जरूरी कानूनी पहल
Updated at : 10 Oct 2016 5:49 AM (IST)
विज्ञापन

सर्वोच्च न्यायालय ने घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा कानून में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है. इस कानून के तहत अभी तक परिवार के किसी ऐसे वयस्क पुरुष के विरुद्ध ही मुकदमा चलाया जा सकता था, जिस पर प्रताड़ना में शामिल होने का आरोप हो या जिसके खिलाफ पीड़िता ने संरक्षण मांगा हो. वर्ष 2005 […]
विज्ञापन
सर्वोच्च न्यायालय ने घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा कानून में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है. इस कानून के तहत अभी तक परिवार के किसी ऐसे वयस्क पुरुष के विरुद्ध ही मुकदमा चलाया जा सकता था, जिस पर प्रताड़ना में शामिल होने का आरोप हो या जिसके खिलाफ पीड़िता ने संरक्षण मांगा हो. वर्ष 2005 के इस कानून से इस प्रावधान को हटा दिया गया है, क्योंकि अदालत की नजर में यह न्याय देने की राह में बाधक है और समानता के अधिकार का उल्लंघन है.
घरेलू हिंसा के अनेक मामलों में परिवार के महिला और किशोर सदस्यों की मिलीभगत के अनेक मामले हैं. अब ऐसे आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई कर पाना संभव होगा. पिछले साल जारी भारत सरकार की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि महिलाओं के खिलाफ होनेवाले अपराधों में सबसे अधिक संख्या घरेलू हिंसा से संबंधित मामलों की है, जो कि 36 फीसदी से अधिक है. सामाजिक और प्रशासनिक समस्याओं की वजह से ऐसी बहुत-सी घटनाओं की शिकायत भी दर्ज नहीं हो पाती है.
हालांकि, भारत तेजी से लोकतांत्रिक और आर्थिक विकास की ओर उन्मुख है, पर महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह को कमतर करने में पर्याप्त सफलता नहीं मिली है. वर्ष 2012 के यूनिसेफ के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत में 57 फीसदी लड़कों और 53 फीसदी लड़कियों का मानना है कि पति द्वारा पत्नी के साथ मारपीट करने में कोई बुराई नहीं है. ऐसे में परिवार के भीतर औरत की सुरक्षा का सवाल एक गंभीर मसला है और इसमें बेहतरी के लिए निरंतर वैधानिक पहल करते रहना आवश्यक है.
सर्वोच्च न्यायालय का इस ताजा फैसले को इसी कड़ी में देखा जाना चाहिए. इस कानून के अन्य प्रावधानों को समुचित रूप से लागू करने के प्रयास भी होने चाहिए. घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा कानून में हर राज्य में सुरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति की व्यवस्था है, जिनका काम घटनाओं का आकलन करना है.
परंतु, सरकारी और न्यायिक तंत्र की लापरवाही और संसाधनों के अभाव के कारण इस दिशा में प्रगति बेहद निराशाजनक है. बीते सालों में 29 राज्यों में इन अधिकारियों की संख्या घट कर आधे से भी कम हो गयी है. सरकारी अध्ययनों के अनुसार, कम-से-कम 19 राज्यों में इस कानून को लागू करने के लिए समुचित योजनाएं तैयार नहीं की गयी हैं. ऐसे में सरकारी और सामाजिक स्तरों पर ठोस प्रयासों की जरूरत है, ताकि घर की चहारदीवारी के भीतर औरतें अपने परिवारजनों के अत्याचारों से बच सकें.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




