चुनावी नतीजों से उभरे कई सच

।। अजय सिंह ।। मैनेजिंग एडिटर गवर्नेस नाउ : राजनीति में जिस तरह की हताशा पसरी है, उसके मद्देनजर मोदी लोगों की आशाओं और बदलाव की चाहत के प्रतीक के तौर पर उभरे हैं. वे परंपरागत राजनीतिज्ञों द्वारा छोड़ी जगह को भर रहे हैं, जो दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ने के लिए तैयार नहीं […]
।। अजय सिंह ।।
मैनेजिंग एडिटर
गवर्नेस नाउ : राजनीति में जिस तरह की हताशा पसरी है, उसके मद्देनजर मोदी लोगों की आशाओं और बदलाव की चाहत के प्रतीक के तौर पर उभरे हैं. वे परंपरागत राजनीतिज्ञों द्वारा छोड़ी जगह को भर रहे हैं, जो दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं. गणित की तरह ही राजनीति में भी समस्या का अति-सरलीकरण उसे समझने की राह कठिन कर देता है. राज्यों के विधानसभा चुनावों की गुत्थी को सुलझाने के लिए सर्वत्र लागू किये जा सकनेवाले सच की तलाश भी कुछ इन्हीं चुनौतियों से भरी है. वास्तव में सच कई हैं और कोई भी ऐसा नहीं है, जो इस पहेली को सुलझा सके.
पहली नजर में देखें, तो आम आदमी पार्टी की सफलता को अब तक राजनीति के लिए बाहरी माने जानेवालों की सामाजिक स्वीकार्यता का संकेतक माना जा सकता है. अरविंद केजरीवाल एनटी रामाराव नहीं हैं, जिन्हें उनकी सिनेमाई लोकप्रियता का सहारा था; न ही वे कांशीराम हैं, जिन्होंने वर्षो की मेहनत से एक सामाजिक समूह को लामबंद किया. वे जीवन की रोजाना की परेशानियों से जूझ रहे हमारे पड़ोस में रहनेवाले सामान्य व्यक्ति की तरह हैं.
फिर भी उन्होंने व्यवस्था को चुनौती दी. हकीकत यह है कि केजरीवाल आम नागरिक की मुश्किलों का प्रतीक बन गये, जिन्हें जीवन के हर कदम पर मजाक का पात्र बनाया जाता है. क्या आपको रॉबर्ट वाड्रा का अहंकार से भरा ‘मैंगो मैन’ का ट्वीट याद है? या हवाई यात्रा करनेवाले सामान्य यात्रियों के लिए शशि थरूर का ‘कैटल क्लास’ का प्रयोग आपकी स्मृति में है? इसी तरह भाजपा के विजय गोयल ने सड़क के दबंग की तरह केजरीवाल की पहलकदमी पर कब्जा जमाने की कोशिश की. इन सब ने केजरीवाल के इर्द-गिर्द एक मिथक खड़ा करने में योगदान दिया. उनकी छवि परंपरागत राजनीति करनेवाले राजनीतिक वर्ग के बीच घिरे एक साधारण व्यक्ति की बनी.
यदि आप गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को श्रेय नहीं देना चाहते, तो केजरीवाल आपको एक अपवाद के तौर पर नजर आयेंगे. केजरीवाल के उलट मोदी एक करिश्माई नेता हैं, जो राजनीतिक परिदृश्य में छाये कुटिल नेताओं के बीच घिरे नजर आते हैं. पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर मोदी की ताजपोशी का विरोध करनेवालों को जिस तरह से हाशिये पर धकेल दिया गया, वह मोदी की लोकप्रियता को बयान करता है.
एक तरह से देखें, तो भगवा बिग्रेड के लिए भी मोदी एक बाहरी व्यक्ति की तरह हैं. उनकी राजनीतिक शब्दावली और मुहावरे परंपरागत राजनीति नारेबाजी से हट कर हैं. इस तथ्य ने कि मोदी हिंदुत्व बिग्रेड के नेताओं के बीच अलोकप्रिय हैं, उनकी लोकप्रियता को बढ़ाने का काम किया है.
यह सब कहने का अर्थ यह नहीं है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के नेता महत्वपूर्ण नहीं थे. इसमें कोई शक नहीं कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहचान जनता के लोकप्रिय नेता की है. उनके व्यवहार और आचरण में उस आडंबर और घमंड की झलक नहीं मिलती, जो आम तौर पर राजनीतिज्ञों की निशानी होती है.
