चीन के आईने में भारत

-हरिवंश- चीन – उत्सुकता पैदा करता है. जानने-समझने और देखने के लिए. रहस्यों से घिरा मुल्क-समाज. अतीत (इतिहास)का जादू अलग. फाह्यान और ह्वेसांग का मुल्क. 2002 में चीन गया, कुछेक शहर देखें. तब समझा कि मनुष्य, समाज या राष्ट्र में कितनी संभावनाएं हैं? 50 के दशक में जो देश सूई नहीं बना सकता था (मुहावरे […]
-हरिवंश-
मनुष्य के पौरुष, पुरूषार्थ, संकल्प और कर्म-श्रम के चमत्कार. हमारी पीढ़ी ने बचपन में ही चीनी हमले, देश का सदमा और नेहरूजी की मौत के प्रसंग सुना. इस कारण यह मुल्क भय भी पैदा करता है. भविष्य के भारत के लिए चिंता का प्रसंग. हमारे मौजूदा नेता, चीनी नेतृत्व की क्षमता, काबिलियत और विजन के मुकाबले बहुत पीछे हैं. चीन की शासन प्रणाली ही भिन्न नहीं है, पहले से ही वहां के जीवन-समाज में एक आंतरिक अनुशासन है. संकल्प है. एक अत्यंत सक्षम और चुस्त कार्यसंस्कृति है.
वह यात्रा विफल थी. उस यात्रा के अंदरूनी तथ्य भी पुस्तक में हैं. फिर राजीव गांधी जब अपने कार्यकाल में चीन गये, देंग के साथ बातचीत की, तब नटवर सिंह भी उनके साथ थे. दशकों पहले टूटे संबंध राजीव गांधी के कार्यकाल में पुन: बने. उस यात्रा के अनुभव भी इस पुस्तक में हैं.
पंडित जी ने चीन, पंचवर्षीय योजना और दक्षिण अफ्रीका पर कुछेक सवाल पूछे. पहला सवाल हिंदी में ही था, क्या हमें चीन से कोई खतरा है? फिर नटवर सिंह कहते हैं कि इस तरह मेरी अग्नि परीक्षा खत्म हुई. इस एक प्रसंग से जाहिर है कि भारत के राष्ट्र निर्माता कैसे थे? किस तरह वे अफसरों को प्रशिक्षित और प्रेरित (ग्रूमिंग) करते थे. भारत बनने के वे शुरूआती वर्ष थे. पर, भारत बनानेवाले बड़े नेता हर क्षेत्र पर निगाह रखते थे. कैसे ब्यूरोक्रेसी को पर्सनल टच से उत्साहित करते थे. यह संकेत स्पष्ट है.
फिर वह चीन रवाना हुए. तब चीन भी एक बनता हुआ देश था. हालांकि चीन तब तक विश्वशक्ति नहीं था. पर इसके नेताओं की विश्वस्तरीय पहचान थी. 1953 में स्टालिन नहीं रहे. फिर माओ साम्यवादी दुनिया के सबसे बड़े नेता थे. पुस्तक में कई महत्वपूर्ण प्रसंग हैं. पहली बार माओ को देखने-मिलने का प्रसंग, भारत से चीन आनेवाले महत्वपूर्ण लोगों के बारे में वर्णन. एक जगह प्रो. माहलनवीस के चीन आने का उल्लेख है. वह चीन के अतिथि के रूप में बीजींग गये थे. उन्होंने वहां टिप्पणी की कि चीनी लोग क्रियान्वयन में भारत से आगे हैं. भारत की पंचवर्षीय योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर वह निराश थे. उनका मत था कि चीन में क्रियान्वयन ‘फर्स्ट रेट’ (सर्वश्रेष्ठ स्तर) का था. इस बीच नटवर सिंह ने भारत में जनसंख्या नियंत्रण के बारे में उनसे जानना चाहा. उनका जवाब था कि अंग्रेजी में पोस्टर निकालने और अखबारों में विज्ञापन दिलाने के अलावा कुछ नहीं होता. उन्होंने यह भी कहा कि अगर चीजें नहीं सुधरीं, तो हमें सैकड़ों नेहरू बचा नहीं पायेंगे. नटवर सिंह और प्रो. माहलनवीस का यह संवाद भारत के लिए बड़ा अर्थपूर्ण है.
वह 7 अप्रैल 1957 का स्मरण करते हैं, किसी वीआईपी के साथ प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाइ से मिलने गये. तब केरल में कम्युनिस्ट सरकार जीत कर सत्तारूढ़ हुई थी. नटवर सिंह बताते हैं कि चाउ-एन-लाइ ने उन्हें केरल के चुनाव परिणाम के एक-एक तथ्य बताये. आंकड़े और सामाजिक, आर्थिक हालात के ब्योरे. नटवर सिंह लिखते हैं कि हमारे दूतावास के पास एक भी सूचना नहीं थी. पर चीन के पास सभी सूचनाएं थीं. यह प्रसंग पढ़ते हुए कोल इंडिया के एक अधिकारी की बात याद आयी. लगभग डेढ़-दो साल पहले, कोल इंडिया का एक दल प्रशिक्षण के लिए चीन गया. उसके संयोजक को एक चीनी कोल अधिकारी से मुलाकात हुई. कर्टसी (शिष्टाचार) काल में. उस चीनी अधिकारी ने कोल इंडिया में अफसरों के कितने ग्रेड हैं, कौन-कौन से अफसर हैं, उनके क्या ग्रेड हैं, वे कितने महत्वपूर्ण जगह पर काम करते हैं, इन सब चीजों की चर्चा कर दी,वह स्तब्ध रह गये. यह है चीन के लोगों की बारीकियों में जाने की आदत.
किसी चीज की गहराई में उतर कर जानने और काम करने की प्रवृति. भारत के तत्कालीन स्पीकर के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल माओ से भी मिला. हमारे प्रतिनिधिमंडल में कैसे नेता थे, वे किस तैयारी से गये थे. दूसरी ओर चीन के नेता किस तरह की तैयारी के साथ मिले, इन सबका पुस्तक में उल्लेख है. इन प्रसंगों से मालूम होता है कि चीनी कौम की कार्य संस्कृति, कार्यशैली और विजन क्या है. भारत इस मामले में कितना पीछे, कैजुअल और लापरवाह है. चीन के आईने में भारत को समझने में मददगार है यह पुस्तक.
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