दूसरी दुनिया बसाने का सुख !

-हरिवंश- यह पुस्तक अनमोल है. कथानक और विषय के संदर्भ में. लीक से हटकर. बचपन में ही कहावत सुनी थी, लीक छाड़ि तीन चले, शायर, सिंह, सपूत. यह किसी सपूत की कथा है. प्रसंग और सवाल वही, जो जीवन में पग-पग पर हम सब फेस करते हैं. बुद्ध ने युवावस्था में ही जरा, जीवन और […]
-हरिवंश-
इसलिए बुद्ध रोज-रोज नहीं होते. पर वे सवाल हर जगह हैं. हरेक के लिए हैं. पर हम सब इन्हीं सवालों से तालमेल बैठाकर जीने लगते हैं. जीने का व्याकरण गढ़ लेते हैं. जो इस व्याकरण से जितना अलग हुआ, उसी अनुपात में भिन्न या विशिष्ट हुआ. इसी तरह जीवन के स्थापित मापदंडों से जॉन वुड अलग चले. लीक से हट कर. इसी कारण उनकी लिखी पुस्तक अनमोल लगी. पुस्तक का नाम है, लीविंग माइक्रोसॉफ्ट टू चेंज द वर्ल्ड (एन इंटरप्रेन्योर्स ऑडेसि टू एजूकेट द वल्डर्स् चिल्ड्रेन). पुस्तक छापी है, न्यूयार्क स्थित कॉलिंस पब्लिकेशन ने. किताब की भारतीय कीमत है, 661 रुपये.
एक बालक से मुलाकात हुई, जो अशिक्षित था, पर अत्यंत समझदार, स्मार्ट और तेज. वहीं पशुपति नाम के एक व्यक्ति से भी मुलाकात हुई. पशुपति ने जॉन से कहा, कभी-कभी मैं अपने देश के लिए रोता हूं, क्योंकि मेरी इच्छा है कि मेरे देश का हर बालक अच्छी शिक्षा पाये. लेकिन मैं विफल हो रहा हूं. हर पश्चिमी की तरह जॉन भी अधिक सुनने और जानने को उत्सुक थे. उन्होंने नेपाल की अशिक्षा के बारे में सुना. 70 फीसदी अशिक्षित. फिर पशुपति उन्हें पास में एक स्कूल भी ले गये. वहां एक अध्यापक ने उनसे लाइब्रेरी के लिए पुस्तकें मांगी. जॉन ने हां कह दिया. एक टीचर ने टिप्पणी की. ट्रेंकिंग करनेवाले असंख्य लोग आते हैं और मदद का वायदा कर लौट जाते हैं. करते कुछ नहीं. जॉन से बच्चों ने कहा, आप फिर आयेंगे किताबों के साथ. और इस बात ने जॉन की जिंदगी बदल दी. जॉन दुनिया के अनेक देशों में अपने ढंग के अनूठे अभियान में लग गये. स्कूल बनाने, लाइब्रेरी खोलने और बच्चों को स्कूल भेजने में. जॉन के इस काम में उनके पुराने मित्रों और बड़ी कंपनियों ने उदारता से मदद की.
फिर तो जॉन का यह काम एक आंदोलन ही बन गया. पर उसके पहले जॉन जब स्कूल देख कर हिमालय की ट्रेकिंग के लिए आगे बढ़े, तो उन्हें माइक्रोसाफ्ट का अपना जीवन याद आया. वह अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग में निपुण माने जाते थे. उन पर काम का यह दवाब था कि वह एक साथ अनेक जगहों पर रहे. मसलन शुक्रवार को जोहांनिसबर्ग में, सोमवार को ताइवान में, बुध को कहीं और. प्रजेंटेशन देते हुए, मीटिंग करते हुए, प्रेस से बात करते हुए, फिर यात्रा पर निकलते हुए उन्हें याद आया, आर्थिक दृष्टि से नौकरी तो सर्वश्रेष्ठ है, पर अत्यंत दवाब और तनाव का केंद्र भी. वह याद करते हैं कि नौकरी में मेरा मूलमंत्र था, जब आप मर जाते हैं या दफना दिये जाते हैं, तभी आप सो पाते हैं. 1991 से 1998 तक के सात वर्ष टेक्नोलॉजी उद्योग के उत्थान वर्ष थे. खासतौर से माइक्रोसॉफ्ट के लिए. इस तरह जॉन कहते हैं, मुझें यात्रा में ही लगा कि मैं नौकरी की क्या कीमत चुका रहा हूं?
जॉन के पास निजी बैंक बैलेंस नहीं है. वह किराये के घर में रहते हैं. अविवाहित हैं. उनके मित्र अपनी लंबी उड़ानों से मिले अतिरिक्त प्वाइंट से प्राप्त टिकट उन्हें यात्रा के लिए उपलब्ध कराते हैं. जॉन 20-22 घंटे की यात्रा कर एशिया, अफ्रीका के उन गरीब मुल्कों में जाकर, अपने अभियान में डूबे रहते हैं. वह कहते हैं, रूम टू रीड अभियान, जनरल इलेक्ट्रिक (दुनिया की सबसे मशहूर कंपनी) की इफीसियेंसी और मदर टेरेसा की करुणा से संचालित है. वह याद करते हैं कि इन स्कूलों और लाइब्रेरियों में लगभग दस लाख बच्चे आज शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. फिर वह जे डब्लू वानगोथे का एक कथन उद्धृत करते हैं.
गोथे ने महान संगीतज्ञ बीथोवेन के ‘फिफ्थ सिंफोनी’ के बारे में लिखा. अगर दुनिया के सारे संगीतज्ञ एक साथ यह धुन बजाने लगें, तो यह धरती अपनी धुरी से खिसक जायेगी. पुस्तक की अंतिम लाइन में जॉन कहते हैं, शिक्षा के बारे में यही महसूस करता हूं. जिस दिन विकासशील देशों के सभी बच्चे एक साथ पढ़ने लगे, फिर अद्भुत घटित होगा.
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