''स्कूल चलें हम'' और इसकी सार्थकता
Updated at : 20 Apr 2016 5:53 AM (IST)
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पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार और शिक्षा मंत्रालय द्वारा बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्ति के अवसर को सरल और सहज बनाने का भरपूर प्रयास किया गया है़ आज लगभग हर स्कूल का अपना भवन, शौचालय, बेंच-डेस्क और पुस्तकालय-प्रयोगशाला है़ शिक्षकों की कमी भी दूर करने के प्रयास जारी हैं. अभिभावकों के मन में यह […]
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पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार और शिक्षा मंत्रालय द्वारा बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्ति के अवसर को सरल और सहज बनाने का भरपूर प्रयास किया गया है़ आज लगभग हर स्कूल का अपना भवन, शौचालय, बेंच-डेस्क और पुस्तकालय-प्रयोगशाला है़ शिक्षकों की कमी भी दूर करने के प्रयास जारी हैं.
अभिभावकों के मन में यह सोच विकसित होने लगी है कि शिक्षा के बिना उनके बच्चों का हित संभव नहीं. यह ‘स्कूल चलें हम’ जैसे अभियानों का ही प्रभाव है कि अपने सामर्थ्य के अनुसार, आज हर कोई अच्छी शिक्षा की तलाश में पेट काट कर भी अपने बच्चों का नामांकन निजी विद्यालयों में कराना चाहता है़
उम्मीद की जानी चाहिए कि बहुत जल्द साधन-संपन्न सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी दूर होने से सरकारी विद्यालयों पर आम नागरिकों का विश्वास बढ़ेगा और शिक्षा के बाजारीकरण पर अंकुश लगेगा.
अमरेश कुमार, हंसडीहा, दुमका
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