नफरत फैलाना राष्ट्रवाद नहीं

Updated at : 22 Mar 2016 6:24 AM (IST)
विज्ञापन
नफरत फैलाना राष्ट्रवाद नहीं

आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया बीते दिनों महाराष्ट्र में ‘भारत माता की जय’ न कहने को लेकर एक मुसलिम विधायक को निलंबित कर दिया गया. उस विधायक का कहना है कि ‘भारत माता की जय’ नहीं कहेंगे, बल्कि वे ‘जय हिंद’ कहेंगे. ‘भारत माता की जय’ या ‘जय हिंद’, इन दोनों नारों में […]

विज्ञापन
आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
बीते दिनों महाराष्ट्र में ‘भारत माता की जय’ न कहने को लेकर एक मुसलिम विधायक को निलंबित कर दिया गया. उस विधायक का कहना है कि ‘भारत माता की जय’ नहीं कहेंगे, बल्कि वे ‘जय हिंद’ कहेंगे.
‘भारत माता की जय’ या ‘जय हिंद’, इन दोनों नारों में अंतर क्या है, मैं सचमुच आश्वस्त नहीं हूं, लेकिन इतना जरूर है कि महाराष्ट्र के उस विधायक के निलंबन पर सवाल उठता है कि क्या किसी के एक नारा न लगाने भर से ही उसे निलंबित किया जा सकता है?
बीते 19 मार्च को अंगरेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट आयी कि उर्दू लेखकों को इस बात की गारंटी देनी होगी कि वे अपनी किताबों में भारत-विरोधी जैसी कोई बात नहीं लिख रहे हैं.
स्मृति ईरानी के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत आनेवाले राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद् (नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज यानी एनसीपीयूएल) ने उर्दू लेखकों से इस बाबत जो हलफनामा मांगा है, वह इस प्रकार है- ‘मैं….. पुत्र/ पुत्री….. इस बात की पुष्टि करता/करती हूं कि मेरी किताब/ पत्रिका जिसका शीर्षक…….. है, जिसे राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद् की वित्तीय सहायता योजना के तहत भारी खरीद की अनुमति मिली है, में भारत सरकार के खिलाफ कुछ भी नहीं लिखा गया है या राष्ट्रहित के खिलाफ कुछ भी नहीं छपा है, यह भारत के विभिन्न वर्गों-समुदायों आदि के बीच सौहार्द को नुकसान पहुंचाने जैसी कोई बात नहीं है और इसे किसी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से किसी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिली है.’
इस खबर को पढ़ने के बाद हममें से वे सभी लोग इस बात से निराश होंगे कि अब राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रविरोध की नकली और मनगढ़ंत बहस बहुत जल्द खत्म हो जायेगी. देश की मौजूदा परिस्थितियों से तो यही लगता है कि मौजूदा केंद्र सरकार मेक इन इंडिया के नाम पर जो सबसे बड़ा काम करना चाहती है, वह है- समरसता बिगाड़ना और चिंता पैदा करना. मैं बहुत से दूसरे मुद्दों-मसलों पर लिखना चाहता हूं, जैसे कि अभी क्रिकेट का टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप चला रहा है, उस पर लिखना चाहता हूं. लेकिन समाज में चल रहे उथल-पुथल से मैं गंभीर विषयों पर लिखने के िलए मजबूर हो जाता हूं.
हमारे देश में हिंदुत्व राष्ट्रवादी जिस प्रकार के राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, वह एक अलग प्रकार का राष्ट्रवाद है. हिंदुत्व का यह राष्ट्रवाद यूरोप का वह राष्ट्रवाद बिल्कुल नहीं है, जिसे एक देश की दूसरे देश के प्रति भावना के रूप में परिभाषित किया जाता रहा है.
