बाजार तो देख रहा है मोदी की लहर

Published at :12 Dec 2013 5:20 AM (IST)
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बाजार तो देख रहा है मोदी की लहर

।। राजीव रंजन झा।। (संपादक, शेयर मंथन) पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिलने के राजनीतिक निहितार्थो और फलितार्थो पर राजनीतिक बहस चल पड़ी है, जो अपने-आप में बेनतीजा है. जो लोग नरेंद्र मोदी के प्रति पहले से झुकाव रखते आये हैं, वे इन नतीजों को मोदी की लहर के तौर […]

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।। राजीव रंजन झा।।

(संपादक, शेयर मंथन)

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिलने के राजनीतिक निहितार्थो और फलितार्थो पर राजनीतिक बहस चल पड़ी है, जो अपने-आप में बेनतीजा है. जो लोग नरेंद्र मोदी के प्रति पहले से झुकाव रखते आये हैं, वे इन नतीजों को मोदी की लहर के तौर पर देख रहे हैं. दूसरी ओर जो लोग मोदी को अस्वीकार्य मानते आये हैं, वे इन नतीजों को मोदी की लहर मानने के लिए तैयार नहीं है. लेकिन शेयर बाजार ने साफ तौर पर माना है कि हिंदी पट्टी के चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे मोदी की लोकप्रियता के बारे में उसकी धारणा को पुख्ता करते हैं. बाजार इन चुनावों से पहले से ही यह मान कर चल रहा था कि नरेंद्र मोदी के कारण भाजपा को बढ़त मिल रही है. इसलिए पिछले दिनों शेयर बाजार में तेजी आयी. मोदी के प्रभाव को भांप कर पहले से ही चढ़ चुका बाजार चुनावों के खत्म होने पर पहले एक्जिट पोल के दिन और फिर मतगणना के अगले दिन (सोमवार, 9 दिसंबर को) फिर से नयी उछाल दर्ज कर गया.

इससे पहले शेयर बाजार ने पूरे अक्तूबर में तेजी का रुझान दिखाया था. उस दौरान मैंने जितने भी बाजार विेषकों से बात की, उन्होंने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को चुनावी जीत मिलने की संभावना को इस तेजी का एक प्रमुख कारण बताया. मुहूर्त कारोबार में सेंसेक्स का नया रिकॉर्ड बनने के बाद बाजार कुछ समय तक जरा नीचे आता दिखा, लेकिन नवंबर के मध्य तक बाजार में मोदी का मंत्र-जाप फिर से तेज हो गया. गोल्डमैन सैक्स ने अपनी एक रिपोर्ट में बाकायदा लिखा कि उसके विचार ‘मोदीफाइड’ हो गये हैं. मोदीमय हो गये विचारों के आधार पर गोल्डमैन ने बताया कि अब वह भारतीय शेयर बाजार की दिशा ऊपर होने को लेकर आश्वस्त है. इसने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के प्रमुख सूचकांक निफ्टी का लक्ष्य 5700 से बढ़ा कर 6900 कर दिया.

इसके तुरंत बाद एक और विदेशी ब्रोकिंग फर्म सीएलएसए ने एक सर्वेक्षण जारी कर दिया. इसने अनुमान जताया कि भाजपा को आगामी लोकसभा चुनावों में 202 सीटें मिलेंगी. केंद्र सरकार और कांग्रेस इन रिपोर्टो पर बड़ी तिलमिलायी थी. कई मंत्रियों और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि इन फर्मो ने राजनीतिक अनुमान जता कर अपने कार्यक्षेत्र की सीमा तोड़ी है. लेकिन इन फर्मो ने अपनी-अपनी रिपोर्टो में जो लिखा, वह दरअसल शेयर बाजार में बनी धारणा का प्रतिबिंब ही था. शायद सरकार और कांग्रेस को मई, 2009 की याद नहीं रही, जब यूपीए सरकार की वापसी के बाद शेयर बाजार ने ऊपरी सर्किट के साथ छलांगें मारी थी. अगर इस समय शेयर बाजार ने अपनी उम्मीदें भाजपा से बांध ली हैं, तो इसका कारण यह नहीं है कि सारा बाजार भाजपाई है. दरअसल, यह बीते साढ़े चार सालों में यूपीए-टू सरकार से उपजी घोर निराशा का परिणाम है.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां जैसे-जैसे तेज हुईं, वैसे-वैसे बाजार को यह भान होता गया कि भाजपा इनमें ज्यादातर राज्यों में जीत की ओर अग्रसर है. बाजार विेषकों ने इससे यह संकेत लिया कि विधानसभा चुनावों में भाजपा को तीन-चार राज्यों में जीत मिलने पर लोकसभा चुनाव में भी इसकी जीत की संभावनाएं बढ़ जायेंगी. जब एक्जिट पोल के नतीजों ने चार राज्यों में भाजपा को बढ़त मिलने की संभावनाएं सामने रखीं, तो पांच नवंबर को सुबह-सुबह ही बाजार ने तेज उछाल दर्ज की. इसके बाद जब रविवार, 8 दिसंबर को मतगणना के बाद वास्तविक परिणामों में भी यह दिखा, तो बाजार ने अगली सुबह (9 दिसंबर को) फिर से पूरा जोश दिखाया. सेंसेक्स 21,484 के नये रिकॉर्ड पर पहुंचा. निफ्टी तीन नवंबर की उछाल में जनवरी, 2008 के रिकॉर्ड स्तर 6357 को पार करने में चूक गया था, लेकिन 9 दिसंबर को इसने भी 6415 का नया रिकॉर्ड बना लिया.

