एक जरूरी पहल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्टार्ट-अप इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहल है. रोजगार के साथ नवोन्मेष को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता से प्रेरित इस 19-सूत्रीय कार्यक्रम का उद्देश्य युवा उद्यमियों को ऋण देना, नियमों व करों में छूट तथा अनुकूल माहौल उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपनी आकांक्षाओं को फलीभूत कर देश के […]
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्टार्ट-अप इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहल है. रोजगार के साथ नवोन्मेष को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता से प्रेरित इस 19-सूत्रीय कार्यक्रम का उद्देश्य युवा उद्यमियों को ऋण देना, नियमों व करों में छूट तथा अनुकूल माहौल उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपनी आकांक्षाओं को फलीभूत कर देश के आर्थिक विकास में योगदान कर सकें.
उम्मीद है कि इस योजना के तहत उद्यमियों को सीधे धन न देकर निवेश की प्रक्रिया सेबी-पंजीकृत वेंचर फंड के जरिये कराने, तीन वर्षों तक जांच न कराने और कर में छूट देने, मोबाइल एप्प द्वारा सरकार एवं नियामक संस्थाओं के साथ व्यावसायियों को जोड़ने जैसे कदम निश्चित रूप में प्रशासनिक मकड़जाल से युवा उद्यमियों को काफी हद तक बचा सकेंगे. परंतु, सरकार को उद्यमियों के लिए ‘सिंगल विंडो सिस्टम’ बनाने की भी कोशिश करनी चाहिए, ताकि उन्हें बेवजह भाग-दौड़ न करना पड़े. व्यवसाय की स्थापना और संचालन में अनेक कार्यालयों और विभागों के शामिल होने के कारण ही लालफीताशाही और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है.
लाइसेंस प्रक्रिया में नरमी और कराधान के सरलीकरण के साथ ऐसी ठोस व्यवस्था बनायी जानी चाहिए, जिससे उद्यमी अपना ध्यान पूरी तरह से कामकाज पर केंद्रित कर सकें. केंद्र और राज्य सरकारें पहले भी विभिन्न प्रकार के योजनाओं के तहत व्यवसाय करने, उद्योग लगाने और उद्यम स्थापित करने के लिए धन आवंटित करती रही हैं तथा इस संबंध में नीतिगत छूट भी मिलती रही है. दुग्ध उत्पादन, कृषि आधारित व्यवसाय, मछली पालन, लघु उद्योग, शिक्षित बेरोजगारों के लिए आसान ऋण, सूचना-तकनीक के प्रोजेक्ट में मदद आदि जैसी पहलें लंबे समय से मौजूद हैं.
इन योजनाओं के अनेक लाभार्थियों ने अच्छे नतीजे दिये हैं, पर ये योजनाएं बहुत ठोस उपलब्धियां हासिल नहीं की हैं. इसके पीछे लालफीताशाही और भ्रष्टाचार जैसे कारक मुख्य रूप से जिम्मेवार रहे हैं. उन योजनाओं के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए उनकी खामियों से बचने की कोशिश करनी होगी. इस पहल में तकनीकी शिक्षण संस्थाओं और विश्वविद्यालयों की भूमिका निर्धारित करने की दिशा में भी सोचा जाना चाहिए, ताकि छात्रों की उद्यमशीलता को प्रोत्साहन मिले तथा ये संस्थाएं नवोन्मेष के केंद्र के रूप में विकसित हो सकें. इस कार्यक्रम की रूप-रेखा को अधिकाधिक रूप से प्रचारित किया जाना चाहिए, जिससे बड़े शहरों से परे देश के अन्य भागों के नये और संभावित उद्यमी इसका लाभ उठा सकें. आशा है कि सरकार और युवा उद्यमी साझे प्रयास से समृद्ध और विकसित भारत की संभावना को साकार करेंगे.
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