पूरी व्यवस्था का आत्मसमर्पण!

राज्यसभा चुनाव (2012) में हुई खरीद-फरोख्त की आरोपी विधायक सीता सोरेन ने सीबीआइ की विशेष अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पहले उन्हें जेल भेजा गया. वहां से इलाज के लिए रिम्स. सीता सोरेन पर 1.5 करोड़ रुपये लेने का आरोप है. सीबीआइ उन्हें लंबे समय से खोज रही थी. कई बार छापामारी भी हुई, लेकिन […]
राज्यसभा चुनाव (2012) में हुई खरीद-फरोख्त की आरोपी विधायक सीता सोरेन ने सीबीआइ की विशेष अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पहले उन्हें जेल भेजा गया. वहां से इलाज के लिए रिम्स. सीता सोरेन पर 1.5 करोड़ रुपये लेने का आरोप है. सीबीआइ उन्हें लंबे समय से खोज रही थी. कई बार छापामारी भी हुई, लेकिन पकड़ में नहीं आयीं. वारंट जारी होने के एक साल तक पुलिस अगर किसी को गिरफ्तार नहीं कर सके, तो यह पुलिस विभाग और उसकी क्षमता पर सवाल खड़ा करता है.
इस तरह के वीआइपी आरोपी राज्य में ही रहते हैं, अपना सारा काम करते हैं, लेकिन पुलिस की पकड़ में नहीं आते. पुलिस सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनी रहती है. अगर किसी गरीब, असहाय व्यक्ति पर कोई मामला दर्ज होता है, तो पुलिस उसे 24 घंटे के अंदर खोज लेती है. लेकिन आरोपी ताकतवर राजनीतिज्ञ हो या बड़ा अधिकारी, तो पुलिस नाकाम हो जाती है. इसी से अंदाजा लग जाता है कि पुलिस कैसे काम करती है. सीता सोरेन के घर की जब कुर्की हुई, तब उन्हें सामने आना पड़ा. अगर अदालत का दबाव नहीं होता, तो शायद आत्मसमर्पण भी नहीं करतीं. ऐसा सिर्फ सीता सोरेन के मामले में नहीं है. सभी ताकतवर लोगों के प्रकरण में यही होता है, जबकि सिद्धांत रूप में कानून सबके लिए बराबर है.
अगर पुलिस ऐसे ही काम करती रही, तो लोगों का उस पर से भरोसा उठ जायेगा. यह भी देखना होगा कि ये सारे राजनीतिज्ञ साल भर ठीक रहते हैं, लेकिन जब जेल जाते हैं तो बीमार पड़ जाते हैं. फिर इलाज के नाम पर अस्पताल में भरती हो जाते हैं. जेल के माहौल और अस्पताल के कॉटेज के माहौल, दोनों में बहुत फर्क है. इसलिए बीमार पड़ना उनकी मजबूरी है. हो सकता है कि सीता सोरेन की तबीयत सच में खराब हो, पर इतिहास यही बताता है कि माननीयों को जेल से बेहतर रिम्स का कॉटेज लगता है. जेल के चिकित्सक अपना भार दूसरों पर लाद देते हैं और बेहतर इलाज के नाम पर बाहर भेज देते हैं. इसलिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि बहाना बना कर कोई इलाज के नाम पर बाहर न जा सके. हां, अगर वास्तव में बीमार हैं, तो हर कैदी या विचाराधीन कैदी को यह अधिकार है कि उसका बेहतर इलाज हो और इसका पालन होना ही चाहिए.
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