राजनीति के भंवर में बिहार की नैया

Published at :27 Feb 2014 5:28 AM (IST)
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राजनीति के भंवर में बिहार की नैया

।। रंजन कुमार सिंह।। (राजनीतिक विश्लेषक) सन् 2000 में बिहार विधानमंडल ने प्रांत के बंटवारे पर मुहर तो लगा दी, लेकिन उसके बाद बिहार के हिस्से में रोना और बिलखना आया. तब बिहार के दोनों सदनों में लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल का वर्चस्व था और उनके लिए राज्य की खुशहाली से बड़ी चिंता […]

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।। रंजन कुमार सिंह।।

(राजनीतिक विश्लेषक)

सन् 2000 में बिहार विधानमंडल ने प्रांत के बंटवारे पर मुहर तो लगा दी, लेकिन उसके बाद बिहार के हिस्से में रोना और बिलखना आया. तब बिहार के दोनों सदनों में लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल का वर्चस्व था और उनके लिए राज्य की खुशहाली से बड़ी चिंता अपना स्पष्ट बहुमत बना लेने की थी. 81 विधायकों के झारखंड विधानसभा में चले जाने के बाद लालूजी के राजद को बिहार विधानसभा में स्पष्ट बहुमत तो अवश्य मिल गया, पर बिहार के दुर्भाग्य की कहानी शुरू हो गयी. बेशक तब यह मजाक में कहा जाता रहा हो कि शेष बिहार में लालू, बालू और आलू ही बचे रह गये हैं, पर सच भी यही था कि साल-दर-साल बाढ़ की विभीषिका ङोलनेवाला बिहार अपनी अपरिमित खनिज संपदा से विहीन होकर बदहाली की कगार पर आ खड़ा हुआ था. जाहिर है कि तत्कालीन नेतृत्व ने अपने छोटे से स्वार्थ की सिद्घि के लिए पूरे प्रांत के भविष्य को दावं पर लगा दिया था. जो लालू प्रसाद कभी यह कहते थे कि बिहार का बंटवारा मेरी लाश पर होगा, उन्होंने ही उस बंटवारे को सहर्ष स्वीकृति दे दी. तब यदि उन्होंने दूरदृष्टि दिखायी होती और इस बंटवारे का तर्कसंगत ढंग से विरोध किया होता, तो क्या आज बिहार को अपने हक के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता? अब जबकि सीमांध्र ने लड़-झगड़ कर अपने लिए विशेष राज्य का दरजा पा लिया है, बिहार का दर्द एक बार फिर से हरा हो चला है.

अर्थशास्त्री आशीष बोस ने जिन चार राज्यों को बीमारू बताया था, उनमें पहला स्थान बिहार का था. बाद में ओड़िशा को भी इसमें शामिल कर लिया गया. हालांकि तब बिहार का विभाजन नहीं हुआ था और न ही बीमारू राज्यों में शामिल मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ही बांटे गये थे. आíथक रूप से बीमार इन राज्यों का इलाज इनके विभाजन में देखा गया और इसी तर्क पर इनका बंटवारा हुआ. बिहार से झारखंड के अलग हो जाने के बाद बिहार कहीं और भी बीमार हो गया. प्रांत के विभाजन को मंजूरी देते हुए तत्कालीन नेतृत्व ने लोगों को सब्जबाग दिखाया था कि शेष बिहार दूसरा हरियाणा बन जायेगा और नया झारखंड भारत का सिंगापुर, पर यह सब टांय-टांय फिस्स हो गया. बिहार औद्योगिक आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष जेजे ईरानी की रिपोर्ट ने जल्दी ही हमें हमारी औकात बता दी और सही तसवीर दिखाने के बाद पहली बार इस रिपोर्ट में बिहार के लिए विशेष दरजे की मांग के साथ ही झारखंड के लिए आíथक पैकेज की भी बात रखी गयी, पर केंद्रीय वित्त मंत्रलय ने बिहार को विशेष दरजा देने की इस मांग को सिरे से नकार दिया.

