बाढ़ के रूप अनेक
Updated at : 30 Aug 2016 11:50 PM (IST)
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डॉ पंकज कुमार झा असिस्टेंट प्रोफेसर, डीयू एक बार फिर बाढ़ का मौसम आ गया है. बिहार की नदियां, मसलन गंगा, कोसी, महानंदा, सभी उफान पर हैं. बहरहाल नदी और बाढ़ प्रभावित मिथिलांचल-सीमांचल के लिए बाढ़ के भी कई रूप हैं. इसे बेहद खूबसूरती से निरूपित करते हुए बाढ़ विशेषज्ञ दिनेश मिश्र बताते हैं कि […]
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डॉ पंकज कुमार झा
असिस्टेंट प्रोफेसर, डीयू
एक बार फिर बाढ़ का मौसम आ गया है. बिहार की नदियां, मसलन गंगा, कोसी, महानंदा, सभी उफान पर हैं. बहरहाल नदी और बाढ़ प्रभावित मिथिलांचल-सीमांचल के लिए बाढ़ के भी कई रूप हैं. इसे बेहद खूबसूरती से निरूपित करते हुए बाढ़ विशेषज्ञ दिनेश मिश्र बताते हैं कि नदी के पानी का खेतों में आना और वहां बना रहना ‘बाढ़’ कहलाता है.
दिनेश जी आगे बताते हैं. खेतों के लिए पानी की जरूरत होती है. कभी-कभार नदी का पानी गांव में लोगों के दरवाजे तक हिलोर मारने लगता है. यह स्थिति ‘बोह’ कहलाता है.
20-30 साल के अंतराल पर ऐसे भी अवसर आते हैं, जब कोई नदी इतनी ऊपर आ जाये कि उसका पानी घरों की खिड़कियों तक पहुंच जाये और गाय-बैल-भैंस जैसे जानवर पानी में डूब जायें, तो यह स्थिति ‘बाढ़ हुम्मा’ कहलाती है.
बाढ़ के पानी की स्थिति ऐसी बढ़ जाये और लोगों द्वारा विवश होकर अपने जानवरों को खूंट से खोल कर छोड़ देना पड़े, तो ऐसी स्थिति ‘साह’ कहलाती है. ऐसी स्थिति से बात अगर और आगे बढ़ जाये तो वह बाढ़ ‘प्रलय’ की श्रेणी में आती है.
महत्वपूर्ण रूप से दिनेश मिश्र द्वारा बताये गये बाढ़ के इन विभिन्न रुपों के साथ स्थानीय समाज ने स्वयं को ढाल लिया है. जब तक प्रलय न आ जाये, लोग अपना जीवन किसी तरह से निर्वाह कर ही लेते हैं.
गौरतलब है कि बाढ़ के इन प्राकृतिक रूपों ने कभी तबाही नहीं मचायी. तबाही तो तब मची, जब जगह-जगह नदियों को तटबंधों, बांधों, स्लुइस गेटों से बांध कर उसके पानी की धारा काे रोका गया.
जब बांध नहीं थे, तब भी बाढ़ का पानी आता था, लेकिन निश्चित समय के बाद चुपचाप लौट जाता था. वैसी स्थिति में हमारा लोक-समाज अपने स्थानीय ज्ञान के बदौलत बाढ़ से सहयोजन के तरीके विकसित कर चुका था.
नदी-पोखर-तालाब जैसे विषयों पर लिखनेवाले गांधीवादी अनुपम मिश्र कहते हैं कि ‘जब तटबंध और बांध नहीं थे, बाढ़ का पानी अपने साथ संपन्नता लाता था. धान की कई किस्में तो बाढ़ के पानी के साथ-साथ खेलती हुई ऊपर उठती जाती थीं और फिर बाढ़ को विदा कर खलिहान में उभर आती थीं. समाज ने नदियों के साथ जीना सीख लिया था, परंतु बिना नदियों के स्वभाव को जाने-समझे ही हमने तटबंध व बड़े बांध बनाये. इससे बाढ़ रुकने के बजाय बढ़ी है और नुकसान भी ज्यादा हुआ है.’
हमें सिविल इंजीनियरिंग, वैज्ञानिक तरीकों और आपदा प्रबंधन के प्रयासों से कोई बैर नहीं है. हमारा आग्रह बस इतना है कि नदी और बाढ़ को लेकर देश में जब भी कोई नीति बने, तो वह ‘पुअर मैन विजडम’ यानी गरीब-गुरबों को भी तरजीह देनेवाली नीति हो. वह नीति नदी किनारे रहनेवाले लोगों के स्थानीय ज्ञान व समझ को विशेष रूप से वरीयता देनेवाली हो, जिनका उस नदी और बाढ़ के साथ रोटी-बेटी का संबंध होता है.
नदी और बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहनेवाले लोग इस बात से वाकिफ होते हैं कि कौन सी नदी का पानी बाढ़ है, किस बाढ़ के साथ वे अपना सहयोजन कर सकते हैं और कौन सी बाढ़ प्रलयकारी है. अचानक प्रलयकारी बाढ़ आने पर भी वहां का वह समाज उससे लड़ने के सारे उपाय जानता है. शासन-प्रशासन तो वहां घंटों बाद पहुंचते हैं. ऐसे में कोई भी नीति स्थानीय लोगों के ज्ञान, समझ, कौशल और जरूरतों को समझे बिना नहीं बनायी जा सकती है.
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