संवेदनाओं को मरने न दें

Updated at : 12 Jan 2016 5:04 AM (IST)
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संवेदनाओं को मरने न दें

कविता विकास स्वतंत्र लेखिका नये साल के जश्न में उत्साह और उमंग से लबरेज स्त्री-पुरुष और बच्चे-बूढ़े लजीज व्यंजनों के साथ नाच-गाने का आनंद उठा रहे थे. अचानक किसी कोने से किसी के कराहने की आवाज सुनायी दी. शोरगुल के वातावरण में भी किसी की दर्द भरी आवाज अनसुनी नहीं की जा सकती थी, पर […]

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कविता विकास

स्वतंत्र लेखिका

नये साल के जश्न में उत्साह और उमंग से लबरेज स्त्री-पुरुष और बच्चे-बूढ़े लजीज व्यंजनों के साथ नाच-गाने का आनंद उठा रहे थे. अचानक किसी कोने से किसी के कराहने की आवाज सुनायी दी. शोरगुल के वातावरण में भी किसी की दर्द भरी आवाज अनसुनी नहीं की जा सकती थी, पर किसी ने उस ओर झांकने की कोशिश नहीं की.

हां, एक-दो बार लोगों ने एक-दूसरे की आंखों में जरूर कौतुहलता से झांका था. थोड़ी देर में एक तेरह-चौदह वर्ष का बच्चा आवाज की दिशा का अनुसरण करता दिखा. कई जोड़ी आंखें उस पर टिक गयीं.

उस बच्चे ने पंडाल के खूंटे के पास ठंड से कांपते-कराहते एक पिल्ले को गोद में उठा कर अपने सीने से चिपका लिया. उस पिल्ले के दायीं पैर में चोट भी लगी थी. इस आकस्मिक ममता पर पिल्ला निहाल था. उसने कराहना बंद कर दिया था. वह बच्चा उसे गोदी में लिए हुए पंडाल से बाहर निकाल गया.

इस घटना मे जो पते की बात थी, वह यह कि वह बालक स्वयं जन्मांध था. एक सुसंस्कृत समाज में सभ्य नागरिक की परिभाषा गढ़नेवाले हम मनुष्य संवेदनाओं से इतने परे हैं कि किसी पीड़ित की आवाज भी हमें उद्वेलित नहीं करती. कहा जाता है कि किसी इंद्रिय से विच्छिन्न मनुष्य की छठी इंद्रिय सक्रिय रहती है.

नफरत और उपेक्षा का शिकार एक बच्चे के लिए क्या आदमी और क्या जानवर! सबकी दुर्दशा उसे अपनी ही लगेगी. मुझे बाद में पता चला कि वह बच्चा ड्रम बजाने में उस्ताद था, इसलिए ऑर्केस्ट्रा टीम ने उसे नये साल के जश्न वाले कार्यक्रम में शामिल किया था .

कुछ दिनों बाद हमारी स्वयंसेवी संस्था ने उसी ब्लाइंड स्कूल में फल-मिठाइयां बांटने का निर्णय लिया, जहां वह बालक रहता था.

गेट से मुख्य द्वार तक यूनिफार्म पहने दो कतार में उस विद्यालय के सभी बच्चे खड़े थे, जिन्होंने हाथ जोड़ कर हमारा अभिवादन किया. एक हॉल में उसी ब्लाइंड स्कूल के बच्चों द्वारा बनायी गयी पेंटिंग्स, हैंडीक्राफ्ट्स, क्ले-पॉट्स और अन्य चीजों की प्रदर्शनी लगी हुई थी. बेहद प्रतिभाशाली थे ये बच्चे. उनमें से कितनों ने तो देखा ही नहीं था कि लाल या पीला रंग कैसा होता है, पर उन रंगों से रंगी उत्कृष्ट कलाकृतियां मौजूद थीं.

एक संपूर्ण अंग से विच्छिन्न होकर केवल स्पर्श या श्रवण शक्ति से चीजों को पहचान जाना और अंधकार की दुनिया में ही विचरण करना कितना मुश्किल होता होगा! एक सोलह साल के लड़के ने बहुत सुरीली आवाज में गाना गाया और हमारी संस्था ने उसे राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में भेजने और उसे विधिवत संगीत की शिक्षा देने का दायित्व ले लिया.

मुझे लगता है, विकास के सारे आयाम और हुनरमंदों की फौज केवल उन जगहों तक सीमित है, जहां आवागमन सुलभ है. छुपे हुए कलाकार वस्तुतः ऐसी जगहों पर भी हैं, जहां जाने से बुद्धिजीवी वर्ग परहेज करता है. संवेदनाएं सुषुप्त हो सकती हैं, पर उन्हें मरने नहीं देना चाहिए.

अनाथ आश्रम या मूक-बधिर-अंध विद्यालयों में कुछ अद्वितीय प्रतिभा वाले बच्चे रहते हैं, उचित प्लेटफाॅर्म के अभाव में वे गुमनाम हो जाते हैं. उनकी प्रतिभा खिलने से पहले ही मुरझा जाती है. शिक्षित समाज की यह जिम्मेवारी है कि ऐसे उपेक्षित समुदाय के प्रतिभावान विद्यार्थियों को प्यार से यथासंभव मदद पहुंचाये.

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