सच पूछिये तो शेष बिहार को विशेष राज्य का दरजा दिये जाने के सभी कारण शुरू से ही मौजूद थे. चूंकि खदान एवं खनिज के साथ-साथ वाणिज्यिक कर का एक बड़ा भाग विभाजन के बाद झारखंड में चला गया, बिहार को लगभग 1500 करोड़ रुपये का सालाना राजस्व घाटा हुआ था. जनसंख्या का बड़ा बोझ उस पर होने के बावजूद बिहार की राजस्व वसूली झारखंड की तुलना में 65 फीसदी ही रह गयी थी. झारखंड का राजस्व स्नेत जहां 2215 करोड़ रुपये था, वहीं बिहार मात्र 1984 करोड़ रुपये ही राजस्व के तौर पर उगाह सकता था. ऊपर से वह हर साल बाढ़ से भारी तबाही ङोलने के लिए बाध्य था. प्रांत विभाजन के बाद देश की कुल बाढ़पीड़ित जनसंख्या का 56.5 फीसदी हिस्सा बिहार में था. कुल मिला कर शेष बिहार अब और बीमार हो गया था, पर जब प्रांत ने ही अपने बंटवारे पर रजामंदी दिखा दी थी, तो फिर केंद्र को क्या पड़ी थी उसकी बिवाई पर मरहम लगाने की. वहीं जब बिहार का दुर्भाग्य रचा जा रहा था, तब लालू प्रसाद मिठाइयां बांट रहे थे, क्योंकि तब उन्हें वहां अपनी सरकार चलाने के लिए कांग्रेस का सहारा नहीं चाहिए था.

जो काम लालू सरकार को सन् 2000 में करना चाहिए था, वह काम नीतीश सरकार को 2005 में सत्ता में आने के बाद करना पड़ रहा है. तब वह काम आसान होता, जबकि आज यह कठिन होता गया है. फिर भी इस मुद्दे को लेकर नीतीश कुमार पटना से दिल्ली तक में रैलियों का आयोजन करते रहे हैं. उनकी पार्टी जनता दल (यू) ने लगभग सवा करोड़ लोगों के हस्ताक्षर के साथ केंद्र को इस बारे में ज्ञापन भी सौंपा. नीतीश कुमार ने तो यहां तक कह रखा है कि जो कोई भी इस मुद्दे को अपना समर्थन देगा और पिछड़े राज्यों की मदद करेगा, वही दिल्ली की गद्दी पर बैठेगा. आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उनकी यह घोषणा मायने रखती है. भाजपा से जद (यू) के संबंधों में खटास पड़ती देख कांग्रेस ने पिछड़े राज्यों को विशेष दरजा देने के लिए नये मानदंड निर्धारित करने की पेशकश तक कर डाली, जिससे बिहार जैसे राज्य को लाभ मिल सके. अब से पहले पहाड़ी राज्यों को ही विशेष दरजा हासिल था.

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने नीतीश कुमार पर डोरे डालते हुए कहा कि नये मानदंड तय होने के बाद बिहार को निश्चय ही विशेष राज्य का दरजा दिया जा सकेगा. आनन-फानन में भारत के तत्कालीन मुख्य आíथक सलाहकार रघुराम राजन के नेतृत्व में इसके लिए उपसमिति बना दी गयी, जिसे एक माह में ही अपनी रिपोर्ट देनी थी कि किन राज्यों को पिछड़ा मानते हुए विशेष दरजा दिया जा सकता है. विशेष दरजा मिलने का मतलब है उन राज्यों को केंद्र से ऋण एवं अन्य सहायता के साथ ही वहां उद्योग स्थापित करनेवालों को उत्पाद-कर आदि में छूट का मिलना. इसी बीच रघुराम राजन भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बना दिये गये, पर गत वर्ष सितंबर में अपनी रिपोर्ट उन्होंने केंद्र को सौंप भी दी. उन्होंने देश के 28 राज्यों को उनके विकास के हिसाब से तीन श्रेणियों में बांटा. पहली श्रेणी में वे राज्य थे, जो सबसे कम विकसित हैं. दूसरी श्रेणी उन राज्यों की थी जो कम विकसित हैं, जबकि तीसरी श्रेणी में उन राज्यों को रखा गया जो अपेक्षाकृत विकसित थे. गौरतलब है कि उन्होंने राज्यों को पिछड़ेपन से न जोड़ कर विकास से जोड़ा. बिहार के साथ-साथ ओड़िशा को भी उन्होंने सबसे कम विकसित प्रदेशों में माना.

अब जबकि लगने लगा था कि बिहार को अपना हक मिल सकेगा, तभी कांग्रेस ने फिर पलटी मारी. अब तक स्पष्ट हो चुका था कि जद (यू) किसी भी हाल में कांग्रेस के साथ नहीं जायेगा. जाहिर है कि जो मामला पूरी तरह से आíथक है, उसे राजनीतिक बना दिया गया है. अन्यथा जिस प्रांत को बीमारू से लेकर सबसे कम विकसित राज्यों में गिना जा रहा हो, उसे विशेष दरजा देने में हिचक क्यों होती? सीमांध्र को विशेष दरजा दिया जाना क्या इस बात की पुष्टि नहीं करता कि किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दरजा देना-न देना किसी आíथक-सामाजिक मानदंड पर आधारित नहीं होकर, केंद्र सरकार की मनमर्जी पर आश्रित है?

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