आइ डू नॉट प्रोमिस टु पे!

Updated at : 10 Nov 2016 6:36 AM (IST)
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आइ डू नॉट प्रोमिस टु पे!

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार हजार रुपये की कीमत कल तक बहुत थी, पुराने जमाने में तो वह और भी ज्यादा होती थी. माता-पिता बच्चों के नाम हजार से मिलते-जुलते रख कर गर्व का अनुभव करते थे. मेरे एक पंजाबी दोस्त का नाम हजारा सिंह था, जिसने उसे अपने अंगरेजी-प्रेम के चलते थाउजेंडा सिंह कर […]

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डॉ सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

हजार रुपये की कीमत कल तक बहुत थी, पुराने जमाने में तो वह और भी ज्यादा होती थी. माता-पिता बच्चों के नाम हजार से मिलते-जुलते रख कर गर्व का अनुभव करते थे. मेरे एक पंजाबी दोस्त का नाम हजारा सिंह था, जिसने उसे अपने अंगरेजी-प्रेम के चलते थाउजेंडा सिंह कर लिया था. हजारी प्रसाद द्विवेदी तो हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार-आलोचक हुए ही हैं.

उनके द्वारा लिखी गयी ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ पढ़ कर बहुत-से लोग उन्हें बाणभट्ट का समकालीन मान बैठते हैं, जिस तरह वाल्मीकि को राम का. अन्ना जी भी कितने हजारे हैं, सब जानते हैं. लेकिन, 1000 और 500 रुपये के नोटों के आकस्मिक विमुद्रीकरण के बाद से हजार की तो कोई कीमत ही नहीं रही, पांच सौ की भी नहीं रही. रिजर्व बैंक के गवर्नर द्वारा दिया गया यह वचन बेकार हो गया कि ‘मैं धारक को हजार या पांच सौ रुपये अदा करने का वचन देता हूं.’ अब तो वे यही कहते प्रतीत हो रहे हैं कि ‘आइ डू नॉट प्रोमिस टु पे…’

तभी तो सुबह दूधवाले ने पांच सौ का नोट लेने से मना कर दिया. चिल्लर के अभाव में वह गत्ते के एक टुकड़े पर जो लिख कर दे देता था, उसे हम ग्राहकों ने कभी मना नहीं किया.

उसकी वह ‘इल्लीगल टेंडर’ देश की ‘लीगल टेंडर’ से ज्यादा मजबूत मुद्रा निकली. दस-बीस-सौ रुपयेवाले देखते-देखते दूध-ब्रेड ले जाते रहे, हजार-पांच सौ वाले खड़े तमाशा देखते रहे. कुछ देर के लिए पुराने जमाने का बार्टर-सिस्टम भी लागू हो गया. सब्जीवाला भिंडी-लौकी देकर दूध का पैकेट ले गया, तो धोबी ने कपड़े इस्त्री कर देने की बात कह कर जरूरत का सामान ले लिया. मैंने भी सोचा कि उससे दो-चार कविताओं-लेखों के बदले दूध-ब्रेड देने का आग्रह करूं, पर फिर संकोच कर गया. इस लफड़े की शुरुआत घोषणा वाली रात से ही हो गयी थी. मुंबई की फ्लाइट पकड़ने एयरपोर्ट गये एक मित्र ने फोन पर बताया कि मैं एयरपोर्ट पहुंच तो गया, लेकिन टैक्सीवाला न हजार का नोट ले रहा है, न पांच सौ का, और सौ के नोट मेरे पास हैं नहीं, करूं तो क्या करूं?

अवैध कारोबारियों के पास से तो कालाधन जब निकलेगा, तब निकलेगा, घरों में पत्नियों के पास छिपा ‘कालाधन’ धड़ाधड़ निकलना शुरू हो गया है. सुबह उठा भी नहीं था कि पत्नी ने हजार-हजार के दस नोट निकाल कर मेरे सामने रख दिये कि इन्हें भी बदलवाना है. मैंने पूछा, कहां से आये, तो बोली कि सौदे-सुलफ और ब्यूटी-पार्लर से बचाये हैं.

सोशल मीडिया पत्नियों का कालाधन निकलने के कटाक्षों-प्रसंगों से भरा पड़ा है. अब अगर कहीं और से कालाधन नहीं भी निकलता, तो कोई बात नहीं. नये नोटों में जमा होने से कालाधन वैसे भी डरता है, हालांकि, ये पुराने नोट भी कभी नये नोटों के रूप में ही जारी किये गये थे. आतंकवादियों की फंडिंग भी भारत से ही हो रही थी, सो उस पर भी लगाम लगेगी. लोगों की यह गलतफहमी भी दूर हो गयी कि आतंकवादियों की फंडिंग अरब देशों द्वारा की जाती है.

कालेधन को सफेद बनाने के उपाय भी सोचे जाने लगे हैं. कुछ लोग इस ऑफर के साथ भी सामने आ रहे हैं कि अलग-अलग बैंकों में उनके चार-चार, पांच-पांच खाते हैं और संकट की घड़ी में वे लोगों के किसी काम आ सकें, तो जरूर संपर्क करें. लेकिन, सबसे बढ़िया तरीका एक कथित राहुल-सोनिया-संवाद में सामने आया है, जिसमें राहुल सोनियाजी से कहते हैं कि मम्मी, मैं 1000, 500 के नोटों में से एक-एक जीरो रबड़ से मिटा कर उन्हें 100, 50 के बना लूं क्या?

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