लाख दुखों की एक दवा है

Updated at : 05 Dec 2016 6:14 AM (IST)
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लाख दुखों की एक दवा है

वीर विनोद छाबड़ा व्यंग्यकार जमूरा डमरू बजा-बजा कर भीड़ जमा कर रहा है. उधर मदारी झोले में से कई साइज की रंग-बिरंगियां शीशियां निकाल रहा है. थोड़ी देर में मदारी देखता है मजमा लग गया है.मदारी भीड़ को संबोधित करता है- मेहरबानों और कद्रदानों आज दुनिया का आठवां अजूबा देखिये. आपकी सारी तकलीफें गायब करने […]

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वीर विनोद छाबड़ा

व्यंग्यकार

जमूरा डमरू बजा-बजा कर भीड़ जमा कर रहा है. उधर मदारी झोले में से कई साइज की रंग-बिरंगियां शीशियां निकाल रहा है. थोड़ी देर में मदारी देखता है मजमा लग गया है.मदारी भीड़ को संबोधित करता है- मेहरबानों और कद्रदानों आज दुनिया का आठवां अजूबा देखिये. आपकी सारी तकलीफें गायब करने को ये मदारी आया है. हिमालय की सबसे ऊंची चोटी की जड़ी-बूटी से तैयार. आज मैं आपका ऐसा अजूबा दिखाऊंगा कि आपकी अगली सात पुश्तों को भी कभी कोई तकलीफ नहीं होगी.

गठिया-जोड़ों का दर्द गायब. किसी भी किस्म का पेट दर्द और जलन खत्म. सिरदर्द गायब. गुर्दा-जिगर में पड़े बड़े-बड़े पत्थर पिघल जायें. ऊपर से सांस लेने तकलीफ है, तो कोई बात नहीं. नीचे से भी तकलीफ है, तो भी कोई बात नहीं.

आप डॉक्टर के पास जाओगे. वह बतायेगा- यह पुर्जा खराब, वह खराब. कूल्हा जापान में बदलेगा और घुटना चीन में और भेजे के लिए जर्मनी या अमरीका जाओ. डरिये नहीं, हम आपको कहीं नहीं भेजेंगे. हम सब जगह घूम आये हैं. आप के लिए नायाब नुस्खा तैयार कर लिया है. लाख दुखों की एक दवा है.

बिलकुल फ्री दवा है. जले-कटे पर भी काम आती है. वेदों और पुराणों में भी इसका जिक्र है. अमरीका से ओबामा भी इसकी पुड़िया मंगा चुके हैं और पुतीन का आॅर्डर रूस से आया है.

हमारा दावा है कि हमारी बतायी विधि के अनुसार सेवन करें, तो नब्बे से नौ साल होने में वक्त नहीं लगेगा. यह चूरन मरदानापन वापस भी लाता और बढ़ाता भी है. कीमत कुछ नहीं. इतना सस्ता कि समझो दो वक्त के पान की थूक या फिर दो सिगरेट का धुआं. मेहरबानों-कद्रदानों ठीक लगे, तो पैसे देना, नहीं तो फ्री में घर ले जाना. यह मदारी और जमूरा रोज यहीं मिलते हैं.

यह मुर्दों को भी जिंदा कर देता है. मदारी जमूरे पर चाकू चला देता है और बोलता है- मेहरबानों पापी पेट का सवाल है. दो मिनट तक कोई हिलेगा नहीं, कोई आवाज नहीं. नहीं तो रूह नाराज होकर चली जायेगी.

तभी चद्दर के नीचे हलचल होती है. जमूरा उठ कर बैठ जाता है. उसकी गर्दन पर कटे का निशान है और खून से गर्दन सनी है. उसकी कमीज पर भी कई जगह खून के धब्बे हैं.

मदारी पूछता है- जमूरा ठीक है? जमूरा बाअवाजे बुलंद बोलता है- हां उस्ताद. मदारी फिर पूछता है- कोई तकलीफ? जमूरा बताता है- नहीं उस्ताद. और सब लोग वाह-वाह करने लगते हैं.

मदारी जनता की ओर मुखातिब होता है- मेहरबानों-कद्रदानों अब आप चूरन खा लें. देखना, जिस तकलीफ को डॉक्टर पिछले दस साल में नहीं भगा पाया, उसे मेरा करामाती चूरन महज दो सेकेंड में गायब करेगा. सौ ग्राम की छोटी शीशी सिर्फ तीस रुपये में और मझोली चालीस और दो सौ ग्राम की बड़ी शीशी सिर्फ पचास रुपये में. जनता टूट पड़ती है- एक बड़ी शीशी मुझे, एक बड़ी मुझे.

आधे घंटे बाद मदारी एक खंडरनुमा कमरे में बैठा रुपये गिन रहा है और जमूरा भूने हुए मुर्गे की टांग से मांस नोचते हुए शिकायत कर रहा है- बापू आज तो एक झटके में हजार से ऊपर खींच लियो होंगे. लंबा हाथ मारा है. विलायती चलोगी आज तो. मगर बापू, ये कौन सा रंग गर्दन पर लगा दीयो हो. मिटो ही ना हो. रुपये गिनने में व्यस्त मदारी गर्दन झुकाये ही बताता है- हां, इस बार थोड़ा टेम लगियो रंग छूटन में.

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