फेसबुक से खार खाये बैठे हैं चाचा

Published at :26 Feb 2014 4:00 AM (IST)
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फेसबुक से खार खाये बैठे हैं चाचा

।। कुमार रोहित।। (प्रभात खबर, धनबाद) सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे. मैं बरामदे में चाय की चुस्कियां लेते हुए अखबार का इंतजार कर रहा था. तभी पड़ोस के चाचा जी से सामना हो गया. 60-65 के बीच उनकी उम्र है. बातों-बातों में बोले, ‘‘अब पहले वाली बात कहां?’’ मैंने पूछा- हुआ क्या, तो […]

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।। कुमार रोहित।।

(प्रभात खबर, धनबाद)

सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे. मैं बरामदे में चाय की चुस्कियां लेते हुए अखबार का इंतजार कर रहा था. तभी पड़ोस के चाचा जी से सामना हो गया. 60-65 के बीच उनकी उम्र है. बातों-बातों में बोले, ‘‘अब पहले वाली बात कहां?’’ मैंने पूछा- हुआ क्या, तो उनका दर्द छलक उठा मानो वर्षो से परेशान हों. हालांकि उन्हें किसी चीज की कमी नजर नहीं आती. अच्छा-खासा मकान. कमाऊ व लायक बेटा. सब कुछ तो था. मैंने कुरसी बढ़ायी. कुरसी पर बैठते ही बीड़ी निकाली और धुआं छोड़ने लगे. मैंने चाय के लिए पूछा, तो कहने लगे- बुरी लत है. गैस और न जाने किन-किन बीमारियों की जड़.

उनकी बात सुन मैंने भी अपना कम किनारे रख दिया. उन्होंने दूसरी बीड़ी सुलगायी. मैं समझ गया कि बात कुछ और है. मैं दोबारा पूछता कि इससे पहले ही वह शुरू हो गये- जब से फेसबुकिया चलन बढ़ा है, हमारा पतन शुरू हो गया है. दरअसल, दसवीं में पढ़ाई कर रहे अपने पोते सलमान को लेकर चाचा फिक्रमंद थे. कहने लगे, पढ़ाई में तो उसका मन ही नहीं लगता. इम्तिहान सर पर है और वह चैटिंग में मशगूल है. पांच सौ से ऊपर फेसबुकिया दोस्त हैं उसके. इतने लोगों से दोस्ती क्या करना कि निभा ही न सको? वह भी दोस्तों में आधी से ज्यादा लड़कियां! मैंने कहा, आजकल तो ऐसा ही चलता है. इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है? चाचा जी ने तीसरी बीड़ी सुलगायी और अखबारों की कटिंग निकाल कर पटक दी मेज पर. खबर थी- फेसबुक पर सेक्स का धंधा.

मेरी बोलती बंद हो गयी, लेकिन चाचा जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका था. उन्हें समझाना जरूरी था. मैंने कहा- फरजी खबर है. मैं भी हूं फेसबुक पर. आपका लायक बेटा भी है. ऐसा कोई धंधा नहीं चलता इस साइट पर. अगर चलता भी है, तो हमें क्या. अपना चरित्र साफ है, तो कोई असर नहीं पड़ता. फिर फेसबुक ही क्यों, हर जगह, लगभग हर छोटे-बड़े शहर व कस्बे में ऐसे धंधे चलते हैं. कहां-कहां रोकेंगे आप? फेसबुक में कई अच्छाइयां भी हैं चाचा जी. कई बिछड़े दोस्तों को मिलाया है इसने. कई सूचनाएं दी हैं. कई मुहिम चलायी हैं.

हमारे सुख-दु:ख का साथी बन चुका है फेसबुक. चाचा का गुस्सा नरम पड़ रहा था. लेकिन अब भी कई सवाल थे उनके जेहन में. तभी हॉकर अखबार दे गया. पहले पेज की लीड खबर फेसबुक से संबंधित- मैडम, मां का फेसबुक फ्रेंड बुरी नजर रखता है. मैं अखबार को चाचा जी की नजरों से बचाने की कोशिश कर रहा था, तभी वह अखबार मांग बैठे. मैं सोच में पड़ गया. उन्होंने चौथी बीड़ी जलायी और अखबार हाथ से ले लिया. मैं नजरें चुरा रहा था. चाचा ने मुझ पर नजरें गड़ा ली थी. सुबह के छह बज चुके थे. चाचा कुछ कहते कि मैं बोल उठा, देर हो रही है दूध लाने जा रहा हूं. चाचा भी समझ गये और गुस्से से लाल हो कर अपने घर की ओर चल दिये.

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