ढाका के बाद

Updated at : 04 Jul 2016 3:19 AM (IST)
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ढाका के बाद

ढाका में शुक्रवार को आतंकी नृशंसता ने अपना विकृत चेहरा फिर उजागर किया है. रमजान के पवित्र महीने में धर्म के नाम पर किये गये इस कत्लेआम से समूची मानवता शर्मसार हुई है. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस क्षोभ को इन शब्दों में व्यक्त किया है- ‘ये कैसे मुसलमान हैं जो रमजान के […]

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ढाका में शुक्रवार को आतंकी नृशंसता ने अपना विकृत चेहरा फिर उजागर किया है. रमजान के पवित्र महीने में धर्म के नाम पर किये गये इस कत्लेआम से समूची मानवता शर्मसार हुई है. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस क्षोभ को इन शब्दों में व्यक्त किया है- ‘ये कैसे मुसलमान हैं जो रमजान के दौरान हत्याएं करते हैं? मैं आतंक को शह देनेवालों से पूछना चाहती हूं कि निर्दोष लोगों की जान लेकर तुम्हें क्या मिलता है? इसलाम शांति का धर्म है, तुम इसे बदनाम कर रहे हो.’ बीते दिनों कश्मीर में हुए आतंकवादी हमले के बाद जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी कहा था कि ‘यह बात मेरी समझ से परे है कि कोई इसलाम के नाम पर ऐसी निर्मम हरकत कैसे कर सकता है’.

पिछले कुछ दिनों के भीतर बांग्लादेश के अलावा तुर्की, सोमालिया, अफगानिस्तान और केन्या में भी ऐसी भयावह वारदातें हुई हैं. सीरिया और इराक में ऐसे हमले रोजमर्रा की बात हो चुके हैं. ऐसे हमलों में उस देश के लोगों के साथ अन्य देशों के नागरिक भी मारे जाते हैं. यह जगजाहिर तथ्य है कि आतंकवाद एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है और दुनिया के अधिकतर देश कमोबेश इसकी दहशत के शिकार हैं. ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हर देश स्थानीय स्तर पर इस भयंकर खतरे को रोकने के लिए पूरी कोशिश करे तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय मिल-जुल कर इस समस्या के दीर्घकालीन समाधान की दिशा में पहल करे. धर्म के नाम पर राजनीतिक लाभ उठाने की वैश्विक प्रवृत्ति ने आतंक को पसरने और ताकतवर होने में बड़ी भूमिका निभायी है. विभिन्न देशों के कूटनीतिक स्वार्थों ने भी आतंक के विरुद्ध साझा कार्रवाई की संभावनाओं को कुंद किया है.

अब जब आतंकवाद की विभीषिका से कोई भी क्षेत्र या महादेश अछूता नहीं बचा है, तब इसके खिलाफ ठोस एकजुटता की जरूरत बहुत बढ़ जाती है. अब क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के दावं-पेचों में पड़ कर आंख मूंदे बैठे रहने का समय नहीं है. इस सच्चाई को अमेरिका समेत पूरे पश्चिम को भी समझना होगा तथा लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और अरब समेत एशियाई देशों को भी. आतंक के विरुद्ध चल रहे मौजूदा संघर्ष के अब तक के नतीजों की समीक्षा भी होनी चाहिए.

आतंकी हमलों, उसे उकसानेवाली समझ तथा उसे पनाह और प्रश्रय देनेवाली प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने के प्रयास में राजनीतिक नेतृत्व के साथ सामाजिक और सामुदायिक तौर पर प्रभावशाली लोगों और संगठनों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है. ऐसे लोगों और संगठनों को पूरी जिम्मेवारी के साथ आगे आना होगा. मानवता को इस विध्वंसक चुनौती से बचाने के लिए एक व्यापक जनमानस तैयार करने की जरूरत है. इस प्रक्रिया में आम लोगों और समाजों को भी योगदान करना होगा. आतंकी हमले उस सिलसिले का चरम-बिंदु होते हैं जिसकी शुरुआत घृणा, कट्टरपंथ और नकारात्मक सोच की बुनियाद से होती है तथा ये रुझान समाज के भीतर रोजाना के जीवन में पलते-बढ़ते हैं.

आतंकवाद से निबटने की कोशिश में एक तो सामाजिक स्तर पर सक्रियता और सतर्कता जरूरी है, दूसरी तरफ हमें वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग और लामबंदी को सघन करना होगा. ढाका की त्रासदी के बाद भारत ने एक बार फिर यह मांग उठायी है कि सितंबर में होनेवाले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर ठोस समझदारी बनायी जाये. दो दशक पहले 1996 में भारत ने कंप्रिहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म का प्रस्ताव दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन में इस प्रस्ताव पर सहमति बनाने का आह्वान कर चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत सैयद अकबरुद्दीन ने भारत की मांग को दोहराते हुए उचित ही कहा है कि इस विश्व संस्था में आतंकी हमलों की निंदा करना और पीड़ितों से हमदर्दी जताना नाकाफी है. इस प्रस्ताव में भारत ने कहा है कि आतंकवाद आतंकवाद है तथा इसे अच्छे और बुरे की श्रेणी में बांटना ठीक नहीं है. दुनिया के सभी आतंकी गिरोहों पर पाबंदी तथा उनके आर्थिक स्रोतों और पनाहों को बंद करने का सुझाव भी इसमें है. भारत की यह भी मांग है कि सीमापार से होनेवाले हमलों के दोषियों के प्रत्यर्पण का कानून बनना चाहिए. इस कंवेशन पर अमेरिका, लैटिन अमेरिका और अरब देशों को अलग-अलग कारणों से आपत्ति है. दुर्भाग्य की बात यह है कि ये देश अपनी आपत्तियों को लेकर कभी भी बहुपक्षीय स्तर पर विचार-विमर्श के लिए प्रयासरत नहीं रहे हैं.

इस कारण विभिन्न मुद्दों पर व्यापक सहमति भी नहीं बन सकी है. इन दो दशकों में आतंक के खतरों और उनसे जूझने की बातें तो होती रहीं, पर जमीनी स्तर पर बेपरवाही का आलम रहा जिसका लाभ आतंकवाद को मिलता रहा है. इसका परिणाम आज एक भयावह त्रासदी के रूप में हमारे सामने है जो मानवता के भविष्य को निराशाजनक अंधेरे की ओर धकेल रही है. उम्मीद की जानी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अपनी जिम्मेवारी और जवाबदेही को समझते हुए आतंकवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय समझदारी और साझेदारी की ओर बढ़ेगा.

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