एनजीओ की महामारी और सार्थकता

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार सीबीआइ देश में कार्यरत 20 लाख से अधिक एनजीओ की तहकीकात कर रही है, जिसमें लगभग आधे उत्तर प्रदेश और केरल में ही हैं. रिपोर्टो के अनुसार जांच से सामने आ रही जानकारियां बहुत चौंकानेवाली हैं. इस संख्या के हिसाब से हर 600 लोगों पर एक एनजीओ सक्रिय है, जबकि हर […]
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार सीबीआइ देश में कार्यरत 20 लाख से अधिक एनजीओ की तहकीकात कर रही है, जिसमें लगभग आधे उत्तर प्रदेश और केरल में ही हैं. रिपोर्टो के अनुसार जांच से सामने आ रही जानकारियां बहुत चौंकानेवाली हैं.
इस संख्या के हिसाब से हर 600 लोगों पर एक एनजीओ सक्रिय है, जबकि हर 1700 लोगों के लिए सिर्फ एक डॉक्टर और 943 लोगों के लिए सिर्फ एक पुलिसकर्मी की उपलब्धता है. इन स्वयंसेवी संस्थाओं को केंद्र और राज्य सरकारों से औसतन एक हजार करोड़ रुपये का वार्षिक अनुदान मिलता है. गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट बताती है कि विदेशों से मिलनेवाले अनुदान की रकम दस हजार करोड़ सालाना है.
इन संस्थाओं द्वारा अनुदानों का दुरुपयोग और इस क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं. लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है, चिंता की बात यह भी है कि नीति-निर्धारण और जनमत निर्माण के उद्देश्य से बनी सार्वजानिक संस्थाओं की प्रासंगिकता सीमित हो रही है और गैर-सरकारी संस्थाएं अपने संसाधनों के बूते राजनीति और समाज पर अधिक प्रभावी होती जा रही हैं. यह सही है कि अनेक जरूरी कानूनों, नीतियों और मुद्दों पर कई संस्थाओं का योगदान महत्वपूर्ण रहा है और विभिन्न क्षेत्रों में एनजीओ की मौजूदगी जरूरी है, लेकिन जिस तरह से सिर्फ धन उगाहने और स्वार्थ-सिद्धि के लिए ऐसे संगठन चल रहे हैं, उस पर गंभीरता से सोचना जरूरी है.
देखा गया है कि ये संगठन अनुदान की राशि का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन, कार्यालयी खर्च और कागजी खानापूर्ति में जाया कर देते हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि छोटी संस्थाएं और सामाजिक उद्यमी बड़े एनजीओ से अधिक सार्थक सिद्ध हुए हैं. दूसरा पहलू यह है कि सरकारें इनकी गतिविधियों पर नियंत्रण और धन के दुरुपयोग को रोकने के नाम पर विरोधी संस्थाओं और कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करती हैं. बदले की भावना से उठाये गये ऐसे कदम एनजीओ क्षेत्र में फैली अव्यवस्था को रोकने की जगह अच्छे संगठनों के लिए मुश्किल पैदा कर देते हैं.
एनजीओ की जरूरत का विरोध करतीं लेखिका एम्मा थॉमसन की इस बात पर भी गौर करें कि ये संस्थाएं जिस नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व का भार उठातीं हैं, दरअसल वे सरकारों की जिम्मेवारी है.
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