रस्साकशी से बेहाल दिल्ली
Updated at : 30 Aug 2016 11:52 PM (IST)
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बारिश के आगे किसका जोर चलता है भला? अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी का भी नहीं चला. सातवें भारत-अमेरिकी रणनीतिक एवं वित्तीय संवाद में भाग लेने जॉन कैरी दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे, तो बारिश भी आ पहुंची. दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क का विदेश मंत्री दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी की सड़कों पर लगे […]
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बारिश के आगे किसका जोर चलता है भला? अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी का भी नहीं चला. सातवें भारत-अमेरिकी रणनीतिक एवं वित्तीय संवाद में भाग लेने जॉन कैरी दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे, तो बारिश भी आ पहुंची. दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क का विदेश मंत्री दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी की सड़कों पर लगे जाम में कुछ उसी तरह फंसा, जिस तरह से शेष दिल्लीवासी फंसते हैं.
लेकिन, जॉन कैरी जाम में फंस जाने का दोष न तो मोदी सरकार पर मढ़ सकते हैं, जिसके वे राजकीय अतिथि हैं, ना ही केजरीवाल सरकार पर, जिससे दिल्ली की जनता द्वारा निर्वाचित होने के कारण उम्मीद की जा सकती है कि वह लोगों की रोजमर्रा की कठिनाइयां दूर करेगी. शेष दिल्लीवासियों की तरह जॉन कैरी के सामने भी यही समस्या आयेगी कि दोहरे शासन के दो पाटों के बीच बढ़ती समस्याओं के लिए वे किसे दोषी मानें?
कोर्ट ने साफ कहा है कि नियमों के मुताबिक केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में उप-राज्यपाल ही दिल्ली में शासन के प्रमुख हैं. उप-राज्यपाल से किसी फैसले की कैफियत पूछिये, तो बड़ी सादगी से कहेंगे कि जनहित के फैसले लेने के लिए दिल्ली विधानसभा है, मैं तो बस यह देखता हूं कि कहीं दिल्ली विधानसभा के फैसले नियमों के दायरे से बाहर के क्षेत्रों के बारे में न लिये जायें. वहीं आम आदमी पार्टी के प्रमुख से दर्द-ए-दिल सुनाइये, तो वही पुराना रिकाॅर्ड बजेगा कि हम वैसे तो दिल्ली में ‘सतयुग’ लाने के अपने संकल्प पर अडिग हैं, पर क्या करें, केंद्र के इशारे पर उप-राज्यपाल हमारा रास्ता रोक रहे हैं.
बारिश के पानी से लगा जाम हो, बंद पड़े नाले हों, पानी-बिजली की आपूर्ति में अनियमितता हो या फिर तेजी से बढ़ते डेंगू व चिकनगुनिया के मरीज और उनके उपचार का सवाल- दिल्लीवासियों की समस्याएं बढ़ती ही जा रही हैं, लेकिन वे तय नहीं कर सकते कि इसमें दोष किसका है. मसलन, उप-राज्यपाल ने दिल्ली सरकार के निवेदन को दरकिनार करते हुए दिल्ली के स्वास्थ्य सचिव और पीडब्ल्यूडी सचिव का तबादला कर दिया है.
दोनों ही आइएएस नहीं थे. अब स्वास्थ्य और सड़क जाम का रोना दिल्लीवासी रोयेंगे, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री कहेंगे कि सारा दोष एलजी का है, क्योंकि बेहतर काम करनेवाले अधिकारियों को रहने नहीं दिया. उधर, एलजी साहब कहेंगे कि नियमों का पालन हुआ है और लोकतंत्र नियमों से ही चलता है. केंद्र बनाम राज्य सरकार की इस रस्साकशी में गर्दन दिल्ली की जनता की ही ऐंठ रही है. हालांकि, उम्मीद है कि लोकतंत्र है, तो दिल्लीवासियों के इस दुख का निदान भी एक दिन निकलेगा ही.
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