काव्यमंच के गीत-सूर्य गोपाल सिंह नेपाली

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।। (वरिष्ठ साहित्यकार) जिंदगी भर मुझे इस बात का बहुत पछतावा रहेगा कि मैं अपने समय के गीत-सूर्य गोपाल सिंह नेपाली जी से कभी मिल नहीं पाया. उनको पढ़ा़ तो बहुत, मगर अपने कानों से उन्हें कभी सुन नहीं सका. इसके बावजूद वे मेरे साथ-साथ ही नहीं, बल्कि आगे-आगे चलते रहे हैं, […]
।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।
(वरिष्ठ साहित्यकार)
जिंदगी भर मुझे इस बात का बहुत पछतावा रहेगा कि मैं अपने समय के गीत-सूर्य गोपाल सिंह नेपाली जी से कभी मिल नहीं पाया. उनको पढ़ा़ तो बहुत, मगर अपने कानों से उन्हें कभी सुन नहीं सका. इसके बावजूद वे मेरे साथ-साथ ही नहीं, बल्कि आगे-आगे चलते रहे हैं, कभी मंच-कथाओं में, कभी गीत-प्रसंगों में तो कभी अग्रजन्मा साहित्यकारों के संस्मरणों में. वे उत्तरी बिहार के बेतिया कस्बे में अत्यंत विषम परिस्थिति में पले-बढ़े, ऐसी कहानियां मुङो बेतिया के उन बुजुर्ग साहित्यकारों के मुंह से सुनने को मिलीं, जो बहुत करीब से नेपाली जी को जानते थे.
उनके पुराने घर को देखने की उत्कंठा मुङो कई बार बेतिया खींच कर ले गयी, मगर उन भौतिक अवशेषों से मैं नेपाली जी के सारस्वत वैभव का तारतम्य नहीं बैठा पाया. आर्थिक दृष्टि से अकिंचन परिवार में जन्म लेने के कारण वे कक्षा पांच तक ही पढ़ पाये थे, यह तो सभी ने बताया, मगर यह कोई नहीं बता सका कि शब्दों को गीत की पंक्तियों में ढालने की कला उन्हें किस गुरु ने सिखायी थी या जीवन के गहरे निहितार्थो को सरल शब्दों में व्यक्त करने की महारत उन्हें कैसे हासिल हुई. नेपाली जी ने विद्यापति को, सूर-तुलसी-कबीर को जरूर पढ़ा होगा, सुना और गुना होगा. चमत्कार है कि उन्होंने न अ™ोय को पढ़ा, न मुक्तिबोध को, न त्रिलोचन को न धूमिल को, फिर भी हिंदी के असली जनकवि पद के दावेदार बन गये. उनकी अभिव्यक्ति की सादगी में जबर्दस्त संप्रेषणीयता थी, जिसे पाना आज के चर्चित परजीवी कवियों के लिए असंभव है.
हिंदी में जिसे पड़ोसी भी घास नहीं डालता,उसके गले भी जनकवि का नकली तमगा लटका दिया जाता है. गीत विधा में नेपाली के जनकवित्व से बच्चन जी ने भरपूर प्रेरणा ली,नीरज जी ने तमाम पंक्तियाँ ग्रहण कीं और रामावतार त्यागी,रमानाथ अवस्थी, भारत भूषण जैसे गीतकारों ने सीधे-सरल शब्दों में अकथ कहने की भंगिमा प्राप्त की. नेपाली ने हिन्दी काव्य-मंच को पहली बार गीत का ग्लैमर दिया.वह ग्लैमर ,जिसे बाद में हास्य कवियों ने अच्छी तरह भुनाया. वह गीत का ग्लैमर ही था,जिसने सामान्य जन को टिकट लेकर कवि सम्मेलन सुनने के लिए बाध्य किया,और जिसने सामान्य जन में काव्यप्रेमियों की सेना तैयार की.हिन्दी कविसम्मेलनों की ओर श्रोताओं की भीड़ पहली बार नेपाली के गीतों को सुनने उमड़ी थी.उन दिनों ज्यादातर ब्रज-काव्य प्रभावित समस्या-पूर्ति होती थी,या ह्यभारत भारती जैसी राष्ट्रिय धारा की कविताओं का प्रवाह या फिर ह्यरंग जैसी हिन्दी गजलों की बहार.मगर नेपाली के गीत सच्चे अर्थों में सूनामी थे.उनके गीत सुनने के लिए लोग घर की छप्परों पर और पेड़ की डालों पर बैठकर घंटों इन्तजार करते थे.और घंटों उन्हें सुनने के बाद नेपाली के लहजे में ही गुनगुनाते हुए घर लौटते थे और बरसों गुनगुनाते रहते थे.अपने इसी धन पर इतराकर तो नेपाली जी ने कह ही दिया: मेरा धन है स्वाधीन कलम.
