सीटी बजती रही, कुर्सी दौड़ चालू है

Published at :11 Dec 2013 4:12 AM (IST)
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सीटी बजती रही, कुर्सी दौड़ चालू है

।। चंचल।। (सामाजिक कार्यकर्ता) तीनों जन इकट्ठे? कीन उपाधिया, लखन कहार और उमर दरजी. तीनों सजे-संवरे हैं. तेलफुलेल से चकाचक. लोगों ने देखा तीनों मुंह लटकाये चले आ रहे हैं. न कोई बातचीत, न हंसी-मजाक, बस सरपट बढ़े आ रहे हैं चौराहे की तरफ, जहां आसरे की दुकान पर मजमा पहले से ही लगा बैठा […]

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।। चंचल।।

(सामाजिक कार्यकर्ता)

तीनों जन इकट्ठे? कीन उपाधिया, लखन कहार और उमर दरजी. तीनों सजे-संवरे हैं. तेलफुलेल से चकाचक. लोगों ने देखा तीनों मुंह लटकाये चले आ रहे हैं. न कोई बातचीत, न हंसी-मजाक, बस सरपट बढ़े आ रहे हैं चौराहे की तरफ, जहां आसरे की दुकान पर मजमा पहले से ही लगा बैठा है. दो-चार कदम रह गया होगा, तभी लाल साहेब ने सवाल दागा- तीनों! किधर से भाई? तीनों ने कुछ नहीं बोला. बस गंभीर बने रहे. वक्त की नजाकत देखते हुए कयूम मियां ने सहलाया- अरे भाई, पहले बैठने तो दो, बेचारे पता नहीं कहां से थके-मांदे चले आ रहे हैं, पता नहीं इन पर क्या गुजरी है.

आओ कीन, हियां आओ, कहां से लौटे हो बेटवा? कीन कुछ जवाब देते, उससे पहले ही उमर दरजी ने बताया- गये रहे टोनामेंट देखने.. टोनामेंट नहीं, टूर्नामेंट. जो भी हो, वही देखने गये रहे. तो हुआ क्या? एक से बढ़ कर एक खेल हुआ. महीनों से तो चल रहा था. ‘जलेबी दौड़’ देखा. मजा आ गया गुरु, क्या खेल है? दोनों हाथ पीछे बंधे रहे, एक दो के नहीं, पूरे झुंड के झुंड. जलेबी ससुरी धागे में लटकी, कभी इधर, कभी उधर, बाकी खेलनेवाले मुंह बाये कूद लगाते रहे. पर मिला उन्हीं को, जिनका मुंह चौड़ा रहा.

और का हुआ? तिनटंगी दौड़. इसमें अकेले नहीं दौड़ा जाता. दो को मिल कर दौड़ना होता है. एक का बांयां पैर दूसरे के दाहिने पैर से कस कर बांध दिया जा है, फिर रेस होती है. एक हुआ ‘बोरा दौड़’. यह और मजेदार. दोनों पैर बोरे में डाल दिया जाता है और बोरे को कमर के पास बांध देते हैं. फिर उनका रेस देखो.. अभी बात पूरी भी न हो पायी थी कि मद्दू पत्रकार की मोटरसाइकिल आकर रुकी. लोग बताते हैं कि जब मद्दू की मोटरसाइकिल रुकती है, तब उनकी पत्रकारिता चलती है. चुनांचे आते ही आते मद्दू चालू हो गये- क्या राजनीति हो रही है भाई? जवाब दिया कीन उपाधिया ने- राजनेति नहीं गुरु, टूनामेंट की बात हो रही है. मद्दू ने समझाया- कीन! दोनों एक ही है. लखन कहार चकराये ‘दोनों एक ही है’? जलेबी, बोरा, तीन टंगी? लेकिन चुप रह गये. कोई न कोई तो पूछेगा ही. वह क्यों फसने जायें. बहरहाल मद्दू आये और चिखुरी के बगल में बैठ गये.

आज की क्या खबर है चिखुरी काका? चिखुरी ने अखबार बगल रख दिया. चश्मा उतार ही रहे थे कि उमर ने बयान देना शुरू कर दिया-आज की खबर? कुर्सी दौड़ चल रही है, हम तो ऊब कर भाग आये. हमारा कंडीडेट तो पहले ही राउंड में गिर गया. लाल साहेब को मौका मिल गया- ओमर मियां! पूरा बताओ न, कैसे क्या हुआ?

उमर ने बीड़ी सुलगाया. बीड़ी उलट कर जोर से धुआं निकाला. आंखें लाल की. फिर बताना शुरू किया. हम तीनों जन यहां से होत भिनसार पाठशाला पे पहुंच गये जहां टूनामेंट होत रहा. खेलय वाले कम देखय वाले ज्यादा. तिल रखने की भी जगह नहीं. कोई कुर्सी पर, कोई पेड़ पर, कोई साइकिल पे, इसी में हम भी तीन जन. लखन कहार मजे में रहे, गमछा रहा उस पर बैठ गये. हमने ईंट खोज निकाला, कीन उपाधिया को कुछ नहीं मिला तो ‘पनही’ पर ही जम गये. इतने में क्या हुआ कि पहले सीटी बजी. एकदम सन्नाटा. फिर लाउडस्पीकर का भोम्पा बोला- दिल्ली मेरी दिल्ली.. दिल्ली.. दिल्ली.. ‘रेकाट’ की सूई दिल्ली पे फंस गयी. सीटीवाले साहेब ने जोर से आवाज दी- जे नहीं चलेगा, कोई धार्मिक बजाओ.. रेकाड बोला- आरा हीले, बलिया हीले, छपरा.. रोको जल्दी रोको.. नौटंकी समझें हो का. यह टूनामेंट है. कोई दमदार गाना लगाओ. दो पढ़े-लिखे लोग उसकी मदद के लिए भेजे गये. तब कहीं जाकर देशप्रेम मिला. इंसाफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के, यह देश है तुम्हारा.. तुम्हारा.. तुम्हारा.. और देश फंस गया. खेल रोक दिया गया. अब तय हुआ कि कि एक कुर्सी बीच में रहेगी. उसे घेर कर दौड़नेवाले दो होंगे. और जब सीटी बजे तो एक को उस कुर्सी पर बैठ जाना है. जो बैठ जायेगा वह जीत जायेगा. कई बार सीटी बजी, लेकिन कोई भी बैठने को तैयार नहीं. तब से यही चल रहा है. सीटी बजती है, दोनों एक-दूसरे को देखते हैं, पर बैठे को राजी नहीं हैं.

सो क्यों? सच्चाई का है ये तो ‘ऊपरवाला’ जाने, लेकिन मुहा-मुही यही हो रही है कि किसी ने कुर्सी के उस असल मुकाम पर ‘केंवाच’ रगड़ दिया है, जिस पर तशरीफ रखी जाती है. जो भी बैठेगा, तशरीफ खुजलाते हुए भागेगा, पर खुजलाना कम नहीं होगा. रामभरोस बनिया तो आपबीती बताता रहा कि एक बार वो भी फंस चुका है, ऐसी खुजली शुरू हुई कि पूछो मत, बताने में शर्म आती है. -लेकिन यह केवांच का होता है? चिखुरी मुस्कुराये. यह एक दरख्त का फूल है, जो देखने में तो बहुत खूबसूरत होता है, लेकिन इनके रोंये में एक अजीब सी फितरत होती है खुजली की.. तो सुन लो पंचों केवांच से बचना चाहिए. और दिल्ली की खबर क्या है भाई? अब सुनो.. इनका सवाल देखो!

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