हिंदू का अर्थ और वाद का विवाद

Published at :11 Dec 2013 4:14 AM (IST)
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हिंदू का अर्थ और वाद का विवाद

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखा है कि हिंदू जाति नहीं संस्कृति है. इस शब्द से संबोधित जन समुदाय अपने पूर्वजों की महनीय परंपरा के छद्मवेशी हिंदू ही अधिक हैं. हिंदू के साथ धर्म को जोड़ कर सांप्रदायिक परिभाषा गढ़ना वस्तुत: हिंदू ध्वनि की असांप्रदायिक पवित्रता और व्यापकता को दूषित […]

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राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखा है कि हिंदू जाति नहीं संस्कृति है. इस शब्द से संबोधित जन समुदाय अपने पूर्वजों की महनीय परंपरा के छद्मवेशी हिंदू ही अधिक हैं. हिंदू के साथ धर्म को जोड़ कर सांप्रदायिक परिभाषा गढ़ना वस्तुत: हिंदू ध्वनि की असांप्रदायिक पवित्रता और व्यापकता को दूषित करने जैसा एक षड़यंत्र लगता है. आचार्य विनोवा भावे, वीर सावरकर जैसे मनीषियों के अतिरिक्त ‘माधव विजय’ और ‘वृहस्पति आगम’ जैसे ग्रंथों में उल्लेखित पंक्तियों से हिंदू एक संस्कृति के अर्थ में व्यक्त है.

आर्य द्रविड़ और अन्य जातियों के लोग जब एक समाज के अंग बन गये तो उनकी आदतें और विश्वास सब एकाकार हो गये. विभिन्न जातियों की आदतों, विश्वासों, दंतकथाओं, भावनाओं व रीति-रिवाजों के मिलन से जो संस्कृति विकसित हुई, वही हिंदू संस्कृति है. मुसलिम आक्रमण के पूर्व भारत में आनेवाले यूनानी, पार्थियन, मंगोल, युची, शक, आभीर, हूण सभी हिंदू संस्कृति में विलीन हो गये. अत: हिंदूवाद कहने से किसी धार्मिक संप्रदाय का बोध नहीं होता, इस संस्कृति के विशाल जनसमूह की विचारधारा और सामाजिक जीवनशैली ही हिंदू की पहचान है.

यह शब्द ही खुद में निरपेक्ष है. धर्म तो धारणा से उत्पन्न होता है. मानवोचित कर्मो का आचरण करना मनुष्य मात्र का धर्म है. माधव दिग्विजय में उल्लेख है कि ‘ऊंकार’ जिसका मूल मंत्र है, पुनजर्न्म में जिसकी आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है और हिंसा की जो निंदा करता है, वह हिंदू है. भारतीय मनीषियों द्वारा प्रतिपादित हिंदू संस्कृति की गरिमा को भुला कर आज जाति-धर्मवाद जैसे गलत आचरणों और दूषित विवादों से हिंदू समाज बंटता जा रहा है, जो पतन का मूल कारण है.

देवनाथ शास्त्री, चौथा, हजारीबाग

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