तिब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया!

।। पुष्परंजन।। (ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक) परम पावन दलाई लामा तिब्बतियों के धर्मगुरु हैं, या वह अब भी अपने राजधर्म का पालन कर रहे हैं? इस प्रश्न पर विमर्श से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति निवास, ‘व्हाइट हाउस’ की प्रेस विज्ञप्ति को जरा पढ़ लेते हैं, जो 21 फरवरी, 2014 को जारी की गयी थी. […]
।। पुष्परंजन।।
(ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक)
परम पावन दलाई लामा तिब्बतियों के धर्मगुरु हैं, या वह अब भी अपने राजधर्म का पालन कर रहे हैं? इस प्रश्न पर विमर्श से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति निवास, ‘व्हाइट हाउस’ की प्रेस विज्ञप्ति को जरा पढ़ लेते हैं, जो 21 फरवरी, 2014 को जारी की गयी थी. बीते शुक्रवार की प्रेस विज्ञप्ति में लिखा है, ‘आज सुबह राष्ट्रपति और परम पावन दलाई लामा की भेंट हुई. तिब्बतियों के अद्भुत आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और भाषिक परंपरा को संरक्षित किये जाने के संकल्प को दोहराते हुए राष्ट्रपति ने इसका भरोसा दिया कि चीन में तिब्बतियों के मानवाधिकारों की रक्षा की जायेगी. राष्ट्रपति ने शांति और अहिंसा के पथ पर अग्रसर, परम पावन को सराहते हुए कहा कि उनके ‘मध्य मार्ग’ का हम समर्थन करते रहेंगे. राष्ट्रपति ने इस पर जोर दिया कि चीन और तिब्बतियों के बीच सीधी बातचीत से लंबे समय से जारी मतभेदों की समाप्ति होगी और इसका सकारात्मक परिणाम सामने आयेगा. इस संदर्भ में राष्ट्रपति ने अमेरिकी दृष्टिकोण को दोहराते हुए कहा कि तिब्बत, चीन का अभिन्न अंग है और अमेरिका तिब्बत की आजादी का समर्थन नहीं करता है. दलाई लामा ने बयान दिया कि वह तिब्बत की आजादी की मांग नहीं कर रहे, बल्कि वह आशा करते हैं कि उनके प्रतिनिधियों और चीन सरकार के बीच संवाद आरंभ होना चाहिए.’
पूरी विज्ञप्ति को गौर से पढ़िये, तो कहीं से नहीं लगेगा कि ओबामा और दलाई लामा के बीच धर्म से संबंधित कोई बातचीत हुई है. पूरी बातचीत का मयार राजनीतिक है. जैसा कि दलाई लामा ने कहा भी कि ‘उनके प्रतिनिधियों’ और चीन सरकार के बीच बातचीत होनी चाहिए.’ प्रश्न यह कि परम पावन के प्रतिनिधि कौन हैं? चीन से यदि तिब्बत की ‘निर्वासित सरकार’ का नुमाइंदा बात करता है, तो वह धार्मिक तो होगा नहीं. अस्तु, धर्म और राजनीति के घालमेल से बाहर निकलते हैं, और मुद्दे पर आते हैं. चौदहवें दलाई लामा को अब तिब्बत की आजादी नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा माहौल चाहिए, जिसमें तिब्बतियों के मानवाधिकार की रक्षा हो. पूरी दुनिया जानती है कि मार्च 1959 में ‘सीमित स्वायत्तता’ की मांग को लेकर दलाई लामा और उनके हजारों अनुयायी तिब्बत से नहीं चले थे. 2009 से अब तक 120 तिब्बती आत्मदाह कर चुके हैं. हजारों तिब्बती परिवार, आजादी की लड़ाई में बरबाद हो गये. यदि दलाई लामा को स्वतंत्र तिब्बत नहीं चाहिए, तो भारत में तिब्बतियों की निर्वासित सरकार को बनाये रखने का क्या तुक है? नाम भर की निर्वासित सरकार को दलाई लामा भंग क्यों नहीं कर देते? यह प्रश्न 55 साल बाद इसलिए पूछना पड़ रहा है, क्योंकि इसकी सबसे अधिक कीमत भारत की जनता को और यहां के करदाताओं को चुकानी पड़ी है.
