जिम्मेवार राजनीति

Updated at : 11 Jan 2016 1:10 AM (IST)
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जिम्मेवार राजनीति

पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तान दौरे के समर्थन में दिया गया बयान चर्चा में है. चर्चा की मुख्य वजह यह है कि इस हमले के बाद ज्यादातर विपक्षी नेताओं ने मोदी के पाकिस्तान यात्रा और नवाज शरीफ से उनकी मुलाकात को न […]

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पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तान दौरे के समर्थन में दिया गया बयान चर्चा में है. चर्चा की मुख्य वजह यह है कि इस हमले के बाद ज्यादातर विपक्षी नेताओं ने मोदी के पाकिस्तान यात्रा और नवाज शरीफ से उनकी मुलाकात को न केवल गैर जरूरी बताया, बल्कि इस पर सवाल भी खड़े किये. राजनीति जिस दौर में पहुंच गयी है, उसमें अमूमन विपक्ष, सत्तापक्ष या सरकार के हर कदम (राष्ट्रहित की कसौटी पर कसे बगैर) का विरोध करना अपना दायित्व समझता है.

राजनीति की इस भेड़चाल ने जनमानस की अपेक्षाओं को भी इसी अनुरूप ढाल दिया है. लेकिन, इसके विपरीत नीतीश कुमार ने आठ जनवरी को सार्वजनिक तौर यह कहने का साहस किया कि नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान के साथ रिश्तों को एक और मौका देने की कोशिश गुजरे वक्त में कमजोर पड़ते द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की एक अच्छी पहल है. उन्होंने पुराने अनुभवों के आधार पर यह भी कहा कि जब दो देशों के नेता संबंध सुधारने की ओर बढ़ते हैं, तो स्थितियों को बिगाड़ने के लिए घटनाओं को अंजाम दिया जाता है. जो लोग नीतीश कुमार के इस बयान को महज नरेंद्र मोदी की प्रशंसा के तौर पर देख रहे हैं, उनके लिए इसका राजनीतिक मतलब निकालना स्वाभाविक है. लेकिन, यदि इस बयान को ऐतिहासिक संदर्भों से जोड़ कर और राष्ट्रहित की कसौटी पर कस कर देखें, तो इसकी गंभीरता का पता चलेगा. साथ ही यह समझ भी साफ होगी कि आज के दौर में जिम्मेवार राजनीति की कितनी जरूरत है.

नीतीश कुमार ने कई मौकों पर धारा के विपरीत और जिम्मेवार राजनीति की राह पर चलने का साहस किया है. नौ नवंबर, 2012 को नीतीश एक सप्ताह की यात्रा पर पाकिस्तान गये थे. तब केंद्र में यूपीए की सरकार थी. नीतीश कुमार एनडीए सरकार के मुख्यमंत्री थे, यूपीए की धुर विरोधी सरकार के मुखिया. लेकिन, पाकिस्तान की यात्रा से लौटने के बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह से मुलाकात कर पूरी यात्रा के फलाफल के बारे में जानकारी दी. इसी तरह जून, 2012 में उन्होंने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने का एलान किया. तब भी उनका दल जदयू, भाजपा का सहयोगी था. प्रणब मुखर्जी यूपीए की ओर से नामित थे. भाजपा ने राष्ट्रपति चुनाव में पूर्व स्पीकर पीए संगमा को समर्थन दिया था. नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाक यात्रा का समर्थन करते हुए जिस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाया है, वह यह है कि जब भी दोनों देशों के नेता संबंध सुधारने की ओर बढ़ते हैं, तो कुछ शक्तियां इसमें अड़चन डालने के लिए आगे बढ़ती हैं. उनके इस बयान को करगिल युद्ध से लेकर पठानकोट तक की कई घटनाओं के संदर्भ में देखने की जरूरत है.

फरवरी, 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वाघा बॉर्डर पार कर लाहौर गये थे. तब भारत-पाक के बीच रिश्तों पर जमी बर्फ के पिघलने की उम्मीद जगी थी, लेकिन तीन माह बाद ही मई में करगिल में हमला हुआ. जुलाई, 1999 में भारतीय सेना ने अथक प्रयासों से करगिल को मुक्त कराया. उफा के बाद गुरुदासपुर में हमला भी लोगों के जेहन में है. ताजा साक्ष्य पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमला है. 25 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काबुल से वापसी के क्रम में िबना तयशुदा कार्यक्रम के लाहौर गये. भारतीय नेतृत्व की इस पहल की पूरी दुनिया में प्रशंसा हुई. इसके ठीक एक सप्ताह बाद दो जनवरी को आतंकवादियों ने पठानकोट एयरबेस पर हमला किया, जिसमें सात जवान शहीद हुए. आतंकियों के पाक के साथ संबंध के सबूत मिले हैं. ऐसी घटनाओं को अंजाम देनेवालों की मंशा आखिर क्या है? यही न कि भारत-पाक के रिश्ते कभी मधुर न हो पायें. यदि कुछ एक घटनाओं के तर्क के आधार पर बातचीत का सिलसिला टूट जाये और दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव कायम रहे, तो जाहिर तौर पर ऐसी घटनाओं को अंजाम देनेवाली शक्तियां अपने मंसूबे में सफल होंगी. ऐसे नाजुक मसले पर राजनीति दलों का स्टैंड क्या होना चाहिए, इसे नीतीश कुमार ने अपने बयानों के माध्यम से बताया है.

जो लोग पठानकोट की घटना के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाक दौरे पर सवाल खड़ा कर रहे हैं, उन्हें वार्ता की राह में रोड़े अटकानेवाली शक्तियों की कुचाल को समझने की जरूरत है. किसी कदम को राष्ट्रहित की कसौटी पर कसे बगैर सरकार के हर कदम के विरोध की राजनीति ने देश और राजनीति का पहले ही काफी नुकसान किया है. जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक नेतृत्व वोट की चिंता बगैर सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस पैदा करें. तभी राष्ट्रहित की चिंता करनेवाला जनमानस भी तैयार होगा. नीतीश कुमार ने अपने बयानों के जरिये यह साहस किया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि बाकी राजनीतिक दल भी इससे सीख लेंगे.

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