लोकतंत्र को ऐसे फरेब से बचायें

पैसे लेकर और फर्जी पहचान के जरिये सोशल मीडिया में प्रतिद्वंद्वियों की छवि बिगाड़नेवाली एजेंसियों की पोल खुले अभी कुछ ही दिन हुए हैं. अब एक न्यूज चैनल ने देश की 11 ओपिनियन पोल एजेंसियों के बारे में उजागर किया है कि वे राजनीतिक दलों से पैसे लेकर मनमाना सर्वेक्षण करती हैं, जो अखबारों और […]
पैसे लेकर और फर्जी पहचान के जरिये सोशल मीडिया में प्रतिद्वंद्वियों की छवि बिगाड़नेवाली एजेंसियों की पोल खुले अभी कुछ ही दिन हुए हैं. अब एक न्यूज चैनल ने देश की 11 ओपिनियन पोल एजेंसियों के बारे में उजागर किया है कि वे राजनीतिक दलों से पैसे लेकर मनमाना सर्वेक्षण करती हैं, जो अखबारों और टीवी चैनलों के द्वारा मतदाताओं तक पहुंचते हैं.
चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण चुनावी बहसों को प्रभावित करने के साथ जनता के एक हिस्से को भ्रमित करते हैं. हालांकि जनमानस में यह संदेह पहले से है कि ये सर्वेक्षण सतही और पूर्वाग्रह से भरे होते हैं तथा चैनलों-अखबारों के राजनीतिक और आर्थिक हित साधने का जरिया बनते हैं. राजनीतिक जागरूकता और चुनाव-सुधार प्रक्रिया के बावजूद यदि कुछ सर्वेक्षण एजेंसियां और उनकी सेवा लेनेवाले संस्थान ऐसे छल-कपट में लिप्त हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.
ऐसे सर्वेक्षणों पर न सिर्फ कड़ी निगरानी जरूरी है, बल्कि इन क्रियाकलापों को भी चुनाव आयोग के अधिकार-क्षेत्र में लाया जाना चाहिए, जैसा कि पेड न्यूज के मामले में किया गया है. किसी भी सर्वे के प्रकाशन-प्रसारण के साथ उसके तौर-तरीके और सर्वे में शामिल लोगों व क्षेत्रों की जानकारी का उल्लेख भी हो. देश की भौगोलिक एवं राजनीतिक विविधता के मद्देनजर किसी भी ओपिनियन पोल के लिए कार्यकर्ताओं की फौज और विश्लेषकों की बड़ी टीम होनी चाहिए, जबकि बहुत सी एजेंसियां महानगरों, राजधानियों और उनसे सटे इलाकों में कुछ लोगों से बात कर मनमाना निष्कर्ष पेश कर देती हैं.
सवाल सिर्फ राजनीतिक और व्यवस्थागत ही नहीं है. इस खुलासे में एजेंसियों के बड़े लोग जिस बेशर्मी और लापरवाही से लेन-देन और आंकड़ों में हेराफेरी की बात करते हैं, वह हमारे सार्वजनिक जीवन में आयी नैतिक गिरावट के स्तर को भी बताती है. धन-बल-छल की राजनीति इस देश को बहुत नुकसान पहुंचा चुकी है. बेहतर राजनीतिक विकल्पों की तलाश करती जनता को बरगलाने के लिए ओपिनियन पोल का इस्तेमाल शर्मनाक है. ऐसी एजेंसियों और इनकी सेवा लेनेवालों को आत्मावलोकन करने की जरूरत है. जनता के भरोसे के साथ खिलवाड़ करनेवालों पर सख्ती के साथ लोकतंत्र को ऐसे फरेब से बचाना जरूरी है.
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