श्रीलंका के बिन बुलाये मेहमान मनमोहन

Published at :04 Dec 2013 3:50 AM (IST)
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श्रीलंका के बिन बुलाये मेहमान मनमोहन

।। पुष्परंजन।।(ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक) क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जाफना जाना सही रहेगा? वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने जैसे ही यह संभावना व्यक्त की कि प्रधानमंत्री जाफना जा सकते हैं, उनके विरुद्घ विवादास्पद बयान आने आरंभ हो गये हैं. श्रीलंका के ‘तमिल लैंड’, जिसे हम उत्तरी प्रांत के नाम से जानते हैं, […]

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।। पुष्परंजन।।
(ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक)

क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जाफना जाना सही रहेगा? वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने जैसे ही यह संभावना व्यक्त की कि प्रधानमंत्री जाफना जा सकते हैं, उनके विरुद्घ विवादास्पद बयान आने आरंभ हो गये हैं. श्रीलंका के ‘तमिल लैंड’, जिसे हम उत्तरी प्रांत के नाम से जानते हैं, के मुख्यमंत्री के विघ्नेश्वरन ने मनमोहन सिंह को पधारने का न्योता भेजा है. कनगा सभापति विघ्नेश्वरन श्रीलंकाई तमिलों के उन प्रमुख नेताओं में से हैं, जो बंदूक के बगैर अपना राजनीतिक लक्ष्य पूरा करना चाहते हैं. उत्तरी प्रांत के मुख्यमंत्री के विघ्नेश्वरन ने संकल्प किया है कि वे ‘नार्दर्न प्रोविंस’ को अधिक स्वायत्तता दिलाने के वास्ते केंद्र से लड़ेंगे. मनमोहन सिंह के जाफना आने से विघ्नेश्वरन के संकल्पों को ताकत मिलेगी, यह श्रीलंकाई तमिल भी समझ रहे हैं, और उन्हें फूटी आंखों न सुहानेवाले राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे भी. श्रीलंका सरकार अभी चुप है, पर प्रमुख विपक्षी यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के मुख्य सचेतक जॉन अमरतुंगा ने बयान दिया है कि मनमोहन सिंह का आना ठीक नहीं है. अमरतुंगा ने कहा कि जब तक श्रीलंका के राष्ट्रपति भारतीय प्रधानमंत्री को निमंत्रण नहीं भेजते, उन्हें यहां आने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए, और यदि ऐसा होता है तो यूएनपी इसका देशव्यापी विरोध करेगी.

दिलचस्प है कि जो बात राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे अपने मुंह से कहना चाहते हैं, उसे वहां का विपक्ष कह रहा है. चंद दिन पहले समाप्त हुए राष्ट्रमंडल सम्मेलन में यही महिंदा राजपक्षे मनमोहन सिंह के आने के वास्ते हर तरह के प्रयास कर चुके थे. 15 से 17 नवंबर के बीच मनमोहन सिंह के जाफना जाने के इंतजाम के लिए श्रीलंका का राष्ट्रपति कार्यालय तैयार था. मनमोहन सिंह के श्रीलंका नहीं जाने से बाहर सिर्फ यह संदेश नहीं गया कि कनाडा, मॉरीशस के साथ भारत श्रीलंका से तमिलों के संहार का जवाब मांग रहा है. संदेश यह भी गया है कि भारत की केंद्र सरकार दक्षिण में अपनी सहयोगी पार्टी के आगे नतमस्तक है, और किसी तरह के स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है.

क्या भारत-श्रीलंका संबंधों को दो ध्रुवों में बांटने की साजिश की गयी है, या स्वयं संप्रग सरकार इस आत्मघाती जाल में फंसती चली गयी? 2011 का साल इन्हीं दो सवालों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. 2011 में श्रीलंका-भारत की जल सेना ने हर साल साझा अभ्यास के लिए समझौते किये थे. यह भी तय हुआ था कि दोनों देशों की जल और थल सेनाएं वार्षिक रक्षा-संवाद आयोजित किया करेंगी. उस समय के भारतीय रक्षा सचिव प्रदीप कुमार कोलंबो में थे और इसके प्रकारांतर रक्षा सचिव कुमार भारतीय शांति सैनिकों को श्रद्घांजलि भी अर्पित करने गये, जो मुक्ति चीतों के हमलों में मारे गये थे. लेकिन इस पूरे जोशो-जुनून की हवा सितंबर, 2011 में ही निकल गयी, जब जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने एक प्रस्ताव पास कर श्रीलंका को आदेश दिया कि तमिलों के साथ हुई लड़ाई में राजपक्षे सरकार स्वयं मानवाधिकार हनन की जांच करे. यह प्रस्ताव अमेरिका की पहल पर रखा गया था. संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव पर भारत समेत 24 देशों ने माना था कि 27 वर्षो तक श्रीलंका में चले गृह युद्घ में तमिलों का व्यापक रूप से वध हुआ है. मई, 2009 तक चले युद्घ में सरकार भी शामिल थी और मुक्ति चीते भी. चीन, रूस समेत 15 देश अब भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि वहां लाखों जानें गयी हैं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के इस मतदान में आठ देशों ने हिस्सा लिया ही नहीं. जिनेवा प्रस्ताव के बाद से श्रीलंका-भारत के संबंधों में जो खटास आयी, उसका फायदा चीन ने सबसे अधिक उठाया. लेकिन चीनी कूटनीति की तारीफ करनी चाहिए कि भारत की सार्वजनिक आलोचना किये बिना वह श्रीलंका की हर बड़ी परियोजना को हासिल करता रहा. इसके लिए हम हालात को दोष दें, या फिर यह माना जाये कि आरंभ से श्रीलंका मामले में हम कूटनीतिक गलतियां करते चले गये?

