हमारी अंगरेजी मानसिकता

Updated at : 11 Nov 2016 6:02 AM (IST)
विज्ञापन
हमारी अंगरेजी मानसिकता

प्रभात रंजन कथाकार एक बार फिर से इस बात की चर्चा शुरू हुई है कि देश में शिक्षा की भाषा मातृभाषा होनी चाहिए. सरकार को इस तरह के सुझाव भी दिये गये हैं कि सिर्फ शिक्षा ही नहीं, बल्कि शोध की भाषा भी मातृभाषा होनी चाहिए. भावनात्मक रूप से यह बात अपीलिंग लगती है, लेकिन […]

विज्ञापन

प्रभात रंजन

कथाकार

एक बार फिर से इस बात की चर्चा शुरू हुई है कि देश में शिक्षा की भाषा मातृभाषा होनी चाहिए. सरकार को इस तरह के सुझाव भी दिये गये हैं कि सिर्फ शिक्षा ही नहीं, बल्कि शोध की भाषा भी मातृभाषा होनी चाहिए. भावनात्मक रूप से यह बात अपीलिंग लगती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह बात बहुत कुछ सोचने के लिए विवश कर देती है.

आजादी के इतने बरस बाद भी हमारी बहस इसी बुनियादी बात के ऊपर टिकी हुई है कि शिक्षा, शोध की भाषा क्या हो? भावनात्मक रूप से यह बात सत्तर सालों से कही जाती रही है, लेकिन इन सत्तर सालों में जो शिक्षा व्यवस्था विकसित हुई है, वह अपनी मातृभाषाओं से दूरी बनाते हुए ही विकसित हुई है.

यह मान लिया गया है कि हिंदी सहित देश की समस्त भाषाएं घर-परिवार में बातचीत करने के लिए तो ठीक हैं, लेकिन रोजी-रोजगार के लिए उन भाषाओं में शिक्षा ग्रहण करना किसी भी लिहाज से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता. यह बात हमारी मानसिकता में इस कदर घर कर गयी है कि हम बच्चों को छुटपन से ही अंगरेजी सिखाने लगते हैं. अगर हमारा बच्चा अंगरेजी अच्छी बोलने-लिखने लगता है, तो हम उस पर गर्व करने लगते हैं. लेकिन, अगर वह अच्छी हिंदी लिखने-बोलने लगता है, तो हम कभी उससे गौरवान्वित महसूस नहीं करते. यह मानसिकता की बात है.

जो बच्चा बचपन से ही ऐसी मानसिकता के बीच में बड़ा हो रहा हो, उससे यह उम्मीद करना कि वह उच्च शिक्षा, शोध की भाषा के रूप में हिंदी या अपनी अन्य मातृभाषा को अपनायेगा, कुछ अधिक सकारात्मक सोच लगती है.

हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें अपनी भाषाओं से विमुख कर देती है. एक दशक से ज्यादा वक्त हो गया, जब श्यामरूद्र पाठक ने आइआइटी में हिंदी में शोध प्रबंध लिख कर प्रस्तुत करने के लिए संघर्ष किया था. न जाने कितने बरसों से केंद्रीय सेवाओं की भर्ती परीक्षाओं में अंगरेजी की अनिवार्यता को खत्म करने के लिए आंदोलन चल रहा है.

सबसे बुरी स्थिति उच्च शिक्षा की है, जहां आज भी समाज विज्ञानों के शिक्षण को लेकर रोना रोया जाता है कि हिंदी में उनकी शिक्षा के लिए उच्चस्तरीय, अधुनातन किताबों का अभाव है. यह सच्चाई है कि समाज विज्ञानों में बड़ा विद्वान वही माना जाता है, जो विदेशी विवि में पढ़ा होता है और अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में पर्चे पढ़ता है. जो समाजविज्ञानी हिंदी या अपनी मातृभाषाओं में पुस्तक लिखता है, उसको दोयम दर्जे का माना जाता है. आज समाज विज्ञान की पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध भी हैं, तो वे अनुवाद के माध्यम से उपलब्ध होती हैं और उनकी भाषा ऐसी होती है, जो किसी की समझ में नहीं आती.

उन्हीं अनुवाद पुस्तकों के आधार पर यह कहा जाता है कि हिंदी स्तरीय भाषा नहीं है कि उसमें समाज विज्ञान का ज्ञान अट पाये.

भारत के एक बड़े इतिहासकार से एक बार मिलने गया, तो वे इस बात का रोना रोने लगे कि उनकी किताबों के हिंदी अनुवाद कितने खराब होते हैं, हिंदी वालों को समाज विज्ञान की शब्दावलियों का कितना कम ज्ञान होता है. मैंने उनसे पूछा कि आप खुद हिंदी में किताब क्यों नहीं लिखते, जबकि आप हिंदी प्रदेश से आते हैं. यह सुन कर वे बहुत नाराज हुए और कुछ देर में ही मुझे वहां से उठ कर आना पड़ा.

कहने का मतलब यह है कि भावना के स्तर पर यह बात बहुत सही लगती है कि शिक्षा और शोध की भाषा मातृभाषा होनी चाहिए. लेकिन, जिस देश में अंगरेजी भाषा को सब उन्नति का मूल माना जाता हो, वहां ऐसा कर पाना इतना आसान है क्या?

भाषा बदलने से ज्यादा जरूरी है मानसिकता को बदलना!

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola