यूपीएससी परीक्षा : देश का आईना
Updated at : 11 Aug 2016 5:44 AM (IST)
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संदीप मानुधने विचारक, उद्यमी एवं शिक्षाविद् हाल ही में, संघ लोक सेवा आयोग की मशहूर सिविल सर्विसेज की प्रारंभिक परीक्षा संपन्न हुई. देशभर से आइएएस और अन्य बड़े पदों को हासिल करने के इच्छुक लाखों युवा इस परीक्षा में शामिल हुए. पूरे जोश और उम्मीदों से भरे इन युवाओं में एक दिली ख्वाहिश होती है […]
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संदीप मानुधने
विचारक, उद्यमी एवं शिक्षाविद्
हाल ही में, संघ लोक सेवा आयोग की मशहूर सिविल सर्विसेज की प्रारंभिक परीक्षा संपन्न हुई. देशभर से आइएएस और अन्य बड़े पदों को हासिल करने के इच्छुक लाखों युवा इस परीक्षा में शामिल हुए. पूरे जोश और उम्मीदों से भरे इन युवाओं में एक दिली ख्वाहिश होती है कि देश को सार्थक रूप से बदलने में अपना योगदान दें. हर वर्ष परीक्षार्थियों की संख्या बढ़ रही है और देखने लायक बात है कि अर्थव्यवस्था निजीकरण के इस दौर में सरकारी नौकरियां हासिल करने का जोश बढ़ता जा रहा है! मैं प्रति वर्ष इस परीक्षा का पूर्ण विश्लेषण करता हूं और प्रश्नों में छिपे ट्रेंड्स को समझने-समझाने का प्रयास भी करता हूं.
खैर, अभी हम बात करेंगे एक विशेष मुद्दे पर, और वह यह है कि इस वर्ष हुई परीक्षा में जिस प्रकार के प्रश्नों का समावेश हुआ, उनसे देश के बदलते प्रशासनिक मानदंडों की एक स्पष्ट झलक दिखायी दी. किस प्रकार वर्तमान सरकार एक बदलते विश्व के अनुरूप एक बिलकुल ही नये मॉडल को लागू करने में प्रयासरत है, उसकी गहरी छाप इस परीक्षा में दिखी. एक अच्छे छात्र को, तथा हर नागरिक को, इन बातों को समझना चाहिए.
इससे संबंधित पांच मूल तत्व दिखाई पड़ते हैं…
पहला- पर्यावरण और जलवायु न केवल बेहद संवेदनशील मुद्दा बन चुका है, वरन वैश्विक संधियों और संस्थानों के साथ कदमताल करना भारत के लिए जरूरी हो चुका है. हमेशा से सबकी सुननेवाले भारत ने कैसे एक लंबी छलांग लगा कर ‘अंतरराष्ट्रीय सौर गंठबंधन’ बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसका मुख्यालय भारत में होगा, यह आमजन और विश्व-शक्तियों के लिए भी चौंकानेवाला है. किस प्रकार संयुक्त राष्ट्र की अनेक जटिल संधियों से बद्ध भारत को अपने कानूनों में बदलाव लाने पड़ रहे हैं, वह रोचक है. कैसे पश्चिमी घाटों के पारिस्थितिकीय मुद्दे विवादास्पद बने हुए हैं, वह अनेक प्रश्नों से दिखा.
दूसरा- प्रशासन में गति लाने हेतु सरकार किस प्रकार हर सिस्टम को टेक्नोलॉजी से जोड़ रही है, वह अब हकीकत बन चुका है. डिजिटल इंडिया के अनेक तत्व अब केवल रिपोर्टों में नहीं, वरन असल जिंदगी में शामिल हो रहे हैं.
मसलन, ‘डिजिलॉकर’. दस वर्ष पहले कौन सोच सकता था कि आधार-पुष्टिकृत ऑनलाइन डिजिलॉकरों में छात्रों के स्कूल सर्टिफिकेट रखें जायेंगे, जिन्हें वे कभी-भी, कहीं-भी इस्तेमाल कर पायेंगे? नीम-कोटेड यूरिया कैसे भ्रष्टाचार कम करेगा और उत्पादकता बढ़ायेगा, यह मजेदार है. कोर-बैंकिंग अब एक स्थापित तकनीक है, और नये आनेवाले पेमेंट बैंक भी याद दिलाये गये. साफ है कि सरकार भविष्य में ऐसे लोक सेवक चाहती है, जो जमीनी हकीकतों के प्रति संवेदनशील तो हों ही, तकनीक से न डरते हुए उसे त्वरित प्रशासन हेतु अंगीकार करें.
