लेफ्ट-राइट की विस्मयकारी समानता!
Updated at : 15 Jan 2016 4:13 AM (IST)
विज्ञापन

उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार वरिष्ठ पत्रकार-लेखक प्रफुल्ल बिदवई के आकस्मिक निधन के बाद उनकी अंतिम और बेहद महत्वपूर्ण किताब ‘द फीनिक्स मोमेंटः चैलेंजेज कन्फ्रंटिंग द इंडियन लेफ्ट’ कुछ ही समय पहले छप कर आयी है. इस किताब को पढ़ते हुए एक सवाल कौंधता रहा- लगभग एक ही दौर में अपना राजनीतिक-सांगठनिक सफर शुरू करनेवाले कम्युनिस्ट क्यों […]
विज्ञापन
उर्मिलेश
वरिष्ठ पत्रकार
वरिष्ठ पत्रकार-लेखक प्रफुल्ल बिदवई के आकस्मिक निधन के बाद उनकी अंतिम और बेहद महत्वपूर्ण किताब ‘द फीनिक्स मोमेंटः चैलेंजेज कन्फ्रंटिंग द इंडियन लेफ्ट’ कुछ ही समय पहले छप कर आयी है. इस किताब को पढ़ते हुए एक सवाल कौंधता रहा- लगभग एक ही दौर में अपना राजनीतिक-सांगठनिक सफर शुरू करनेवाले कम्युनिस्ट क्यों और कैसे राष्ट्रीय राजनीति में कामयाब नहीं हो सके और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कैसे कामयाब हो गया!
कम्युनिस्ट पार्टी और आरएसएस, दोनों की स्थापना सन् 1925 में हुई थी. एक ने समाजवादी समाज का सपना देखा और दूसरे ने हिंदू-राष्ट्र का. दोनों के सपने अब तक नहीं पूरे हुए, पर आरएसएस की राजनीतिक कामयाबी कम्युनिस्टों के मुकाबले बहुत बड़ी है. उसकी राजनीतिक संस्था-भाजपा आज केंद्रीय सत्ता में है. कई प्रांतों में भी उसकी सरकारें हैं.
कम्युनिस्ट पार्टी (या पार्टियों) के पास बौद्धिक, ईमानदार-समझदार नेताओं की कभी कमी नहीं रही. जबकि, संघ में बौद्धिकों की तादाद ज्यादा नहीं रही, पर समर्पित कार्यकर्ता उनसे जुड़ते रहे.
आजादी की लड़ाई में संघ की कोई भूमिका नहीं थी. लेकिन, सत्तर-अस्सी के दशक में उनका ग्राफ उठने लगा और आज वे सत्ता के केंद्र में हैं. कम्युनिस्ट एक समय संसद में मुख्य विपक्षी दल थे और तीन-तीन राज्यों में उनकी सरकारें भी बनीं. दुनिया में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गयी पहली वामपंथी सरकार केरल (1957-59) की थी, जिसने कई महत्वपूर्ण कदम उठाये. नाराज होकर केंद्र ने उसे बर्खास्त किया. इससे केरल में कम्युनिस्टों की लोकप्रियता बढ़ी. आज भी वे वहां बड़ी ताकत हैं. लेकिन, केरल-बंगाल के बाहर वे नहीं फैल सके. हिंदी पट्टी में भी उनके प्रभाव का सीमित आधार खिसक गया. बड़ा सवाल है, ऐसा क्यों हुआ?
परस्पर घोर विरोधी कम्युनिस्टों और संघियों में नेतृत्व के स्तर पर कुछ विस्मयकारी समानताएं भी हैं. दोनों धाराओं की अगुवाई सवर्ण हिंदू, खासकर ब्राह्मण समुदाय से आये नेताओं के हाथ में रही है. कम्युनिस्टों में कुलीन मुसलिम परिवारों से भी कुछ नेता उभरे, पर दलित-पिछड़े नदारद थे.
संघ की अगुवाई एकाध अपवाद को छोड़ कर हमेशा महाराष्ट्र के कुलीन ब्राह्मण समुदाय से आये नेता ही करते रहे. आज भी लगभग वही स्थिति है. संघ नेतृत्व ने हिंदू धर्मावलंबियों को कट्टरता-आधारित ‘हिंदुत्व’ से जोड़ कर जनसंघ और बाद के दिनों में भाजपा के लिए नया जनाधार खड़ा करने की कोशिश की. जन समस्याओं की निरंतर अनदेखी के चलते ढहते कांग्रेसी आधार से संघी-संगठनों को काफी मदद मिली. सवर्ण हिंदुओं के अलावा व्यापारी समुदाय और काॅरपोरेट के बड़े हिस्से में भी उसने समर्थन जुटाया.