देश में चुनाव और टिकट की अफरा-तफरी में लोगों को सोचने की फुरसत नहीं है कि क्यों 60-70 हजार तिब्बती भारतीय मतदाता सूची में शामिल किये जा रहे हैं. चुनाव आयोग ने सभी राज्यों को निर्देश भेजा है कि 26 जनवरी, 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मे तिब्बतियों को मतदाता सूची में शामिल करने में देर न करें. ऐसा पहली बार होगा जब बड़ी संख्या में तिब्बती भारत में मतदान करेंगे. तिब्बतियों को भारतीय मतदाता सूची में शामिल करने के आदेश के कई ‘साइड इफेक्ट’ आनेवाले दिनों में दिखेंगे. इसकी देखा-देखी ऐसी ही मांग 1971 के बाद भारत में जन्मे बांग्लादेशी, 1979 में सोवियत संघ के हमले के बाद अफगानिस्तान से आये 60 हजार शरणार्थी, श्रीलंकाई तमिल और म्यांमार से आये रोहिंग्या शरणार्थी भी कर सकते हैं.
सवाल यह है कि ‘तिब्बत की आजादी’ को पलटने के पीछे कौन सी ताकतें रही हैं? तिब्बत के सवाल पर सीआइए यदि ‘बैकफुट’ पर है, तो इसके पीछे कॉरपोरेट कूटनीति है. अमेरिका के कैंपहाले व कोलोराडो (जहां सीआइए ने तिब्बती गुरिल्लों को ट्रेनिंग दी थी) के लड़ाके अब इतिहास बन चुके हैं. उनके हिस्से बस 1959 से 1965 तक चले ‘खंफा युद्घ’ को याद करना भर रह गया है. शायद इसलिए, अमेरिका ने शरणार्थी तिब्बतियों को ‘चीनी नागरिक’ घोषित कर रखा है. अमेरिका ने करीब दस हजार तिब्बतियों को ‘आव्रजन कानून 1990’ के आधार पर ‘इमीग्रांट वीजा’ दे रखा है. लेकिन भारत, अपने बनाये नियम-कानून में खुद ही उलझता चला गया.
पिछले 55 वर्षो में दलाई लामा के डेढ़ लाख से अधिक अनुयायी तिब्बत से भारत आ चुके हैं. केंद्रीय तिब्बतन प्रशासन (सीटीआर) के अनुसार, ‘भारत में 39 जगहों पर तिब्बती आबादी बसी हुई है. ये तिब्बती कृषि, हैंडीक्राफ्ट, छोटे-मोटे उद्योग और व्यापार करके अपना जीवन-यापन कर रहे हैं. 2009 में केंद्रीय तिब्बतन प्रशासन ने अपने अधीनवाले योजना आयोग के जरिये जनसांख्यिक सर्वे कराया था, जिससे पता चला कि तिब्बती शरणार्थियों की 70 फीसदी आबादी अकेले भारत में रह रही है. कर्नाटक से लेकर कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत की हजारों एकड़ जमीन पर तिब्बती शरणार्थियों की बसावट है. यदि तिब्बती भारतीय वोटर लिस्ट में शामिल होते हैं, तो उनका इस देश की भूमि और संसाधनों पर उतना ही अधिकार है, जितना कि किसी भी भारतीय नागरिक का. इतनी सुविधाओं को त्याग कर वे तिब्बत क्यों जायेंगे? इस देश के करदाताओं को यह जानने का हक है कि पिछले 55 साल में तिब्बत की निर्वासित सरकार पर भारत सरकार ने कितना खर्च किया है. राज्य सरकारों ने कितनी जमीनें तिब्बतियों को मुहैया करायी हैं? और जो तिब्बती भारतीय मतदाता नहीं बनाये जायेंगे, उनका क्या होगा? बात कड़वी हो, तो हुआ करे, लेकिन इस देश की जनता कब तक तिब्बत की आजादी के नाम पर बाबा जी का ठुल्लू देखती रहेगी?
दलाई लामा पहली बार ओबामा से नहीं मिल रहे थे. इससे पहले परम पावन, फरवरी, 2010 और जुलाई, 2011 में ओबामा से मिल चुके थे. चीन का हर बार ‘कड़ा प्रतिरोध’ होता है. अब यह प्रतिरोध ‘मैच फिक्सिंग’ जैसा लगता है. क्या इस कागजी गजर्ना से चीन में अमेरिका के 70 अरब डॉलर का निवेश कम हो जायेगा, या दस अरब डॉलर का चीनी निवेश अमेरिकी बाजार से बाहर निकाल लिया जायेगा? अगले महीने हेग में नाभिकीय शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी चिंगपिंग ओबामा से मिलेंगे. इसके प्रकारांतर दो बार और ‘जी-20 समिट’ और चीन में होनेवाले एशिया-प्रशांत (एपेक) सम्मेलन में ओबामा-शी की मुलाकात तय है. ऐसी मुलाकातों पर 55 साल से आजादी के लिए लड़ रहा आम तिब्बती क्या सोचता होगा?
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