साहस, मूल्य और मर्यादा की याद!

-हरिवंश- इस बार शब्द संसार स्तंभ का नाम प्रेरणा होना चाहिए. 1960 से पहले मदाम क्यूरी पुस्तक आयी थी. यह पुस्तक लिखी, उनकी पुत्री यू.क्यूरी ने. मां और बेटी दोनों को नोबेल पुरस्कार, यह भी रेयर चीज है. मदाम क्यूरी की बेटी ने अपनी मां पर यह पुस्तक लिखी थी. उस पुस्तक में कुछ मार्मिक […]
-हरिवंश-
किराये पर उसने एक सुविधाविहीन कोठरी ली. बचपन से ही उसने पाया कि जीवन संघर्षमय है. पेरिस आने के पहले फी जुटाने के लिए वह एक संपन्न पोलिश परिवार में बच्चों की गवर्नेंस रहीं थीं. जीवन गुजारने के लिए मामूली पैसे उपलब्ध थे. वह कोयला का खर्च बचाती. सर्दियों में अंगीठी नहीं जलाती थीं, पर रात-रात भर बैठकर पढ़ती थी. डबलरोटी और मक्खन पर महीनों गुजर जाते थे. अंडा या सेव दुर्लभ थे. पौष्टिक भोजन न मिलने से वह बेहोश हो जाती. फिर भी उसके संकल्प और साधना अटूट थे. फ्रांस के ही एक मेधावी वैज्ञानिक प्येर क्यूरी उसके जीवन में आये. आकर्षक व्यक्तित्व के धनी. 1894 में प्रयोगशाला में दोनों मिले. कुछ महीनों बाद प्येर ने विवाह का प्रस्ताव रखा. उसे दस माह लगे विचार करने में. अंतत: उसने यह प्रस्ताव मान लिया. मारी, मदाम मारी क्यूरी बन गयीं. दोनों के लिए अभाव के दिन थे. घर में मामूली चीजें थीं. पर प्रयोगशाला में दोनों डूबे रहते. मारी ने फिजिक्स और केमेस्ट्री में मास्टर आफ साईंस की उपाधि प्राप्त की. फिर डाक्टर की उपाधि के लिए पढ़ाई शुरू की. पति-पत्नी दोनों ने शोध के लिए विषय तय किया, यूरेनियम से किरणें क्यों निकलतीं हैं, इसका स्रोत क्या है.
पर कोई प्रयोगशाला थी नहीं. गोदाम में इस महान आविष्कार की शुरूआत हुई. मारी यूरेनियम किरणों के रहस्य खोजने में डूबीं. पाया थोरियम से भी स्वत: किरणें निकलतीं हैं. फिर उन्होंने इसका नाम दिया रेडियोएक्टिविटी. इस तरह एक नया पदार्थ ढूंढ़ा. नये रहस्य का उद्घाटन. पति प्येर भी इस आविष्कार में साथ थे. इस तरह 1898 जुलाई में एक विशेष तत्व की खोज हुई. मारी ने अपने देश पोलैंड के नाम पर इसे पोलोनियम नाम दिया. उसी वर्ष दिसंबर में दूसरा तत्व मिला. उसका नाम पड़ा, रेडियम. यह प्रयोगशाला सुविधाविहीन था. गरमियों में गरम भट्ठी. सर्दियों में बर्फ का घर.
न इनके पास अतिरिक्त पैसा था, न कोई सरकारी सहायता थी. आधी-आधी रात तक दोनों खोज और शोध में डूबे रहते. पर बाधाओं ने उन्हें और मजबूत बनाया. अंतत: एक रात गोदाम के अंधकार में रेडियम झिलमिलाया. दोनों झूम उठे. 1902 की वह रात अमर हो गयी. रातों रात क्यूरी दंपती विश्व प्रसिद्ध हो गये.
फिर रेडियम से तो कैंसर जैसे असाधारण रोगों का इलाज होनेवाला है. ऐसी हालत में व्यापारिक दृष्टि से इस पर विचार करना भी वैज्ञानिक भावना के प्रतिकूल होगा.’’ इस तरह यह शोध सामने आया. फिर 1903 में क्यूरी दंपती को रेडियोएक्टिविटी के लिए भौतिक विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
आज भारत में इस चरित्र के कितने विद्वान हैं? अभावों में जीते पर साधना में डूबे? जब सारी दुनिया सोती हो, तब भी वे शोध में डूबें हों. ठिठुरते हुए या गरमी में झुलसते हुए. फिर भी अपने आदर्श से समझौता न करे. प्येर-मारी विश्वप्रसिद्ध हो गये. दुनिया उनको बुलाने के लिए आतुर. घर पर मिलनेवालों की भीड़. वे उब गये. मारी ने लिखा, हमारा शांतिपूर्ण कर्ममय जीवन विध्वस्त हो गया है. इतने मशहूर वैज्ञानिक पर ख्याति, लोकप्रियता के उन्माद से अछूते.
एक बार फ्रांस के राष्ट्रपति ने उन्हें एलीसी पैलेस में दावत दी. दावत के बाद राष्ट्रपति लोबे की पत्नी ने मारी से कहा, ग्रीस के राजा से आपका परिचय करवा दूं? मारी ने भोलेपन से कहा, क्या इसकी विशेष आवश्यकता है? सत्ता, प्रसिद्धि और चकाचौंध की दुनिया से दूर, ये दोनों वैज्ञानिक शोध की अपनी दुनिया में जुटे थे. 1906 अप्रैल में दुर्भाग्य आया. प्येर एक सड़क दुर्घटना में नहीं रहे. मारी की तो जैसे दुनिया उजड़ गयी. पर अद्भुत स्वाभिमान था, इस महिला में. फ्रेंच सरकार ने मारी और उसके बच्चों के गुजारे के लिए पेंशन की घोषणा की. पर आत्मसम्मान की प्रतिमूर्ति मारी ने उत्तर दिया, मुझमें अभी काम करने की शक्ति शेष है. बच्चों का और अपना प्रबंध मैं स्वयं कर लूंगी. इस तरह सधन्यवाद, उन्होंने फ्रांस सरकार का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया.
इस तरह मारी ने लिटिल क्यूरी के नाम से और भी एक्स-रे गाड़ियां बनवायीं. उन्हें दुनिया के कोने-कोने से बुलावा आने लगा. विश्वयुद्ध के चार वर्षों तक उन्हें एक्स-रे यंत्रों के सामने दिन-रात रहना पड़ा. रोगियों की मदद के लिए. वह जानतीं थीं, रेडियम उनके रक्त में घर कर रहा है. फिर भी वह समाज के लिए सक्रिय रहीं, अपना बचाव नहीं किया.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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