चीन की हार
Updated at : 07 Jun 2016 7:04 AM (IST)
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हाल में की गयी प्रधानमंत्री की ईरान यात्रा बेहद सफल रही. एक तरफ ईंधन आॅयल से संबद्ध कुछ पुराने बकाये की रकम भारत ने ईरान को चुकाये. सबसे महत्वपूर्ण था चाबहार बंदरगाह पर भारत व ईरान के बीच द्विपक्षीय समझौते. रक्षा विशेषज्ञ इसे सामरिक समझौते के मामले में ‘गेम चेंजर’ के रूप में देख रहे […]
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हाल में की गयी प्रधानमंत्री की ईरान यात्रा बेहद सफल रही. एक तरफ ईंधन आॅयल से संबद्ध कुछ पुराने बकाये की रकम भारत ने ईरान को चुकाये. सबसे महत्वपूर्ण था चाबहार बंदरगाह पर भारत व ईरान के बीच द्विपक्षीय समझौते. रक्षा विशेषज्ञ इसे सामरिक समझौते के मामले में ‘गेम चेंजर’ के रूप में देख रहे है.
मालूम हो कि दक्षिण पश्चिम ईरान-पाकिस्तान सीमा पर स्थित चाबहार बंदरगाह ओमान की खाड़ी के किनारे एक महत्वपूर्ण ईरानी बंदरगाह है. इसे विकसित करने के लिए भारत से पूर्व चीन ने भी ईरान से संपर्क किया था.
चीन के प्रस्ताव के पीछे उसकी छुपी मंशा थी-इस सामरिक बंदरगाह का इस्तेमाल भारत को उसको पश्चिमी किनारे से घेरने के लिए करना. हालांकि, इसके पहले पाकिस्तान ने ग्वादर बंदरगाह, जो कि चाबहार के पूरब में करीब साढ़े तीन सौ किमी दूर है, पहले ही चीन को सौंप चुका है. इस लिहाज से भी भारत ने ईरान से यह डील कर चीन और पाकिस्तान दोनों को एक साथ चित किया है.
साथ ही चाबहार बंदरगाह के विकसित होने, चाबहार व अफगानिस्तान से सीधा सड़क मार्ग चालू हो जाने से भारत व अफगानिस्तान के बीच भी बिना पाकिस्तान गये, सड़क संपर्क हो जायेगा. इससे मध्य एशिया में भारत अपनी सामरिक स्थिति मजबूत कर शक्ति संतुलन कर सकेगा.
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