इजरायल : रंगभेद पर यूएन की मुहर

Published at :28 Feb 2014 4:59 AM (IST)
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इजरायल : रंगभेद पर यूएन की मुहर

।। सुभाष गाताडे।। (सामाजिक कार्यकर्ता) यहूदी मूल के अमेरिकी, कानून के प्रोफेसर रिचर्ड फॉक के नाम से दक्षिण एशिया के इस हिस्से से बहुत कम लोग परिचित होंगे. करीब छह साल तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से जुड़े फॉक फिलिस्तीनी इलाकों में मानवाधिकारों को लेकर उसके विशेष दूत रहे हैं. इन्होंने अपनी ताजा रिपोर्ट में, […]

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।। सुभाष गाताडे।।

(सामाजिक कार्यकर्ता)

यहूदी मूल के अमेरिकी, कानून के प्रोफेसर रिचर्ड फॉक के नाम से दक्षिण एशिया के इस हिस्से से बहुत कम लोग परिचित होंगे. करीब छह साल तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से जुड़े फॉक फिलिस्तीनी इलाकों में मानवाधिकारों को लेकर उसके विशेष दूत रहे हैं. इन्होंने अपनी ताजा रिपोर्ट में, जिसे आधिकारिक तौर पर अगले माह पेश किया जायेगा, इजरायल को लेकर जो बातें रखी हैं, उससे अभी से खलबली मचने की खबरें हैं. उनका कहना है- ‘लंबे समय तक जारी कब्जे और ऐसे व्यवहार एवं नीतियां, जो एक तरह से रंगभेद और अलगाव को पैदा करती हैं, से आबादी का अधीनीकरण और दीवार निर्माण के जरिये फिलिस्तीनी इलाकों पर वास्तविक नियंत्रण कायम किया जा रहा है.

इनके जरिये फिलिस्तीनी अवाम के आत्मनिर्णय के हक को इजरायल कुचल रहा है.’ रिपोर्ट में फॉक ने रेखांकित किया है कि फिलिस्तीनी इलाकों के इजरायली कब्जे के चलते और पूर्वी येरूशलम के नस्लीय शुद्धिकरण के माध्यम से फिलिस्तीनी अधिकारों का हनन जारी है. उनके मुताबिक ‘आवासीय परमिटों की समाप्ति, फिलिस्तीनी परिवारों की जबरन बेदखली व सुनियोजित विध्वंस ने एक तरह से नस्लीय शुद्धिकरण की नौकरशाहाना प्रक्रिया को बढ़ावा दिया है.’ रिचर्ड फॉक की यह मांग है कि विश्व अदालत को चाहिए कि क्या इजरायल को रंगभेद के अंतरराष्ट्रीय अपराधों और नस्लीय शुद्धिकरण का अपराधी माना जा सकता है या नहीं और उसने यूएन से यह मांग की है कि गैर-कानूनी इजरायली गतिविधियों से कौन निगम लाभान्वित हो रहे हैं. उनकी यह भी सिफारिश है कि यूएन के सदस्य देशों को चाहिए कि वे इजरायली आबादियों से उत्पाद के आयात पर पाबंदी लगा दें.

एक ऐसे वक्त में जब अपनी तमाम मानवद्रोही कार्रवाइयों के लिए इजरायल को विश्व-जनमत की कठोर आलोचना ङोलनी पड़ रही है, इजरायल द्वारा फिलिस्तीनी अवाम के साथ किये जा रहे व्यवहार को दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी हुकूमत द्वारा अश्वेतों के साथ किये गये व्यवहार के समकक्ष रखते हुए इजरायल के आर्थिक एवं सांस्कृतिक बहिष्कार के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरगरमी बढ़ रही है, उस वक्त आयी यह रिपोर्ट इजरायल पर दबाव बढ़ाने का काम कर सकती है. निश्चित ही यह पहली दफा नहीं है, जब इजरायल की हुकूमत को यूएन की संस्थाओं के हाथों आलोचना का शिकार न होना पड़ा हो. दस साल पहले इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने कहा गया था कि पश्चिमी तट के इलाके में इजरायल द्वारा निर्मित की जा रही दीवार गैर-कानूनी है.

इजरायली विकास का एक सूत्र फिलिस्तीन के मूल निवासियों को उनके इलाकों से खदेड़ने या उनके इलाकों में अपनी बस्तियां बसाने से भी जुड़ा है. तीस साल पहले जार्डन घाटी में लगभग दो लाख देशज फिलिस्तीनी रहते थे, बीते दिनों गांवों को ध्वस्त करके, तमाम इलाकों से उन्हें खदेड़ कर नस्लीय सफाये की जो मुहिम इजरायली सरकार ने चलायी है, उसके चलते वहां अब महज साठ हजार फिलिस्तीनी ही बचे हैं. वर्ष 1993 में जब इजरायल व फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन के बीच ओस्लो समझौता हुआ था, तबसे लेकर पश्चिमी तट पर इस्नयलियों की आबादी तीन गुनी हो चली है, जबकि समझौते में ऐसी बस्तियां कायम करने पर पाबंदी की बात कही गयी थी. इजरायली मानवाधिकार समूह बीटीसेलेम के मुताबिक इजरायली लोगों की बस्तियां आज की तारीख में 42 फीसदी पश्चिमी तट पर नियंत्रण रखती हैं.

याद रहे कि कुछ साल पहले दुबई जैसे मित्र देश में उसके द्वारा अंजाम दी गयी हमास के शीर्षस्थ नेताओं में से एक महमूद अल मबहूह की हत्या की कार्रवाई ने तो उसके लिए अभूतपूर्व संकट पैदा कर दिया था. जासूसी कहानियों के अंदाज में अंजाम दी गयी इस हत्या के बाद दुबई पुलिस ने मोसाद से जुड़े ग्यारह लोगों के हत्यारे दल के खिलाफ वारंट जारी किये थे, ताकि आनेवाले दिनों में इंटरपोल की तरफ से इन्हें पकड़ने के लिए रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो. मामला बाद में इस वजह से अधिक संगीन हो उठा, क्योंकि मोसाद के एजेंटों ने ब्रिटिश, आयरलैंड पासपोर्टधारक इजरायल के नागरिकों की पहचान चुरा ली थी.

इसे विचित्र संयोग कहा जा सकता है कि जिन दिनों इजरायल को बचाव का पैंतरा अख्तियार करना पड़ रहा है, यही वह कालखंड है जब भारत और इजरायल के बीच गहराते रिश्ते कायम हो रहे हैं. इजरायली हुकूमत के प्रति भारतीय शासकों के इस बढ़ते अनुराग का ही नतीजा है कि भारत के मीडिया में कहीं भी उस विस्फोटक तथ्य को सूचित तक नहीं किया गया कि इजरायल किस तरह मध्यपूर्व में ‘इसलामिक उग्रवादी’ गुटों को भी शह दे रहा है.

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