विकलांग-पूंजीवाद और अंधविश्वास-ग्रस्त पिछड़े समाज का समीकरण संघ-प्रेरित संगठनों के लिए बहुत मुफीद साबित हुआ. उस दौर में भी उन्होंने समान नागरिक संहिता, ‘मंदिर-मसजिद’ और ‘रामराज्य’ जैसे मुद्दे उछाल कर माहौल अपने पक्ष में करने की कोशिश की. तब उनकी दाल नहीं गली. अस्सी और उसके बाद के दशक में उनके अयोध्या अभियान, शिलापूजन और मंदिर-मसजिद विवाद ने समाज को बुरी तरह प्रभावित किया. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बीच अनेक दंगे हुए. हाशिये पर पड़े दलित-पिछड़ों और आदिवासियों में लगातार रोष बढ़ रहा था. उसकी अभिव्यक्ति कई विफल विद्रोहों में हुई.
दूसरी तरफ, दक्षिणपंथियों की तरफ से दलित-पिछड़ों के ‘हिंदुत्वीकरण’ की कोशिश भी जारी रही. कम्युनिस्टों का एक हिस्सा इंदिरा गांधी की इमर्जेंसी का समर्थन करके पहले ही अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता गंवा बैठा था.
संघ और उसकी अन्य संस्थाओं ने अपना प्रचार-अभियान जारी रखा. ‘हिंदुत्व’ के प्रचार-प्रसार में गीता प्रेस के धार्मिक प्रकाशनों, बंबइया धार्मिक फिल्मों, टीवी सीरियलों और गांव-शहर में फैले असंख्य बाबाओं-कथावाचकों का कुछ कम योगदान नहीं रहा. अब तो यह काम ढेर सारे हिंदी चैनलों के जरिये और तेज गति से हो रहा है. लेकिन, धर्म और संस्कृति के विकृतीकरण की हिंदुत्ववादी साजिशों की समाजवादियों-वामपंथियों के बड़े हिस्से ने लगातार अनदेखी की. उनको लगता था कि उनके दायरे में ये मुद्दे आते ही नहीं!
कम्युनिस्टों ने जाति-वर्ण के सवाल की भी लगातार उपेक्षा की. प्रफुल्ल बिदवई ने दलितों में वामपंथियों के सीमित आधार का सवाल तो उठाया है, पर वह इसके कारणों की तह में नहीं जा सके.
सत्तर-अस्सी के दशकों में, जब भारतीय समाज में बदलाव की बेचैनी थी, दलित-पिछड़े-आदिवासी समुदाय के बड़े सरोकारों पर वामपंथियों का क्या रवैया रहा? आरक्षण के सवाल पर वामपंथी शिविरों में जिस तरह का संकोच दिखा, वह हैरतंगेज था.
वामपंथियों के बड़े हिस्से ने शुरू में आरक्षण को मुद्दा ही नहीं माना. बाद में कहना शुरू किया कि लागू करना है, तो वह ‘सामाजिक-आर्थिक आधार’ पर लागू हो. जबकि संविधान ने आरक्षण का आधार सिर्फ ‘सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ेपन’ को माना है. काफी बाद में भाकपा ने मंडल-आधारित आरक्षण प्रावधानों का समर्थन किया. कंफ्यूजन में पड़ी माकपा की बंगाल इकाई विरोध में थी, तो केरल इकाई समर्थन में. ऐसे में पिछड़ों को ‘आर्थिक आधार की लकीर खींचना’ एक नया बखेड़ा पैदा करनेवाली बात लगी.
संघ ने भी आरक्षण को कभी पसंद नहीं किया. नेहरू से लेकर इंदिरा युग के बीच देश के विश्वविद्यालयों और बौद्धिक निकायों/संस्थानों में वामपंथी बौद्धिकों की संख्या अच्छी खासी थी. वे प्रशासनिक स्तर पर असरदार थे. ऐसे संस्थानों में दलित-पिछड़ों से उभरते प्रथम या द्वितीय पीढ़ी के पढ़े-लिखे युवाओं की निरंतर उपेक्षा होती रही. विख्यात वामपंथी पृष्ठभूमि के बौद्धिकों-प्रशासकों के स्तर से हो रहे इस तरह के जातिगत-भेदभाव का संदेश बहुत खराब गया.
उत्पीड़ित वर्गों के युवाओं ने अपने समाजों को आगाह किया कि उन्हें कांग्रेस की तरह वामपंथियों से भी ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए. इसी दौर में देश के विभिन्न हिस्सों में मंडलवादी, बहुजनवादी या आंबेडकरवादी नेताओं-संगठनों का उभार सामने आया. कांग्रेस से नाराजगी के साथ उत्पीड़ितों के बीच से उभरते पढ़े-लिखे समूहों में कम्युनिस्टों से भी मोहभंग देखा गया.
बाद के दिनों में मंडलवादी-बहुजनवादी नेतृत्व की निजी स्वार्थपरता और कूपमंडूकता भी सामने आयी. दलितों-पिछड़ों के बीच पैदा इस निराशाभरे माहौल का संघ-प्रेरित ‘हिंदुत्व’ को फायदा मिला. हाशिये पर पड़े वामपंथियों को आज ‘हिंदुत्व-उभार’ के खतरे दिख रहे हैं, पर उनके हाथ से विकल्प का राजनीतिक मंत्र फिसल चुका है. शायद, अतीत की विफलताओं और बेचारगी-भरे वर्तमान की ईमानदार पड़ताल से कोई रास्ता दिखे!
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