उनके समय में ही हिन्दी का आलोचक अपनी जमीन छोड़कर आड़े-तिरछे चलने लगा था. अपने लाखो-लाख काव्यप्रेमियों के समर्थन से गर्वित नेपाली ने इसी कविता में आलोचकों को उसी तरह ललकारा था,जैसे श्रीकृष्ण की साड़ी से वेष्टित द्रौपदी ने बीच कौरव-सभा में ललकारा था:
ओ आलोचक, विष घोल नहीं; साहित्य समझ, सुन, बोल नहीं।
रंगरूटों से कह दे कोई; मंदिर में पीटे ढोल नहीं।।
तू दलबंदी पर मरे; यहां लिखने में है तल्लीन कलम. नेपाली जी ने हिंदी गीतों की भविष्य में होनेवाली अवहेलना को शायद भांप लिया था. वे अपने दो अन्य समानधर्मा गीतकार बच्चन और नीरज की तुलना में कम वय लेकर आये थे, मगर मात्र 52 वर्षो के जीवन को उन्होंने काव्य-जगत में शाहंशाह की तरह जिया. यहां तक कि 1962 के चीनी हमले के दौरान जब नेपाली जी अपने ‘चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा’ जैसे गीत लेकर गांव-गांव नगर-नगर घूम कर राष्ट्रीय चेतना की अलख जगाने लगे, तब रेडियो पीकिंग ने उनके खिलाफ एक तरह से मोरचा ही खोल दिया था. उसके हिंदी और अंगरेजी बुलेटिनों में गोपाल सिंह नेपाली के गीत ‘चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा’ और पटना रेडियो से प्रसारित रामेश्वर सिंह कश्यप के रेडियो नाटक ‘लोहा सिंह का नया मोर्चा’ को जम कर कोसा जाता था. देश के कर्णधारों की अदूरदर्शिता के कारण सीमा पर भारतीय सेना भले पीछे हट रही थी, मगर भारतीय जनता का मनोबल नेपाली और दिनकर जैसे कवियों के हाथों बुलंदी पर था. जागरण गीत गानेवाले नेपाली जी और दिनकर जी साहित्य में किनारे कर दिये गये, यह बड़े दुर्भाग्य की बात है.
नेपाली जी का जन्म 11 अगस्त, 1911 को बेतिया जिला चंपारन (बिहार) में क्षत्रिय परिवार में हुआ था. पिता आरबी सिंह भारतीय सेना के जवान थे. उसी साल ब्रिटिश हुकूमत भारत की राजधानी को कलकत्ता से नयी दिल्ली उठा लायी थी. पिता ने बेटे का नाम गोपाल बहादुर सिंह रखा. बेतिया में ही उनकी प्रवेशिका (पांचवीं कक्षा) तक पढ़ाई हुई. चंपारण्य की नैसर्गिक सुषमा ने संवेदनशील बालक को अपनी ओर खींचा. वे घंटों किसी टीले पर, किसी बागीचे में बैठ कर प्रकृति को निहारा करते थे. सौंदर्य को इस प्रकार निहारना ही बाद में उनके लिए बला हो गयी..
दूर जाकर न कोई बिसारा करे।
मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।।
उनकी कद-काठी सामान्य ही थी. बड़ा-सा प्रभावशाली चेहरा और उस पर घुंघराले बाल. उनकी आवाज काफी दमदार थी और अपने लंबे-लंबे गीतों को घंटों सुनाने का उनमें दम-खम भी भरपूर था. उनके गीत मुख्यत: प्रेम-श्रृंगार, शौर्य, प्रकृति चित्रण परक, विद्रूप व्यवस्था के विरुद्ध और सामान्य-जन में जीवन के प्रति आस्था जगानेवाले होते थे. उनके पांच गीत-संग्रह निकले थे, मगर सब के सब अनुपलब्ध हो गये थे. उनके जन्मशती वर्ष में ‘कविवर नेपाली फाउंडेशन, बेतिया, पश्चिमी चंपारण’ संस्था की सचिव डॉ सविता नेपाली ने ‘गोपाल सिंह नेपाली समग्र’ ग्रंथ निकाल कर उनके गीतों को असमय लुप्त होने से बचा लिया. इसके लिए वे नेपालीजी के असंख्य गीत-प्रेमियों के धन्यवाद की पात्र हैं. यह श्वेत-श्याम चित्र नेपालीजी ने अपने प्रिय हास्यकवि ‘सूंड़’ फैजाबादी को दिया था, जिसे मैंने 1972 में उनके एलबम से निकाल लिया था, यह सोच कर कि नेपालीजी पर पहला अधिकार मेरा है.
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