बारिश में डूबते महानगर
Updated at : 02 Sep 2016 6:04 AM (IST)
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बीते कुछ सालों से हमारे महानगरों में मॉनसून की बारिश से होनेवाले जल-जमाव ने बाढ़ की परिभाषा में नया आयाम जोड़ा है. आमतौर पर नदियों के जल-स्तर बढ़ने से आसपास के इलाकों में पानी भर जाने को बाढ़ कहा जाता है. लेकिन, चंद घंटों की बरसात से महानगरों से लेकर मझोले शहरों तक में सड़कों […]
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बीते कुछ सालों से हमारे महानगरों में मॉनसून की बारिश से होनेवाले जल-जमाव ने बाढ़ की परिभाषा में नया आयाम जोड़ा है. आमतौर पर नदियों के जल-स्तर बढ़ने से आसपास के इलाकों में पानी भर जाने को बाढ़ कहा जाता है.
लेकिन, चंद घंटों की बरसात से महानगरों से लेकर मझोले शहरों तक में सड़कों और कॉलोनियों में जल-जमाव अब हर साल की परिपाटी-सी बन गयी है. वर्ष 2008 में मुंबई और 2015 के दिसंबर में चेन्नई की बाढ़ ने तो प्रलय का एहसास करा दिया था. पिछले दो दिनों से दिल्ली और गुड़गांव के नजारे से यही बात साबित होती है कि सरकारों ने पिछले अनुभवों तथा विशेषज्ञों की सलाह से कुछ नहीं सीखा.
भारत दौरे पर आये अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने दो दिनों तक जल-जमाव और यातायात की तकलीफों को महसूस करने के बाद एक बैठक में उपस्थित लोगों से मजाक में कह ही दिया कि उन्हें आयोजन में पहुंचने के लिए नावों का सहारा लेना पड़ा होगा. शहरों की मौसमी बाढ़ के अध्ययन का निष्कर्ष यही रहा है कि यहां नालियों का पूरा तंत्र प्रबंधनहीन है. हमारे शहरों की 80 फीसदी नालियां जल-आपूर्ति के तंत्र के साथ बहती हैं. बढ़ती आबादी के दबाव में शहरों का आकार तेजी से बड़ा होता जा रहा है. बेतहाशा नगरीकरण के कारण बारिश का पानी प्राकृतिक रूप से जमीन के भीतर नहीं जा पाता है. भारत के 32 बड़े शहरों में से 22 में पानी का संकट है.
महानगरों के साथ उपनगरों और आवासीय कॉलोनियों के बढ़ने की स्थिति में पानी की आपूर्ति और नाली के प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. सड़कों और बस्तियों को बनाते समय यह ख्याल रखा जाना चाहिए कि बारिश के पानी की समुचित निकासी हो और वह जमीन के भीतर जाये. पानी के कुप्रबंधन का सीधा संबंध शहरों में बढ़ती बीमारियों से हैं. दिल्ली समेत कई जगहों से डेंगू, चिकनगुनिया और बुखार के हजारों मामले सामने आ चुके हैं. यह पूरी स्थिति कई रूपों में अर्थव्यवस्था की तरक्की की राह रोक रही है.
लेकिन, अफसोस की बात है कि शहरों की बेहतरी पर गंभीरता से विचार करने के बजाय हमारे राजनेता आरोप-प्रत्यारोप में व्यस्त हैं. जरूरत इस बात कि है कि जल-जमाव से निजात पाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत पहल हो, अन्यथा अगले मॉनसून में मुश्किल अधिक बड़ी होगी.
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