यह अच्छी बात है कि कॉमनवेल्थ सम्मेलन के बाद से श्रीलंका और भारत के बीच संबंध सुधारने की पहल हो रही है. लेकिन लगता नहीं कि लोकसभा चुनाव तक इस दिशा में कोई ठोस पहल हो पायेगी. ख़ुद डीएमके (द्रमुक) नेता एम करुणानिधि नहीं चाहेंगे कि मनमोहन सिंह जाफना जायें. सिंह के जाफना जाने से तमिलनाडु में कांग्रेस का कायाकल्प हो जायेगा, इसकी आशा तो बिल्कुल नहीं की जानी चाहिए. 2009 के चुनाव में 21 सीटों पर लड़ने और 18 लोकसभा सांसदों के साथ केंद्र को नकेल लगानेवाली डीएमके इस बार कांग्रेस से दोस्ती नहीं चाहती. पिछली बार 16 सीटों पर दोस्ताना चुनाव लड़नेवाली कांग्रेस अभी ‘एकला चलो’ की स्थिति में है. चिदंबरम इसलिए चाह रहे हैं कि प्रधानमंत्री जाफना जायें, ताकि द्रमुक से साङो चुल्हे की आग को एक बार फिर से प्रज्वलित की जा सके. तमिलनाडु कांग्रेस के नेता करप्पू एमजीआर (काले एमजीआर) अपनी छवि ऐसी नहीं बना पाये कि मुख्यमंत्री एवं अन्ना द्रमुक नेता जे जयललिता से मुकाबला कर सकें.

विचित्र है कि जयललिता 2014 का आम चुनाव वामपंथियों और भाजपा के समर्थन से लड़ने जा रही हैं. मुसलमान मतदाताओं को लुभाने के लिए मसजिद में मुफ्त का चावल मुहैया कराने की मुख्यमंत्री योजना कितना असर करती है, यह भी देखना है. तमिलनाडु की राजनीति में 11 लाख सदस्यों वाली इंडियन क्रिश्चियन फ्रंट (आइसीएफ) ने पिछले लोकसभा चुनाव में संप्रग का साथ दिया था, लेकिन 2011 के चुनाव में आइसीएफ ने जयललिता का साथ देकर उनकी सरकार बनाने में मदद की थी. ईसाई और मुसलमान वोटर तमिल राजनीति का ध्रुव बदल देते हैं, जाफना की ओर जाने का एक कारण यह भी है.

मुश्किल यह है कि जब भी केंद्र यह ऐलान करता है कि श्रीलंका के सैनिकों को हम प्रशिक्षण देने जा रहे हैं, जयललिता की आपत्ति आरंभ हो जाती है. पिछले सप्ताह भारतीय नौसेना प्रमुख डीके जोशी ‘नेवल मेरीटाइम कॉन्फ्रेंस’ में श्रीलंका के बंदरगाह शहर गाले गये और वहां के नौसैनिकों को चार वर्षीय बीटी कोर्स करने का ऑफर दे आये. एडमिरल जोशी जाफना, मन्नार, त्रिंकोमाली, हंबनटोटा भी गये थे. इससे संकेत मिलता है कि श्रीलंका सब कुछ बिसार कर संबंधों की नयी शुरुआत करना चाहता है. लेकिन जयललिता को आपत्ति की राजनीति करनी है. क्या इससे हमारी बेबस-लाचार विदेश नीति का मजाक नहीं बन रहा है? गौर से देखिये तो पूरे भारत में सिर्फ तमिलनाडु राज्य है, जिसकी चुनावी बिसात श्रीलंका के जाफना तक फैली हुई है!

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