अब आगे का सवाल यह है कि चार राज्यों में भाजपा को बढ़त मिलने पर उसे मोदी के नेतृत्व का फायदा मिलने की पुष्टि तो होती है, लेकिन क्या यह लहर उसे अगले साल होनेवाले लोकसभा चुनाव में बहुमत के करीब ले जायेगी? ये चारों ही राज्य भाजपा के लिए परंपरागत रूप से मजबूत किले रहे हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव की लड़ाई कहीं ज्यादा व्यापक होगी. लगभग समूचे दक्षिण, पूर्व में बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों में भाजपा की पकड़ सीमित है. उत्तर प्रदेश और बिहार में मोदी की लहर कितना करिश्मा दिखायेगी, इस बारे में अभी केवल अटकलें ही लगायी जा सकती हैं.

ऐसे में बाजार की मोदीमय धारणा जोखिमों को आमंत्रण दे रही है. बेशक इस समय कांग्रेस चुनावी मैदान में कमजोर है और भाजपा उसकी तुलना में ठीक-ठाक बढ़त ले चुकी है. इससे कांग्रेस की सीटें घटने की बहुत साफ भविष्यवाणी की जा सकती है, लेकिन दावे के साथ यह कह पाना मुश्किल है कि भाजपा बहुमत के लिए जरूरी संख्या जुटा पाने की स्थिति में आ चुकी है. फिलहाल बाजार यही मान कर चल रहा है कि जब भाजपा अच्छी-खासी सीटें हासिल कर लेगी, तो बहुमत में कमी को पूरा करने के लिए नये सहयोगी मिल ही जायेंगे. लेकिन इसी बिंदु पर बहुत सारे अगर-मगर भी हैं और बाजार उन पहलुओं को दरी के नीचे डालने की मनोवृत्ति दिखा रहा है. करीब 200 सीटों से भी बहुमत के लिए जरूरी सीटों तक जाने के लिए जिन क्षेत्रीय दलों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी, वे नरेंद्र मोदी के नाम पर सहमत नहीं हुए तो क्या होगा? मैंने एक विेषक से पूछा कि अगर चुनाव के बाद भाजपा की सरकार बने, लेकिन नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री न बन सकें, तो क्या बाजार का उत्साह उतना ही रहेगा या कुछ घट जायेगा? उन्होंने कहा कि घट जायेगा.

फिर अगर भाजपा की सीटें 200 की जगह 170-180 तक ही रह जायें, तो क्या होगा? तब बहुमत तक जाने के लिए जिन क्षेत्रीय छत्रपों के समर्थन की जरूरत होगी, उनमें से बहुत सारे लोग खुद ही बादशाहत पाने को लालायित हो जायेंगे. बाजार को जिस तीसरे मोरचे के नाम से ही डर लगता है, उसकी संभावना भी अभी एकदम से खारिज की जा सकती है क्या? अगर कांग्रेस कमजोर हो गयी, लेकिन भाजपा बहुमत नहीं जुटा सकी, तब तीसरे मोरचे का बेताल फिर से कंधे पर लटक जायेगा. वैसे भी, दिल्ली में मिली कामयाबी से उत्साहित आम आदमी पार्टी अब देशभर में तीसरी शक्ति बनने का प्रयास करेगी. इसलिए लोकसभा चुनावों के बाद राजनीतिक अनिश्चितता की संभावना को एकदम खारिज करना शेयर बाजार के लिए खतरनाक हो सकता है.

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