमेसी देंगे. गुजरात से अमूल का घी मंगवाया गया. चिराग जला तो घर केसरिया रोशनी में दमक उठा है. बेटे ने योजना पर अमल कर दिया, अपने कर कमल से सब कमल कर दिया.
बीजेपी गा रही है घर आया मेरा परदेसी, प्यास बुझी मेरे आंगन की. राजनाथ के आलिंगन में पासवान ने वही कहा कि पहले भी कह चुके हैं, इस भगवे दिल में पहले भी रह चुके हैं. अब जब बाहों में झूल चुके हैं, कल के कटु शब्द सभी भूल चुके हैं. सुबह का भूला शाम को लौट आये, तो उसे भूला नहीं कहते. बिहार भाजपा के कई लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि सुबह का भूला शाम को घर आता क्यों है. वह इसलिए कि भैया सुबह का भूला भूला भले हो, भोला नहीं होता. दिन भर सूरज रहता है, भान रहता है, दृष्टि रहती है, ज्ञान रहता है. शाम ढले तो अंधेरे का डर सताता है, आदमी वापस लौट आता है.
रात आयी तो वो जिनके घर थे, वो घर को गये सो गये. रात आयी, तो तिवारी बाबा जैसे लोग निकले राहों में और खो गये. इनका अपना घर नहीं है. जहां धर, वहीं घर. ये पतंगे हैं. लैम्पपोस्ट के नीचे हो, या लालटेन के इर्द-गिर्द. रोशनी होगी तो चले आयेंगे. शिवानंद तिवारी सुबह के भूले नहीं हैं. ये हर उस भूल के फूल हैं, जो दूसरे करते हैं. कमल भी एक फूल है. जनता की आंखों में धूल है. वोटर तो अंगरेजी वाला फूल है. उसके फ में नुक्ता है. देखिए, इस बार उसके आंगन में क्या उगता है.
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