पुरखों की जड़ों से दूर होते बच्चे

Updated at : 14 Jan 2016 5:14 AM (IST)
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पुरखों की जड़ों से दूर होते बच्चे

प्रभात रंजन कथाकार आजकल मां आयी हुई हैं. कल बात-बात में उन्होंने बताया कि जर्दा आम का जो कलम लगाया गया था, उसमें इस साल हो सकता है मोजर (मंजर) आये. पास ही मेरी नौ साल की बेटी बैठी हुई थी. उसने अचानक पूछ दिया- दादी, मोजर क्या होता है? इस सवाल ने मुझे परेशान […]

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प्रभात रंजन

कथाकार

आजकल मां आयी हुई हैं. कल बात-बात में उन्होंने बताया कि जर्दा आम का जो कलम लगाया गया था, उसमें इस साल हो सकता है मोजर (मंजर) आये. पास ही मेरी नौ साल की बेटी बैठी हुई थी.

उसने अचानक पूछ दिया- दादी, मोजर क्या होता है? इस सवाल ने मुझे परेशान कर दिया. हमारे बच्चे आज प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं और उस विरासत से भी, जिसकी गिनती करके हम बचपन में गर्व किया करते थे. अलग-अलग मौसम में अलग-अलग फलों की आमद का हमें पहले से पता चल जाता था. हम फसलों और फलों के सहारे मौसमों को जीते थे.

जब से हमारे मन में यह बात घर कर गयी कि गांव का मतलब विनाश होता है और शहर का मतलब विकास, तब से हम तो गांव से दूर होते ही गये हैं, हमारे बच्चे तो उन फलों, फूलों, पशुओं और पक्षियों तक से पूरी तरह से अनजान होते जा रहे हैं, जिनके आने से हमें बदलते मौसम का पता चलता था. धान की कटाई के बाद खेतों में बगेड़ी का दिखना या सुबह-सुबह मोरों की आवाज से हमें यह समझ में आ जाता था कि वसंत आ गया है. गर्मियों की दोपहर की निर्जनता को तोड़ती कोयल की आवाज, दशहरे के दिन नीलकंठ को देखना. हमारा बचपन प्रकृति के संग-साथ का बचपन था.

हमारे बच्चे महानगरों की सुविधाओं में पल रहे हैं, लेकिन वे हमारी उस मिट्टी से दूर होते गये हैं, जिसमें हमारे पुरखों का खून-पसीना मिला होता है और जो धूल-कणों के साथ हमारे शरीर से आकर लिपट जाते थे. जबकि, हम अपने बच्चों को गांव के उस माहौल में अगर लेकर जाते भी हैं, तो हमारी कोशिश यही होती है कि बच्चों को डस्ट पॉलुशन से बचा कर रखें.

मुझे अपने उस दोस्त की याद आयी, जिसने बड़े फख्र से यह बताया था कि वे छठ में अपने बेटे को पहली बार गांव लेकर गये थे, तो खेत में धान की लहलहाती फसल को देख कर उसने कहा था कि गेहूं की फसल ऐसी होती है. दुख इस बात का नहीं है कि बच्चे प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, दुख इस बात का है कि हम अपनी तरफ से उनको अपनी प्रकृति, अपनी धरती से जोड़ने की कोई कोशिश भी नहीं करते. मैं जब अपनी बेटी को कहता हूं कि तुम्हारा गांव बिहार के सीतामढ़ी में नेपाल की सीमा के पास है, तो जवाब में वह कहती है कि मैं तो वहां कभी गयी ही नहीं, तो फिर वह मेरा गांव कैसे हुआ?

पहले हम अपनी बोली से दूर हो गये. अपनी बोली बज्जिका में अब मैं सिर्फ अपनी मां से ही बात कर पाता हूं. हमारे परिवार की अगली पीढ़ी तक यह बोली नहीं पहुंच पायी. फोन पर जैसे ही मैं बज्जिका बोलना शुरू करता हूं, मेरी बेटी कहती है कि आप दादी से बात कर रहे हैं न. इस अजीब भाषा में आप उनके साथ ही बात करते हो.

हर साल मैं यह सोचता हूं कि अपनी बेटी को लेकर गांव जाऊंगा और लंबे समय तक उसको वहां रहने दूंगा, ताकि वह अच्छी तरह से उस मिट्टी से पहचान बना सके, जहां उसके पुरखों की जड़ें हैं. लेकिन, हर साल बात अगले साल तक के लिए टल जाती है.बात मोजर से शुरू हुई थी!

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