महिलाएं क्यों नहीं होतीं घुमक्कड़?

।। रूपम ।। (प्रभात खबर, रांची) घूमने का अर्थ है ज्ञान. घूमने का अर्थ है अनुभवों का विस्तार, आजादी, अपने दिलो-दिमाग और शरीर पर अपना हक. घूमने के बहुत सारे अर्थ हैं और इन सारे अर्थो से समूचे इतिहास में स्त्रियों का जीवन हमेशा कटा रहा. आज भी सार्वजनिक जगहों पर वास्तविक कब्जा पुरुषों का […]
।। रूपम ।।
(प्रभात खबर, रांची)
घूमने का अर्थ है ज्ञान. घूमने का अर्थ है अनुभवों का विस्तार, आजादी, अपने दिलो-दिमाग और शरीर पर अपना हक. घूमने के बहुत सारे अर्थ हैं और इन सारे अर्थो से समूचे इतिहास में स्त्रियों का जीवन हमेशा कटा रहा. आज भी सार्वजनिक जगहों पर वास्तविक कब्जा पुरुषों का ही है. महिलाएं आज भी बेवजह, बेसबब सड़कों पर नजर नहीं आतीं.
चौराहे पर चाय के अड्डे से लेकर बड़ी-बड़ी गोष्ठियों तक में पुरुष ही काबिज हैं. मानो देश, समाज, आपदा-विपदा से महिलाओं का कोई लेना-देना ही न हो. जबकि हर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संकट की सबसे ज्यादा मार औरतों को ही ङोलनी पड़ती है, चाहे वह महंगाई हो या फिर दंगे व युद्ध. शहरों में बैठकबाजी तथा घूमने-फिरने के नये-नये ठिकाने बन रहे हैं, पर एक सांस्कृतिक रुकावट है, सामाजिक भय है, जो इन स्थानों को महिलाओं का नहीं होने देता. वे रविवार को या किसी छुट्टी पर रिश्तेदारों और परिचितों के आने पर ही शहर का मुंह देख पाती हैं.
उनके घूमने के लिए लक्ष्मण रेखा खिंची हुई है. वक्त तय है. जगहें तय हैं. उन्हें स्कूल से बच्चों को लाते, ले जाते और घर का सामान लाते ही देखा जाता है. शहर में उनके लिए कहीं बेफिक्री नहीं है. हर जगह घूरती मर्दो की नजरें हैं, जो उनसे उनके वहां होने का कारण पूछती हैं. जैसे उनकी रियासत में कोई घुस रहा हो. घरेलू महिलाएं ऐसे तरीके खोजती हैं, जिनसे वे ज्यादा समय बाहर बिता पायें और खुद को समाज से जोड़ सकें . मंदिर में कीर्तन और बाबा का सत्संग भी कुछ ऐसे ही बहाने हैं. एक साथ बड़ी संख्या में सड़क पर तभी चलती दिखेंगी, जब धार्मिक झांकी या कलश यात्र जैसा कोई आयोजन हो.
ऐसे धार्मिक आयोजनों में बाहर जाने के लिए उनका परिवार रोकने के बजाय प्रोत्साहित ही करता है, क्योंकि धर्म उन्हें पुरुषवादी मर्यादाओं और नैतिकताओं से लैस करता है. स्कूल-कॉलेज जानेवाली, नौकरी करनेवाली लड़कियों-महिलाओं की स्थिति इस मायने में थोड़ी बेहतर कही जा सकती है कि उन्हें बाहर जाने के लिए उत्सवों, धार्मिक आयोजनों और खरीदारी के बहानों की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि घर से बाहर जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा होता है. एक नवजात बच्चे को लगता है कि मां की गोद ही उसका पूरा संसार है, लेकिन फिर जब वह गोद से उतर कर घर में चलने-फिरने लगता है, तो उसे भी यह शीघ्र मालूम हो जाता है कि मां का संसार सिर्फ दो-चार कमरों, रसोई, आंगन, बालकनी तक ही सिमटा हुआ है.
हां, कभी-कभी छत भी उसके हिस्से में आ जाती है. महिलाएं पहले भी पुरु षों की निजी संपत्ति थीं और आज भी हैं. पुरुष मानसिकता यही थी (जो अब भी है) कि अगर महिलाओं को देश-दुनिया की खोज करने के लिए मुक्त यात्र पर जाने दिया जायेगा, तो औरत के शरीर पर से मर्द का नियंत्रण खत्म हो जायेगा. इसलिए इतिहास में औरतें कभी घुमक्कड़ नहीं हुईं. न कोई कोलंबस, न ही कोई वास्को-डि-गामा.
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