दुर्भाग्यपूर्ण बयानबाजी

Updated at : 08 Mar 2016 6:35 AM (IST)
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दुर्भाग्यपूर्ण बयानबाजी

यह भले एक कहावत है कि ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’, लेकिन लगता है कि कुछ नेताओं ने इसे अपना आदर्श वाक्य बना लिया है. सुर्खियों में बने रहने का यह उन्हें सबसे आसान रास्ता जान पड़ता है. तभी तो, तर्क गढ़ पाने में विफल रहने पर वे विरोधियों की हत्या तक का […]

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यह भले एक कहावत है कि ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’, लेकिन लगता है कि कुछ नेताओं ने इसे अपना आदर्श वाक्य बना लिया है. सुर्खियों में बने रहने का यह उन्हें सबसे आसान रास्ता जान पड़ता है. तभी तो, तर्क गढ़ पाने में विफल रहने पर वे विरोधियों की हत्या तक का आह्वान करने से नहीं हिचक रहे. भारत का संविधान हर किसी को अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, लेकिन इसके जरिये किसी को नुकसान पहुंचाने की आजादी किसी को भी नहीं है.
बावजूद इसके कुछ नेता अपने विरोधी का सिर कलम करने, उसकी जुबान काटने या फिर भ्रष्ट अधिकारी की हत्या करनेवालों के लिए इनाम की सार्वजनिक घोषणा कर रहे हैं. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हिंसा का आह्वान किसी एक दल या समुदाय के नेता नहीं कर रहे.
पिछले दो दिनों की सुर्खियों पर ही गौर करें, तो जहां केंद्र की सत्ता पर काबिज दल से जुड़े संगठनों के कुछ नेता मरने-मारने की बात करके अपनी राजनीति को परवान चढ़ाते दिखे, वहीं विपक्ष के एक नेता को भी सुर्खियां बटोरने का यही रास्ता सबसे मुफीद लगा
भाजपा युवा मोर्चा के बदायूं नगर प्रमुख ने अपने फेसबुक अकाउंट पर ऐलान कर दिया कि जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की जीभ काटनेवालों को वह पांच लाख रुपये देगा. दिल्ली में कन्हैया का सिर काटनेवालों को 11 लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा केे पोस्टर लगानेवाले कथित पूर्वांचल सेना के सिरफिरे अध्यक्ष के बैंक खाते में सिर्फ 150 रुपये हैं. उधर, बिहार में जन अधिकार पार्टी के नेता ने ऐलान किया कि यदि कोई व्यक्ति किसी भी भ्रष्ट अधिकारी या नेता को सरेआम पीट-पीट कर मार देता है, तो वह उसे दस लाख रुपये का इनाम देंगे. दुर्भाग्यपूर्ण है कि शब्दों की यह हिंसा उस देश में फल-फूल रही है, जिसके राष्ट्रपिता ने दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाया है.
क्या ऐसे नेताओं की जगह जेल में नहीं होनी चाहिए? समाज में हिंसा को बढ़ावा देने के किसी भी प्रयास के खिलाफ हर उस व्यक्ति और समाज को सजग हो जाना चाहिए, जो सत्य और अहिंसा को जीने का तरीका मानते हैं, जो मानते हैं कि समाज को दबंगई से नहीं, बल्कि बहस और तर्क-वितर्क से ही बेहतर बनाया जा सकता है.
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