पहला विश्वयुद्ध इसलिए हुआ था, क्योंकि कई देश आपस में एक-दूसरे से नफरत करते थे. सर्बियाई लोगों से ऑस्ट्रियाई मूल के हंगरीवासी (ऑस्ट्रो-हंगरियंस) नफरत करते थे. ऑस्ट्रो-हंगरियंस से रशियन नफरत करते थे. रशियन से जर्मन नफरत करते थे और जर्मन से फ्रांसीसी नफरत करते थे. फिलहाल मुझे याद तो नहीं आ रहा कि इटली इस युद्ध में क्यों कूदा, लेकिन यह सच जरूर है कि अंगरेज लोग दुनिया के हर किसी से नफरत करते थे. यही वजह है कि जब चिंगारी उठी, तो हर कोई एक-दूसरे से लड़ने लगे. पहले विश्वयुद्ध में तुर्क, अरब, भारत और अमेरिका आदि भी कूदे थे.
देशों की आपसी नफरत से उपजे दो विश्वयुद्धों ने यूरोप की प्रांतीयता समाप्त कर दी. लेकिन उन्होंने खुद को संभाला और यूरोपीय यूनियन को खड़ा किया. यूरोपीय यूनियन ऐसे लोगों का समूह था, जो अराष्ट्रीयकरण चाहते थे और मुक्त बाजार के लिए अपने देशों की सीमाएं एक-दूसरे के लिए खोलना चाहते थे.
वहीं मौजूदा भारत में राष्ट्रवाद किसी दूसरे देश के विरुद्ध नहीं है, बल्कि यह देश के भीतर ही है. इसीलिए यह यूरोपीय राष्ट्रवाद से अलग है. हमारे महान राष्ट्रभक्त अपने ही लोगों के विरुद्ध हैं, न कि किसी दूसरे देश के विरुद्ध. हमारे नकली राष्ट्रवादी उनके धर्म या विचारों के कारण अपने ही नागरिकों के पीछे पड़े हुए हैं. राष्ट्रवादियों का उन्माद ही उनका असली दुश्मन है. उनका ऐसा करना देश के लिए प्यार नहीं है. यह सिर्फ नफरत है.
भारतीय मुसलमानों और दलितों को सताना राष्ट्रवाद नहीं है. बड़ी आसानी से हम किसी पर अरोप लगाते हुए राष्ट्र-विरोधी शब्द का इस्तेमाल कर लेते हैं. यूरोपीय भाषाओं में भी अब इस शब्द का इस्तेमाल नहीं होता है. ऐसे में यह कौन तय करेगा कि सकारात्मक राष्ट्रवाद क्या है? फिलहाल ‘भारत माता की जय’ कहने के अलावा मैं नहीं जानता कि भारतीय राष्ट्रवाद क्या है.
पिछले दिनों जेएनयू कैंपस में राष्ट्रवाद पर कई ओपन लेक्चर्स आयोजित हुए हैं. यह एक बेहतरीन कोशिश है, लेकिन मुझे डर है कि इसका कुछ खास फायदा नहीं होगा. परिस्थिति के मुताबिक, आप जब तक जोर लगा कर ‘भारत माता की जय’ बोलते रहेंगे, आप भारत में राष्ट्रवादी बने रहेंगे.
पिछले दिनों एक और खबर आयी. झारखंड में दो मुसलिम लड़कों को मार कर पेड़ से लटका दिया गया, जैसा कि अमेरिका में अफ्रीकी अमेरिकियों के साथ होता था. खबरों के मुताबिक, वे लड़के भैंसों को ले जा रहे थे, इसलिए यह स्पष्ट नहीं कि उनकी गलती क्या थी. लेकिन, इतना तय है कि वहां नफरत थी. सवाल है कि क्या इस घटना से सरकारों को कोई फर्क पड़नेवाला है? बिलकुल नहीं. भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने जा रही है और यह कहा जा रहा है कि इस बैठक में ‘राष्ट्रवाद’ पर फोकस रहेगा. क्या हमारे देश में इस विषय पर पहले ही बहुत कुछ नहीं हुआ है? क्या भाजपा के लोग जान-बूझ कर ऐसा कर रहे हैं कि ऐसे कार्यकलापों का एक सभ्य समाज के रूप में भारत की छवि पर क्या असर पड़ रहा है?
इस समय कोई भी विदेशी अखबार या मैगजीन देखिए, तो उनमें भारत को लेकर अधिकतर खबरें बेहद नकारात्मक छपी नजर आती हैं. सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए, क्योंकि हम सभी और बाकी दुनिया के लोग भी यह देख रहे हैं कि अब ऐसी घटनाएं हमारे देश में लगातार घटित हो रही हैं, जिनसे बच पाना आसान नहीं है. नफरत फैलानेवालों और नकली राष्ट्रवादियों के लिए, अच्छे दिन आ गये हैं.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola