यूपी में भाजपा का कल्याण नेतृत्व?

Updated at : 08 Jan 2016 12:56 AM (IST)
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यूपी में भाजपा का कल्याण नेतृत्व?

शीतला सिंह संपादक, जनमोर्चा राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के अपना 84वां जन्मदिन मनाने के लिए उत्तर प्रदेश आने को राजनीतिक समीकरणों की खोज के रूप में देखा जा रहा है. भाजपा के गिरते ग्राफ को बचा कर क्या वे पार्टी का राजनीतिक कल्याण कर पायेंगे? राज्यपाल रहते हुए भी वे अपने को पार्टीविहीन नहीं, […]

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शीतला सिंह
संपादक, जनमोर्चा
राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के अपना 84वां जन्मदिन मनाने के लिए उत्तर प्रदेश आने को राजनीतिक समीकरणों की खोज के रूप में देखा जा रहा है. भाजपा के गिरते ग्राफ को बचा कर क्या वे पार्टी का राजनीतिक कल्याण कर पायेंगे?
राज्यपाल रहते हुए भी वे अपने को पार्टीविहीन नहीं, बल्कि यही कह रहे हैं कि पार्टी का जो निर्देश होगा, वही उनकी प्राथमिकता होगी. इसलिए यह माना जा रहा है कि अभी न तो वे सत्ता-मोह से मुक्त हैं और न ही सक्रिय राजनीति में आने में उन्हें कोई बाधा है. कल्याण सिंह की पहचान उत्तर प्रदेश मंें जिन मामलों को लेकर है, उनमें एक है कि वे पिछड़े वर्ग लोधी समाज के सशक्त नेता थे.
इसी आधार पर उन्होंनेे पार्टी से विद्रोह करके अलग दल भी बनाया. दोबारा वे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बुलाने पर भाजपा में शामिल हुए, लेकिन विद्रोही प्रवृत्ति के फलस्वरूप उन्हें कोई अतिमहत्वपूर्ण पद नहीं सौंपा गया, जबकि पार्टी के अन्य नेताओं से उनकी गिनती शीर्ष में ही की जाती है.
अब सवाल है कि क्या भाजपा उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह को ही अपना नेता बना कर पार्टी का उद्धार करना चाहती है. इस रूप में दो तत्व प्रमुख रूप से निर्णायक हैं. एक तो उनका पिछड़ी जाति का होना, क्योंकि बकौल कल्याण सिंह, उत्तर प्रदेश में लोधी 36 विधानसभाओं में प्रभावी भूमिका का निर्वाह करते हैं.
लेकिन, जब उन्होंने अपनी राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनायी और विधानसभा चुनाव में उन्हें केवल चार सीटें ही प्राप्त हुईं, फिर भी उसी के बल पर मुलायम मंत्रिमंडल के दो महत्वपूर्ण पदों पर उनका कब्जा हो गया. इस आधार पर यह मूल्यांकन किया जा रहा था कि यदि मुलायम की पिछड़ी जातियों में लोधियों का भी समावेश हो जाये, तो क्या वह पिछड़ी जातियों की भूमिका को निर्णायक तक पहुंचा सकता है.
इस रूप में मुलायम सिंह के साथ पिछड़ी जातियों के समर्थन में यादव समुदाय तो था ही, अन्य कई पिछड़ी जातियां भी जुड़ी हुई थीं, इसलिए वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण निर्णायक भूमिका वाले माने जाते थे. कल्याण सिंह शासनकाल में बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद जब बड़े पैमाने पर मुसलिम सपा का समर्थक बने, तो मुलायम सिंह ने बसपा के कांशीराम से समझौता करके 1993 के चुनाव में मिल कर बहुमत सीटें जीती थीं. मुलायम मुख्यमंत्री भी बन गये थे.
कल्याण सिंह के पक्ष में अयोध्या और राममंदिर मुद्दा भी माना जाता है. मुख्यमंत्री रहते हुए ही बाबरी मसजिद का विध्वंस संभव था, लेकिन इसके बाद जो चुनाव हुए, तो भाजपा के वोट बढ़ने के बजाय घट गये, क्योंकि वृहत्तर हिंदू समुदाय ने इस कार्य के औचित्य का समर्थन नहीं किया. उसके बाद पुनः भाजपा अकेली सत्ता में नहीं आ सकी. मुख्यमंत्री रहते हुए भाजपा को एक बार लोकसभा में 84 में से 56 सीटें प्राप्त हुईं, लेकिन भविष्य के लिए यह सपना हो गया.
मोदी ने उत्तर प्रदेश से देश में सर्वाधिक 73 लोकसभा सीट जीत कर जो कीर्तिमान स्थापित किया, उसमें यह तथ्य देखा जाता है कि उन्होंने राममंदिर मुद्दे के बजाय युवकों में बेरोजगारी, महंगाई और असंतोष को अपना आधार बनाया. ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दिया, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि केंद्र की सत्ता में डेढ़ वर्ष रहने के बाद भी वे उत्तर प्रदेश में अपनी पुरानी शान को बचाने में कामयाब रहे, क्योंकि उप चुनाव और विधान परिषद तथा स्थानीय निकायों के चुनाव में कहीं भी यह नहीं लगा कि मोदी के प्रधानमंत्री रहने का लाभ भाजपा को उत्तर प्रदेश में मिल रहा है.
इसलिए इस बार भी कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ने का अर्थ यही होगा कि राममंदिर मुद्दा भविष्य में राजनीतिक लाभ से जुड़ सकता है, क्योंकि राममंदिर को लेकर लोगों में भावना तो है, लेकिन मानना यही है कि यह भक्ति और आस्था का नहीं, बल्कि भाजपा इसे राजनीतिक लाभ उठाने के लिए इस्तेमाल करती है.
उत्तर प्रदेश में भाजपा नेतृत्व के सामने प्रमुख प्रश्न यही है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में नायक के रूप में किसे अग्रणी बनाये. यह भी कि संगठन और नेतृत्व के प्रश्न पर पार्टी में जिस प्रकार का विभाजन है, उससे यह नहीं माना जा सकता कि भाजपा कुछ अलग दिखनेवाली पार्टी है. यही कारण है कि राज्य के जिलाध्यक्षों का चुनाव कराने में पार्टी असफल रही है.
इसलिए यह प्रश्न होगा कि क्या पिछड़े वर्ग के कल्याण सिंह को लेकर पार्टी के नेताओं में भी विरोध है, क्या कोई राजनीतिक लाभ मिल पायेगा? क्या कल्याण सिंह के पिछड़ा वर्ग का होने के नाते उन्हें नेतृत्व सौंपने पर सवर्णों के वर्चस्व वाली भारतीय जनता पार्टी को कोई लाभ होगा? या कहीं यह प्रयास ‘चौबे से छब्बे बनने गये, दूबे ही रह गये’ वाली कहावत सिद्ध करनेवाला तो नहीं होगा!
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