आम आदमी पार्टी की आगे की राह

Published at :12 Dec 2013 5:19 AM (IST)
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आम आदमी पार्टी की आगे की राह

।। शीतला सिंह।। (वरिष्ठ पत्रकार) आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल का उभार अन्ना हजारे आंदोलन के सहायक के रूप में हुआ था. फिर उन्होंने पार्टी बना कर दिल्ली की सत्ता पर कब्जा करने एवं मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ उम्मीदवार बनने का निर्णय किया. साधारण पृष्ठभूमि से आनेवाले आम चेहरों के साथ उन्हें […]

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।। शीतला सिंह।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल का उभार अन्ना हजारे आंदोलन के सहायक के रूप में हुआ था. फिर उन्होंने पार्टी बना कर दिल्ली की सत्ता पर कब्जा करने एवं मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ उम्मीदवार बनने का निर्णय किया. साधारण पृष्ठभूमि से आनेवाले आम चेहरों के साथ उन्हें चुनाव में जो सफलता मिली, लोग उसे आश्चर्य के साथ देख रहे हैं. निश्चित रूप से यह राजनीति में एक नये युग की शुरुआत है. बिना किसी बड़ी पूंजी, राजनीतिक थाती या पूर्व इतिहास के जिस प्रकार उन्हें सफलता मिली है, उसे देखते हुए राजनीति के कई धुरंधर सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि वे ‘आप’ से सबक सीखेंगे. जाहिर है, आप की इस कामयाबी से सभी प्रभावित हैं. याद करिये, कांग्रेस के बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह कभी केजरीवाल को चुनौती देते थे कि वे सांसद, विधायक या कम से कम पार्षद के रूप में चुनाव जीत कर दिखाएं.

आम आदमी पार्टी को सहयोग और समर्थन देने से कन्नी काटनेवाले अन्ना हजारे ने भी अप्रत्याशित जीत पर केजरीवाल को बधाई दी है, साथ ही यह टिप्पणी भी की कि यदि मैं समर्थन करता, तो उन्हें बहुमत प्राप्त हो जाता. इससे लगता है कि अन्ना हजारे भी अब पार्टी विहीन राजनीति से परे, केजरीवाल को समर्थन के बारे में पुनर्विचार कर सकते हैं. जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जोरों पर था, तब भी यह सवाल उठा था कि भ्रष्टाचार का सीधा संबंध राज्य और व्यवस्था से है, इसलिए इसे समाप्त करने के लिए राजनीतिक सोच, कार्ययोजना, दिशा और आधार चाहिए, भ्रष्टाचार केवल हवाई नारों से समाप्त होनेवाला नहीं है. राजनीति से परे रह कर आंदोलन तो हो सकता है, लेकिन उससे व्यवस्था नहीं बदल सकती. यही अब आम आदमी पार्टी के लिए भविष्य की चुनौती भी है. केजरीवाल की पार्टी दिल्ली विधानसभा की 28 सीटें जीतने में सफल रही है, लेकिन इस पार्टी का कोई राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक कार्यक्रम अब तक नहीं बन पाया है. आम जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त है, केजरीवाल ने उनमें एक उम्मीद जगायी है. लेकिन यदि वे सत्ता में आ भी गये, तो उन्हें संवैधानिक दायरे में रह कर ही काम करना पड़ेगा. उन्हें संविधान के अनुरूप कार्यनीति और योजनाएं तैयार करनी होगी. भारतीय राजनीति, समाज, अर्थशास्त्र और विकास की पेचीदगियों को भली प्रकार से समझना पड़ेगा और पार्टी की एक वैचारिक दिशा तय करनी होगी. यह भी देखना होगा कि आम आदमी को सहूलियतें देनेवाली सरकार चलाने के लिए साधन कहां से आये, इसका बोझ किन पर पड़े. इस संबंध में आम आदमी पार्टी की वैचारिक दिशा, नीति और कार्यक्रम अभी स्पष्ट नहीं है. आर्थिक असमानता और बेरोजगारी की समाप्ति के साथ-साथ भ्रष्टाचार से लड़ने और सूचना के अधिकार को बेहतर रूप प्रदान करने के लिए उन्हें नीतियां बनानी ही पड़ेंगी. यही उनके नेताओं और पार्टी का चरित्र भी निर्धारित करेगा और इसी से लोग जान पायेंगे कि केजरीवाल के वादों और दावों में कितना दम है. दिल्ली पहले केंद्रशासित प्रदेश था. वहां विधानसभा बन गयी, मुख्यमंत्री का पद भी सृजित हो गया, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था अब भी राज्य सरकार के पास नहीं है, जबकि संविधान में अधिकारों का जो विभाजन किया गया है, उसमें कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है. इस संबंध में ‘आप’ का दृष्टिकोण क्या होगा, इसकी घोषणा अभी नहीं हुई है.

आंध्र प्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी के संस्थापक अभिनेता नंदमूरि तारक रामाराव गैर-कांग्रेसवाद के नायक रहे हैं. उन्होंने तेलुगू अस्मिता की आवाज बुलंद की. लेकिन राज्य की जनता ने उनकी पार्टी को तीन बार इसलिए मौका दिया, क्योंकि उन्होंने राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास की नीतियां बनायीं और उन पर अमल भी किया. वे देश की वृहत्तर राजनीति से अलग नहीं थे. इसलिए उन्होंने चुनाव की राजनीति में दोस्त और दुश्मन की पहचान भी की. गंठबंधन की राजनीति के दौर में यह तय करना जरूरी माना जाता है.

गांधीजी को लोग संत मानते हैं, लेकिन वे भी राजनीतिक संत थे. उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में क्या करना है और क्या नहीं करना है, यह तय कर रखा था. उनका अपना राजनीतिक और आर्थिक दर्शन था. उन्हें राजनीति से परहेज नहीं था. उन्होंने देश-विदेश में जो आंदोलन किये, वह भी राजनीति थी. जाहिर है, आंदोलन कोई भी हो, उसे जीवन और समाज के सभी पहलुओं को समेटना पड़ेगा, उससे भाग कर कोई हल नहीं हो सकता. आंदोलन के जरिये केवल भीड़ बटोर कर ही निर्णय होंगे, तो उससे व्यवस्था नहीं, बल्कि भीड़तंत्र ही पनपेगा और यह भीड़तंत्र व्यवस्था का संचालक नहीं हो सकता. इसलिए यदि केजरीवाल भी अन्ना के दलविहीन राजनीति की कल्पना पर आधारित विचार और कार्यक्रमविहीन दल की ओर बढ़ेंगे, तो उनकी कठिनाइयां ही बढ़ेंगी.

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