फैशन और लैंगिक पहचान

Updated at : 06 Jul 2016 2:23 AM (IST)
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फैशन और लैंगिक पहचान

खुदा के बाग में हव्वा ने फल खाया, तो एहसास हुआ कि आदम और हव्वा दोनों नंगे हैं. उन्हें अचानक एहसास हुआ कि यह शर्म की बात है और उन्हें खुद को ढकना चाहिए, एक-दूसरे से, खुदा से, सबसे. लेकिन ड्रेस कोड क्या रहेगा, यह तय नहीं हुआ. मनुष्य ने सोचा होगा कि इतना काम […]

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खुदा के बाग में हव्वा ने फल खाया, तो एहसास हुआ कि आदम और हव्वा दोनों नंगे हैं. उन्हें अचानक एहसास हुआ कि यह शर्म की बात है और उन्हें खुद को ढकना चाहिए, एक-दूसरे से, खुदा से, सबसे. लेकिन ड्रेस कोड क्या रहेगा, यह तय नहीं हुआ. मनुष्य ने सोचा होगा कि इतना काम हम खुद कर लेंगे और जैसे श्रम का विभाजन उसने लैंगिक आधार पर किया, उसी तरह कपड़ों के तौर-तरीके भी बाद में लैंगिक आधार पर तय हो गये.

कपड़ा वह सबसे पहली चीज है, जिसे देखते ही हम किसी मानव आकृति के जेंडर का अंदाजा दूर से ही लगा लेते हैं. लंबे बाल, फ्रिल वाले कपड़े, रंग-बिरंगे दुपट्टे, साड़ी, कमीज वगैरह. इस तरह से आप लिंग के बारे में पहली झलक में नहीं बता सकते. अपने-अपने कॉस्ट्यूम धारण करके तद्नुसार अपनी भूमिकाएं, संवाद, हाव-भाव आदि बोलते हुए हम अपनी लैंगिक पहचान बनाते हैं और खुद को एक समुदाय के सदस्य भी घोषित करते हैं.

आदिम सभ्यताओं में, सिंधु घाटी सभ्यता को ही लें, उसमें भी स्त्री-पुरुषों के वस्त्राभूषणों, बालों की लंबाई में कुछ खास फर्क नहीं रहा, बल्कि कहना चाहिए कि सभ्यताओं के विकास के साथ-साथ कपड़ों, परिधानों में स्पष्ट लैंगिक अंतर पैदा किया गया. कॉर्सेट में बंधे स्त्रियों के शरीर फ्रिलदार कपड़ों में जितने कमनीय थे, उतने ही वे परिधान उनके लिए अव्यावहारिक और कष्टदायी. इसलिए पश्चिम में स्त्री आंदोलन के पहले चरण में स्त्री परिधानों को अधिक आरामदायक बनाने पर भी जोर दिया गया. विक्टोरियन ड्रेस रिफॉर्म इसी तरह का आंदोलन था. औरतों को सिर्फ मताधिकार ही नहीं चाहिए था, टाइटलेस और बंधे हुए कॉर्सेट भी जी का जंजाल थे.

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद स्त्रियों ने अपने परिधानों में और भी उन्मुक्त होने की कोशिश शुरू की और फ्रिल और कॉर्सेट आदि की जगह पैंट और शर्ट्स ने लेनी शुरू की. स्त्री बाहर निकल रही थी, कामकाजी हो रही थी और उसी हिसाब से उसके कपड़े उसके लिए अव्यावहारिक होते जा रहे थे. स्त्री परिधानों के संदर्भ में फैशन का अर्थ स्त्री की आजादी की मुहिम के साथ-साथ बदलना शुरू हुआ. उन्नीसवीं सदी के अंतिम और बीसवीं सदी के शुरुआती सालों में चार्ल्स डाना गिब्सन ने अपनी पेंटिंग्स में एक नयी स्त्री को जन्म दिया जिसे ‘गिब्सन गर्ल’ कहा गया. यह आत्मविश्वासी, सेंसुअस, आधुनिक, आखेटक, चित्रकार और कई आधुनिक कलाओं में निपुण स्त्री थी, जिसके सामने पुरुष धराशायी था. यह आदर्श शारीरिक आकृतिवाली गिब्सन गर्ल आधुनिक बार्बी की पुरखिन कही जा सकती है. यह विचित्र ही रहा कि विभिन्न समाजों में औरतों के कपड़ों में शालीनता और कामुकता दोनों को साथ-साथ साधने की कोशिश ज्यादा नजर आती है, आराम और व्यावहारिकता को साधने की कोशिश कम!

स्त्री को मेहनतकश की तरह नहीं, बल्कि ‘होमली’ और ‘ब्यूटिफुल’ की तरह देखा गया. यही वजह है कि औरतों के कपड़ों में इतनी जटिलता पायी जाती है. कई तरह की लटकन, लेस, कई गज का घेरा, कई तहें, एक पर दूसरी पर तीसरी. मुश्किल से ही स्त्री परिधानों में जेब मिलेगी. जिन पाश्चात्य ढंग के कपड़ों में जेब हैं, वे इतने तंग हैं कि जेब सिर्फ नाम भर को रह जाती है, इस्तेमाल के लिए नहीं, जैसे वह पुरुषों के परिधानों में होती है. स्त्रियों को जेब की जगह एक बैग पर भरोसा करना होता है. एक भानुमती का पिटारा! जिसमें अपनी आदिम भूमिका की तरह सब कुछ को समेटते हुए चलने में सुरक्षा और आश्वस्ति महसूस होती है स्त्री को. जाने कब किस चीज की जरूरत पड़ जाये के चक्कर में जरूरी और गैरजरूरी दोनों उस बैग में ऐसे गड्ड-मड्ड हैं, जैसे उसके जीवन में. उसके बावजूद बीसवीं सदी में औरतें अपने वेश में अधिक जेंडर न्यूट्रल हुईं. वे बेहिचक उन परिधानों को धारण करने लगीं, जिनसे पुरुष जेंडर की पहचान होती आयी थी. इस मायने में पुरुष आज भी अपेक्षाकृत दृढ़ हैं. कम-से-कम कस्बाई पुरुष अभी बहुत अड़ियल हैं.
इक्कीसवीं सदी अपने साथ नये किस्म की पुरुष पहचान के साथ आयी, जिसे मेट्रोसेक्सुअल पुरुष कहा गया. शहरी पुरुष जो फैशन, शॉपिंग और इसी तरह के पारंपरिक तौर पर स्त्रियों से जुड़ी हुई चीजों में रुचि लेने लगा. मेट्रो शहरों में लड़कों ने बाल लंबे रखना और चोटी रखना शुरू कर दिया. एक के बाद एक ऐसे फैशन स्टोर सामने आने लगे, जो खुद को ‘जेंडरलेस’ कह रहे थे. जिनका ध्यान सिर्फ गुणवत्ता, स्टाइल और फिट पर था, जेंडर पर नहीं. आज बाजार स्लिम फिट, लो वेस्ट जींस से अट गये हैं, लड़कियों और लड़कों दोनों के लिए. एक ऑनलाइन शॉपिंग स्टोर जबॉन्ग भी अपने ताजा विज्ञापन में बेहद जेंडर न्यूट्रल दिखता है.
इस संदर्भ में याद आता है कि पारसी थिएटर बड़े मशहूर थे एक वक्त. तब औरत का घर से निकलना और नाच-गाने में भाग लेना कोई अच्छी बात नहीं थी. इसलिए जब नाटक खेले जाते थे, स्त्री-पात्र की भूमिका पुरुष ही निभाया करते थे. यह हमें अजीब नहीं लगा कभी. बाल गंधर्व (नारायण श्रीपद राजहंस)मंच पर स्त्रियों की भूमिकाएं करने के लिए जाने जाते थे और यहां तक कि उनकी तसवीरें स्त्रियों के प्रसाधन बेचने के लिए इस्तेमाल की जाती थीं. आज भी कुछ रामलीलाओं में मोहल्ले के सबसे सुंदर और कमनीय लड़के ही सीता बनते हैं.
कोई कह सकता है कि कम-से-कम कपड़ों का पॉलिटिक्स से क्या लेना-देना. लेकिन ध्यान से देखें, तो यह सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान वाली आधारभूत जरूरत भर नहीं है. यह सोचना एक अतार्किक बात होगी, क्योंकि अगर कपड़ों का जेंडर से लेना-देना है, और उसी तरह वर्ग और धर्म से भी लेना-देना है, तो यह निश्चित ही ‘पॉलिटिकल’ है. अस्मिता के नये अर्थ खोजते हुए यह ध्यान रखना जरूरी है कि हमारे परिधान सिर्फ हमारी निजी पसंद की अभिव्यक्ति नहीं होते, उस पर कई तरह के सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक असर होते हैं. यह प्रशिक्षण भी है स्वयं को एक समुदाय के सदस्य की तरह दर्शाने और स्वीकृति पाने का. इसलिए ‘पिंक एंड ब्ल्यू’ के द्वित्व को फोड़ कर यह जो नयी पहचान उगना शुरू हुई है, अगर यह नयी पीढ़ी को लुभा रही है, तो हमें अपने वस्त्रों की पारंपरिक जेंडर ट्रेनिंग और जड़ता पर जरूर विचार करना चाहिए.
सुजाता
युवा कवि एवं लेखिका
chokherbali78@gmail.com
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