सॉरी इंडिया रॉन्ग नंबर!

Updated at : 16 Jan 2016 2:01 AM (IST)
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सॉरी इंडिया रॉन्ग नंबर!

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार सॉ री इंडिया, पठानकोट हमले में हमारे लोगों के शामिल होने के सबूत के तौर पर तुम्हारे द्वारा दिये गये टेलीफोन नंबर भी रॉन्ग नंबर ही निकले. हमें तो पहले से आशंका थी, पर इस आशंका को सच साबित करवाने के लिए हमने जांच भी करवा ली और जांच में […]

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डॉ सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

सॉ री इंडिया, पठानकोट हमले में हमारे लोगों के शामिल होने के सबूत के तौर पर तुम्हारे द्वारा दिये गये टेलीफोन नंबर भी रॉन्ग नंबर ही निकले. हमें तो पहले से आशंका थी, पर इस आशंका को सच साबित करवाने के लिए हमने जांच भी करवा ली और जांच में वही पाया गया, जिसकी हमें बिना जांच के ही आशंका थी. अब तुम लोग हमें कुछ और सबूत दोगे, जो कि हमें पता है कि वे भी गलत ही निकलेंगे.

हम तुम पर शक नहीं करते, पर पता नहीं तुम्हारे पुख्ता से पुख्ता सबूतों को भी हमारे यहां आते ही क्या हो जाता है कि वे कमजोर होते-होते बेजान हो जाते हैं. शायद हवा-पानी का कुछ असर हो और हमारा हवा-पानी उन्हें सूट न करता हो.

वैसे धन्यवाद तुम्हारे प्रधानमंत्री का, जो पहले तो पता नहीं क्या-क्या कहते रहते थे हमारे बारे में कि ये कर देंगे और वो कर देंगे, लेकिन प्रधानमंत्री बनते ही प्यार की पींगें बढ़ाने चुपके-से हमारे यहां आ गये. उनके इस तरह आ धमकने से हमें रियाज खैराबादी का वह शे’र याद आ गया- हम बंद किये आंख तसव्वुर में पड़े हैं, ऐसे में कोई छम से जो आ जाए तो क्या हो!

तुम्हारे यहां ताज्जुब हुआ होगा, लोगों को उनके इस तरह यहां आने का. हमें नहीं हुआ, क्योंकि हमें पता है कि एक तो नया मुल्ला जोर से बांग देता ही है, दूसरे भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद हर हिंदुस्तानी नेता को शांतिदूत का तमगा हासिल करने की चाह होने लगती है और उसे लगता है कि वह तमगा हमारे यहां पड़ा है.

साथ ही, मानना पड़ेगा तुम्हारी सबूत पेश करते रहने की निष्ठा और आशावादिता को भी, जो बिच्छू के बार-बार काट लेने के बावजूद उसे पानी में डूबने से बचाते रहनेवाले संत की तरह बाज ही नहीं आता. नहीं, हम नहीं कहेंगे कि उस संत को ही बिच्छू से डसवाने का शौक रहा होगा, हालांकि बहुत-से लोगों को होता है यह शौक भी. इसलिए यह जानते-बूझते हुए भी कि ये सांप-बिच्छू हैं और इन्हें बचाओगे भी तो भी ये काटेंगे, वे खुद को उनसे कटवाते रहते हैं.

लेकिन तुम्हारे बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता. तुम तो इस मान्यता के कारण ऐसा करते हो कि जब बिच्छू अपनी खराब आदत नहीं छोड़ता, तो हम ही क्यों अपनी अच्छी आदत छोड़ें. हो सकता है कि बिच्छू भी इसीलिए अपनी खराब आदत न छोड़ता हो कि जब अगला अपनी अच्छी आदत नहीं छोड़ता, तो मैं ही क्यों अपनी खराब आदत छोड़ूं? बिच्छू खराब आदत इसलिए अपनाये रहता हो सकता है, ताकि संत अपनी अच्छी आदत अपनाये रह सके. तो बिच्छू का भी योगदान है संत के भले बने रहने में. इसीलिए तो हम भी तुम्हारे कोई सबूत स्वीकार नहीं करते.

सारी दुनिया को पता है कि दाऊद कहां है. जब सारी दुनिया को पता है, तो हमें काहे नहीं पता होगा भला, पर तुम्हारे द्वारा सबूत उपलब्ध कराये जाते ही वह हमें दिखना बंद हो जाता है.

अब लादेन ही हमें कहां दिखता था? ऐबटाबाद में हमारी सैन्य अकादमी की बगल में रह रहा था वह, पर हमें नहीं दिखा. अमेरिका को दिख गया और उसने हमारे घर में घुस कर उसे मार गिराया, तब जाकर हमें पता चला कि अरे, यह तो यहीं हमारी नाक के नीचे रह रहा था. हमें कुछ दिखाने का तो जी, एक यही तरीका है. वरना तो हम जनम के अंधे हैं. समझे कुछ, या नहीं समझे?

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