उनके दिन-रात राजनीति में लगे रहने और जमीन से जुड़े होने की खासियत ने उन्हें इतनी दूर तक पहुंचाया है. लेकिन उनकी भीषण जीत में मोदी की भूमिका को नकारना कमरे में मौजूद हाथी को अनदेखा करने के समान है. अगर आप अपनी स्मृति पर थोड़ा सा जोड़ लगाएं, आपको शिवराज द्वारा जताया गया वह संशय याद आयेगा कि राज्य में चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर मोदी के नाम की घोषणा उन करीब तीन दर्जन सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकता है, जिसमें मुसलिम मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं.
लेकिन नतीजों को देखने से पता चलता है कि शिवराज की आशंकाएं निमरूल साबित हुई हैं. इसके साथ ही यह परंपरागत राजनीतिक धारणाओं के आधार पर अल्पसंख्यकों के आचरण का पूर्वानुमान लगाने पर भी सवालिया निशान लगाता है.
इसी तरह से छत्तीसगढ़ में कांगेसी नेताओं की बस्तर में माओवादियों द्वारा हत्या के बाद रमन सिंह की राह काफी कठिन नजर आ रही थी. हालांकि, सिंह अलोकप्रिय नहीं थे, लेकिन उनके कुछ मंत्रियों का ट्रैक रिकॉर्ड बेदाग नहीं था. और उन पर लगाम कसने में रमन सिंह की अक्षमता ने उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं. लेकिन मोदी ने सतत प्रचार करके पार्टी कार्यकर्ताओं को लामबंद किया और उन्हें आशा की किरण दिखायी. रमन सिंह के विकल्प के तौर पर अविश्वसनीय अजीत जोगी की मौजूदगी ने भी भाजपा के पक्ष में काम किया.
राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया निश्चित तौर पर शाही परिवार की करिश्माई वारिस हैं. लेकिन निश्चित तौर पर वे भैरों सिंह शेखावत नहीं हैं, जिनका कद भगवा खेमे के शीर्ष नेताओं के बराबर था. राजस्थान में जिस तरह से सत्ता एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती रही है, उसके मद्देनजर सिंधिया को सत्ता विरोधी स्वाभाविक रुझान का भी फायदा मिला.
लेकिन, उनके हिस्से में जो राजनीतिक इनाम आया है, वह उनकी क्षमताओं के अनुपात में नहीं है और इसका श्रेय नरेंद्र मोदी को देने के लिए विशेष प्रज्ञा की जरूरत नहीं है.
इस तथ्य को नजरअंदाज करना नादानी होगी कि विधानसभा चुनाव के परिणाम परंपरागत राजनीति के खिलाफ आम लोगों के गहरे गुस्से और वितृष्णा की लहर की देन हैं. यही वह कारण है कि आम आदमी पार्टी के खिलाफ एक प्रायोजित स्टिंग ऑपरेशन ने केजरीवाल के पक्ष में उमड़ कर वोट करने के लोगों के संकल्प को और मजबूत किया.
दिलचस्प यह है कि परंपरागत तौर पर तीसरी शक्ति की जगह भरनेवाली शक्तियां हाशिये पर नजर आ रही हैं. यह निश्चित तौर पर शरद यादव, प्रकाश करात, मुलायम सिंह यादव के लिए खतरे की घंटी की तरह है, जो परंपरागत राजनीति में गहरे धंसे हैं और बदलती हुई जनभावना के अनुरूप खुद को नये सिरे से बदलने को तैयार नहीं हैं.
ध्यान देने लायक बात है कि ममता बनर्जी, नवीन पटनायक इस श्रेणी में नहीं आते. नीतीश कुमार की बिहार में विचित्र स्थिति है, जहां राज्य को फिर से खड़ा करने की उनकी कोशिश अक्षम नौकरशाही और जातिगत व्यवस्था के कारण एक तरह से नकारात्मक परिणाम देते नजर आ रहे हैं. निश्चित तौर पर उभर रहे परिदृश्य में वे सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं.
हर पैमाने पर मोदी से उनका श्रेय छीनना, शुतुरमुर्गी रवैया होगा. राजनीति में जिस तरह की हताशा पसरी है, उसके मद्देनजर मोदी लोगों की आशाओं और बदलाव की चाहत के प्रतीक के तौर पर उभरे हैं. वे परंपरागत राजनीतिज्ञों द्वारा छोड़ी गयी जगह को भर रहे हैं, जो दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उनके राजनीतिक अश्वमेध रथ को नवाचारी राजनीतिक तर्को से ही रोका जा सकता है, जो लोगों की धड़कनों से सुर मिला सके.
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