ईमानदारी की मिसाल

‘किसने बचाया मेरी आत्मा को?’ आलोक धन्वा की एक मशहूर कविता इसी सवाल से शुरू होती है. कविता का जवाब है कि ‘दो कौड़ी की मोमबत्तियों की रोशनी ने/ दो-चार उबले हुए आलुओं ने बचाया/सूखे पत्तों की आग/और मिट्टी के बर्तनों ने बचाया…’ विरोधाभासी लग सकती है यह बात, लेकिन देश के जो कोने-अंतरे तथाकथित […]
‘किसने बचाया मेरी आत्मा को?’ आलोक धन्वा की एक मशहूर कविता इसी सवाल से शुरू होती है. कविता का जवाब है कि ‘दो कौड़ी की मोमबत्तियों की रोशनी ने/ दो-चार उबले हुए आलुओं ने बचाया/सूखे पत्तों की आग/और मिट्टी के बर्तनों ने बचाया…’
विरोधाभासी लग सकती है यह बात, लेकिन देश के जो कोने-अंतरे तथाकथित ‘विकास’ की रोशनी से बहुत दूर हैं, वहां आज भी आदमी का आदमी पर विश्वास बना हुआ है. सबसे ज्यादा गरीब जान कर जिनकी नैतिकता पर हम अपने मध्यवर्गीय सोच से शक करने से नहीं चूकते, दरअसल वही ईमानदारी की कसौटी पर अक्सर सौ टका खरा उतरते हैं.
देश की आत्मा अब भी बहुत हद तक बची हुई है, तो विकास से वंचित ऐसे ही ठीहों और हाड़तोड़ मेहनत करनेवाले लोगों के बीच. अगर ऐसा नहीं होता, तो लोगों के घर का कबाड़ जुटा कर किसी तरह अपनी जीविका चलानेवाले दो भाई राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के एक गांव की उस महिला को खोजने क्यों लौटते, जिसने उन्हें पुराने अखबार-किताबों की रद्दी बेची और भूल गयी कि इसी रद्दी में कहीं एक लाख रुपये भी रखे हुए हैं?
खरीदे हुए कबाड़ में लाख रुपये मिल गये, तो उन्हें किस्मत की मेहरबानी के मुहावरे में लपेट कर रख लेना उन दो भाइयों के लिए सबसे आसान था. लेकिन, उन्होंने ऐसा नहीं किया और रकम की हकदार महिला की खोज के लिए सैकड़ों घर के दरवाजे खटखटाये, क्योंकि उनके भीतर मेहनतकश वर्गों में प्रचलित उस नैतिकता की ज्योति जल रही थी, जो सदियों से सिखाती आयी है कि बिन मेहनत सोना भी मिले, तो उसे धूल समझा जाये. यह किस्सा कोई अपवाद नहीं है.
ऐसी आये दिन खबरें आती हैं जब कोई अदना सा कर्मचारी किसी व्यक्ति को एयरपोर्ट पर छूटा रुपये-गहने से भरा सूटकेस लौटाता है, तो कभी कोई रिक्शावाला अपनी दिन भर की कमाई को गंवाने की कीमत चुका कर भी उस व्यक्ति की खोज करता है, जो अपना पर्स या बैग असावधानी से रिक्शे की सीट पर छोड़ गया था. भ्रष्टाचार की तकनीकी परिभाषा चाहे जो की जाये, लेकिन उसके मूल में दो बातें जरूर होती हैं.
एक तो यह कि बिन मेहनत के जितना मिले उतना ही अच्छा और दूसरे यह कि दूसरे की मेहनत का मोल हमेशा कम आंका जाये. लेकिन, राजस्थान के दो मेहनतकश गरीब भाइयों की कहानी की सीख है कि मेहनत के मोल की सही पहचान करके ही यह देश सार्वजनिक भ्रष्टाचार के कलंक से छुटकारा पा सकता है.
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