तो आज कुछ और ही मजा होता

Updated at : 09 Jan 2016 6:33 AM (IST)
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तो आज कुछ और ही मजा होता

चंचल सामाजिक कार्यकर्ता हिंदी पट्टी बड़े खौफ में जीती है. भेष-भूषा, खान-पान, रहन-सहन और तो और बोली-भाषा में भी वह अपने को हीन समझती है. सैकड़ों साल से लदी अंगरेजी और अंगरेजियत ने इसे बीमार करके रख दिया है. हिंदी पट्टी का कोई आदमी काम की तलाश में जहां कहीं भी जाता है, उसे परदेस […]

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चंचल

सामाजिक कार्यकर्ता

हिंदी पट्टी बड़े खौफ में जीती है. भेष-भूषा, खान-पान, रहन-सहन और तो और बोली-भाषा में भी वह अपने को हीन समझती है. सैकड़ों साल से लदी अंगरेजी और अंगरेजियत ने इसे बीमार करके रख दिया है. हिंदी पट्टी का कोई आदमी काम की तलाश में जहां कहीं भी जाता है, उसे परदेस कहता है और अपने गांव को मुलुक कहता है. इस मुलुक के छोरे पर परदेस का रंग ऐसा चढ़ता है कि महीनों वह अपने मुलुक में इसे भुनाता रहता है. ललुआ केवट कल सरेआम पंडित राजमणि दुबे से चार कुबरी मार खा गया. हुआ यूं कि लालू कमाने की गरज से लुधियाने चला गया रहा और जब लौटा तो पंजाब को ओढ़े हुए आया.

चारखाने की तहमत, आधे बांह की बंडी, कलाई में स्टील का चमकदार कड़ा, सातवीं लाइन न बोलनी हो तो पूरा पंजाबी लगता है. रमेश की दुकान पर खड़ा लालू लवंगलता खा रहा था. इसी बीच कहीं से राजमणि दुबे आ गये. आते ही दुबे ने लालू से कहा, अच्छा हुआ मिल गये लालू भाय, कल सुबह आते तो चार गो गड्ढा खोदना है, सरकार की तरफ से आम का पेड़ मिला है, लगवा दूं, बाल-बच्चों के काम आयेगा. आधा लवंगलता मुंह में ही था कि लालू ने बड़ा सा मुंह खोल कर गरिया दिया. दुबे जी गरमा गये, अबे भगेलुआ के सारे, तोर ई हिम्मत कि हम्मे गाली देबे? और दनादन चार कुबरी लालू के कटी क्षेत्र पर धर दिये, रामलाल तेली बताय रहा था कि भईया ओ तो और मार खाता, लेकिन इसी बीच पंडित जी के पैर के नीचे पिलई आ गयी, और वह ऐसे चीखी कि पंडित जी खुदे पानी के गच्चे में जा गिरे.

लाल्साहेब की दुकान पर लगनेवाली संसद बैठ चुकी है. लाल्साहेब बेना से भट्ठी को हवा दे रहे हैं और भट्ठी छापर को धुआं से भर रही है. संसद में राजनीति तली जा रही है, ठाकुर प्रसाद टटके परदेस कमा के लौटे हैं, कलकत्ते के बरन कंपनी में फिटर हैं मामूली बात है क्या? नवल उपधिया ने आखन देखी बताये- दो दिन पहले की बात है, हम बाजार गये रहे दवा लेने, बिकास को पेचिस पकड़ लिया है.

दवा ले के लौट ही रहा था, तब तक अठबजवा गाड़ी के पसिंजर उतर के आय रहे थे, उसी में अपने ठाकुर प्रसाद भी रहे. गाड़ी के धुआं से कपड़ा-लत्ता, मुंह-शरीर सब करिया रंग से सना रहा. हम तो पहचान ही नहीं पाये. लेकिन उन्होंने हमें पहचान लिया. रिक्शे पर दो बोरिया समान, एक बाल्टी, एक छाता. मिलते ही बहुत खुश हुए. चलो अच्छा, जदी मना कि अपुन को अपन जन मिल जाय, तो खूब भालो लागे जे. रिक्शा रुका. ठाकुर प्रसाद न्यू बाम्बे सैलून में गये. दाढ़ी बनी. चम्पी अलग से. महकवाला तेल लगा. कपड़ा बदलान. नयी धोती, कमीज, निकली. पंप जूता निकला. आगे आगे छाता लिये ठाकुर परसाद, पीछे हम. उसके पीछे रिक्शा. जिधर से हम चलें, जनता हमारी तरफ देखे, काहे से कि उनके पैर में चिपका पंप जूता चूं चूं बोल रहा था. तीन कोस हम पैदल पार कर गये, पता ही नहीं चला. रस्ते भर कलकत्ते की राजनीति पर बोलते रहे, हम सुनते रहे…

तो बोले का? कयूम मियां ने टुकड़ा जोड़ा. कीन उपधिया ने सूचना दी- का बोले, नवल का बतायेंगे, वो तो खुद साछात आय रहे हैं. लोगों ने देखा सजे-धजे ठाकुर प्रसाद एक हाथ में छाता लिये, दूसरे हाथ से धोती की फुक्ती पकड़े चले आ रहे हैं. चिखुरी मुस्कुराये- ई ठाकुर परसाद तो बिलकुले भद्रलोक होय गये हैं. ठाकुर प्रसाद को इज्जत से बिठाया गया. आज की चाय पेसल हो गयी. मेहमान ने जुबान खोला- लाल्साहेब! पियोर दूध की पेसल चाय, जदी मना कि अपुन की तरफ से…

कयूम मियां ने बात की शुरुआत सीधे सियासत से शुरू कर दी. एक बात बताया जाय बाबूसाहेब कि बंगाल में चुनाव होवे वाला है, किसकी सरकार बनेगी? ठाकुर प्रसाद किसी जमाने में सिद्धार्थ दादा के प्रशंसक रहे हैं, राजनीति पर बोलते समय उन्हीं की मुद्रा अपनाते हैं. पहले गंभीर हुए.

दोनों होठों को चिपका कर मुंह को कान की तरफ खींचे फिर बोले- गोलमाल. जदी मना कि कुछो नहीं कहा जा सकता. लड़ेगा सभी लोग. का कमनिस्ट, का फूल वाला, का पत्तीवाला. अबकी बार हाथ का पंजा भी जोर मारेगा. मुला एक बात तो तय है कि जदी मना कि तीन पत्ती और हाथ मिल जाय, तो भद्र लोग किसी को घुसने नहीं देगा बिहार माफिक.

तीन पत्ती? उमर दरजी को कुतूहल हुआ. चिखुरी ने बताया- तीन पत्ती मतलब तीन पंखुड़ी वाला फूल यानी ममता बनर्जी की पार्टी का चुनाव चिह्न. हाथ का मतलब कांग्रेस का पंजा. ये दोनों यदि मिलते हैं, तो बड़ी जीत हासिल होगी. कम्युनिस्ट जड़ हो चुके हैं एक जगह खड़े-खड़े कदमताल कर रहे हैं. केंद्रीय नेतृत्व तो और भी जड़ है. अगर बंगाल के भद्रजनों के हाथ में संगठन दे दिये होते, तो आज कुछ और ही मजा होता. लेकिन, इतना तय है कि बंगाल केंद्र के साथ नहीं जायेगा.

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