तीसरा- मोदी सरकार ने जहां ‘आधार’ जैसी पुरानी योजनाओं को बड़ा मंच दे दिया, बिलकुल नयी योजनाओं की एक लंबी शृंखला बना दी, जो भारत के प्रशासनिक और समसामयिक ढांचे को बदल डालने का माद्दा रखती है. तमाम स्कीम्स पर प्रश्न पूछे गये, जो बताते हैं कि यूपीएससी पूरी तरह से जागरूक छात्रों को चयनित करना चाहता है. मसलन, बिजली कंपनियों हेतु ‘उदय’ योजना, व्यापक ऑनलाइन कोर्सेज हेतु ‘स्वयं’ योजना, पिछड़े वर्गों और महिलाओं हेतु स्टैंडअप इंडिया, किसानों के लिए फसल बीमा योजना, दलित-सम्मान के लिए राष्ट्रीय गरिमा योजना आदि. आनेवाले वर्षों में प्रशासनिक वार्तालाप इन नये प्रारूपों के इर्द-गिर्द होगा, यह तय है.
चौथा- वैश्विक घटनाएं भारत पर अब निश्चित प्रभाव छोड़ रही हैं, और भारत को उनसे ‘एंगेज’ करना ही पड़ेगा, यह दिखा. गूगल का ‘प्रोजेक्ट लून’ कैसे गुब्बारों से 4-जी इंटरनेट दे सकता है, चीन की मुद्रा रॅन्मिन्बी कैसे आइएमएफ द्वारा एसडीआर हेतु चुनी गयी, सब्सिडी हेतु विवादास्पद डब्ल्यूटीओ के बॉक्सेस क्या होते हैं, यूरोपीय स्थिरता तंत्र कैसे कार्य करता है; आरसीइपी, भारत और आसियान देशों का रिश्ता क्या है, ईज ऑफ डूइंग बिजनस इंडेक्स और भारत, चीन का एक पट्टा एक सड़क प्रकल्प, आदि हमें ये समझने हेतु काफी हैं कि आनेवाले वर्ष पिछले दशकों से बिलकुल भिन्न होंगे. भारतीयों को और लोकसेवकों को इन मुद्दों से निबटने हेतु तैयार रहना होगा.
पांचवां- इन बदलावों के बीच हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना है. अपना इतिहास, विश्व का इतिहास, हमारी सांस्कृतिक विरासत, हमारा लोकतांत्रिक और संसदीय ढांचा और नियम, नये कानून बनाने की प्रक्रियाएं- ये सब इस बात का इशारा हैं कि भारतीय अपनी जड़ों से कभी विमुख नहीं हो सकते. यूपीएससी की आइएएस परीक्षा देनेवाले तो बिलकुल भी नहीं!
साथ ही, दूसरे प्रश्नपत्र में अपठित गद्यांशों और मूल एप्टीट्यूड प्रश्नों से यह देखा गया कि संख्याओं से जूझने का कौशल कितना प्रखर है. 2014 में हिंदी माध्यम के छात्रों ने आंदोलन कर प्रश्नपत्र द्वितीय को केवल अर्हता मात्र करवा दिया था.
आरोप था कि उसमे पूछे जानेवाले अंगरेजी के गद्यांशों (द्विभाषी वाले नहीं) से अन्याय हो रहा था. साथ ही, गणित और तार्किक कौशल के प्रश्नों से इंजीनियरिंग माध्यम के छात्रों को लाभ पहुंच रहा था. आज आप यदि उच्च प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली को देखें, तो आंकड़ों और तार्किक रिपोर्टों के माध्यम से नयी योजनाएं बनाना और टेक्नोलॉजी की मदद से उनका निष्पादन करवाना सरकार का तरीका बन चुका है. हर विभाग के आंकड़ों को ऑनलाइन डैशबोर्ड में डाला जा रहा है, ताकि जनता कभी भी पारदर्शी तरीके से जांच सके. अपनी भाषाओं से प्रेम तो जरूरी है, किंतु हमें अंगरेजी सीखने से खुद को वंचित नहीं रखना चाहिए. साथ ही, किसी भी क्षेत्र में कैरियर बनाने को इच्छुक युवा गणित और तर्क क्षमता से दूर न भागें. आज नहीं तो कल, आपका सामना इनसे पड़ेगा ही.
हम देखते हैं कि कोई परीक्षा कैसे केवल छात्रों का स्थिर ज्ञान और किताबी कौशल्य ही न जांच कर, उनकी देश के घटनाक्रमों पर पकड़ और देश को अपना योगदान देने की उनकी तीव्र इच्छाशक्ति परख सकती है. उम्मीद है ये प्रतिभाशाली छात्र आनेवाले वर्षों में भ्रष्टाचार और पद-लोलुपता की भेंट न चढ़ कर 21वीं सदी के भारत को महान बनाने में कर्मठ योगदान देंगे.
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