उछाले जा रहे ‘‘गो होम ‘‘ के नारे

Published at :28 Nov 2013 5:30 AM (IST)
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उछाले जा रहे  ‘‘गो होम ‘‘ के नारे

।। निवेदिता ।। वरिष्ठ पत्रकार पत्रकारिता के इतिहास में इससे बुरा दिन क्या हो सकता है, जब तरुण तेजपाल जैसे लोग यौन शोषण के आरोपी हों! इस मुश्किल दौर में आखिर आदमी किस पर भरोसा करे? क्या यह मान लिया जाये की इस समय में मनुष्य बने रहना मुमकिन नहीं है? यह कैसा दंभ है, […]

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।। निवेदिता ।।

वरिष्ठ पत्रकार

पत्रकारिता के इतिहास में इससे बुरा दिन क्या हो सकता है, जब तरुण तेजपाल जैसे लोग यौन शोषण के आरोपी हों! इस मुश्किल दौर में आखिर आदमी किस पर भरोसा करे? क्या यह मान लिया जाये की इस समय में मनुष्य बने रहना मुमकिन नहीं है? यह कैसा दंभ है, जब एक स्त्री के शरीर और मन पर हमला करनेवाला इनसान गुरूर के साथ कहता हो कि उसने तो बिना शर्त माफी मांग ली. हम गुनाह भी करेंगे और उसका फैसला भी खुद सुनायेंगे. तरुण अब वही कर रहे हैं, जो ऐसे किसी अपराध के आरोपित अपने बचाव के लिए करते हैं. पूरी बेशर्मी के साथ तरुण यह कहने लगे हैं कि उन्हें राजनीतिक वजहों से फंसाया जा रहा है. कुछ भद्रजनों को तो यह भाजपा की साजिश लग रही है. भगवा बिग्रेड के लिए चाहे यह जितना सुनहरा मौका हो, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि यहां भी मनुष्यता ही हारी है.

तरुण तेजपाल ने अपनी जिस युवा सहकर्मी पर गोवा के साहित्यिक उत्सव के दौरान कथित तौर पर यौन हमला किया, आखिरकार उसने तहलका से इस्तीफा दे दिया. हम उसका शोक नहीं मना रहे हैं. हम यह संदेह पैदा कर रहे हैं कि क्या इस सब के पीछे फासीवादी ताकतें हैं? क्या यह जरूरी नहीं था कि बिना किसी राजनीतिक शोरगुल के इस मामले को वैसे ही देखा जाता, जैसा हमारे कानून में किसी यौन अपराध को देखा जाता है. अभी कोई सजा मुकर्रर भी नहीं हुई और तरुण तेजपाल अग्रिम जमानत के लिए दिल्ली हाइकोर्ट पहुंच गये. पत्रकारिता के लिए अब और बुरे दिन आनेवाले हैं. बुरे वक्त से लड़ रही महिलाओं के लिए अब काम के दरवाजे बंद होनेवाले हैं. यह उनके लिए सुनहरा मौका है, जो स्त्री को घर की दीवारों में ही दफन करना चाहते हैं. दुनिया के आंकड़े बताते हैं कि कामकाजी महिलाओं के लिए काम के अवसर लगातार कम हो रहे हैं. हमारे देश में भी कामकाजी महिलाओं की तादाद लगातार गिर रही है. फिर से ‘‘गो होम ‘‘ के नारे उछाले जा रहे हैं. महिलाओं पर हो रही हिंसा का ग्राफ यह बताता है कि हर तीन मिनट में एक महिला किसी न किसी तरह की हिंसा की, प्रताड़ना की शिकार होती है. ऐसे में उन लोगों को सामने आना होगा जो चाहते हैं कि पत्रकारिता बची रहे और जो इस दागदार दुनिया में भी मूल्यों के साथ जीना चाहते हैं.

गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का कहना है कि इस मामले की जांच कर रही पुलिस पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं है. इस बीच मामले की जांच करने गयी गोवा पुलिस की तीन सदस्यीय टीम तेजपाल से बिना पूछताछ किये लौट गयी. गोवा पुलिस ने तेजपाल के खिलाफ आइपीसी की धारा 376-2 के तहत कार्यालय में अपनी स्थिति का फायदा उठा कर अपने मातहत किसी महिला के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया है. अगर धारा 376 के तहत तरुण तेजपाल दोषी साबित होते हैं, तो उन्हें अधिकतम आजीवन करावास की सजा होगी. अभी तक इस मामले में पीड़िता की ओर से कोई एफआइआर दर्ज नहीं कराया गया है.

राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य निर्मला सामंत ने कहा पीड़िता को मजबूती के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए. अगर वह एफआइआर दर्ज नहीं भी कराती है, तो क्या तहलका की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी को लिखा गया इ-मेल उस लड़की के साथ हुए यौन हिंसा का पुख्ता सबूत नहीं है? स्वंय तरुण तेजपाल का माफीनामा क्या इस बात का सबूत नहीं है? फिर तरुण पर कार्रवाई के लिए पुलिस किसका इंतजार कर रही है? यही समय है, जब मीडिया महिला मुद्दों पर गंभीर हो और कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए वीमेन सेल का गठन हो. यह दुर्भाग्य है कि 80 से 90 फीसदी मीडिया दफ्तरों में शिकायत कमेटियां गठित नहीं हैं. यह कदम इसलिए भी जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की हिंसा को जगह नहीं मिले. आज इतनी बड़ी घटना नहीं घटी होती अगर पत्रकारों की नौकरी किसी संपादक की मेहरबानी पर नहीं टिकी होती.

जिस पत्रिका ने पत्रकारिता को नये आयाम दिये, जिसने 2002 जनसंहार के स्टिंग ऑपरेशन के जरिये दुनिया के सामने सच को उजागर किया, जिसने अजीत साही की सिमी के ट्रायलों पर की गयी रिपोर्टिग को प्रकाशित किया, जो पत्रिका निर्भीकता और निष्पक्षता के लिए जानी जाती है, जिस पत्रिका को आम आदमी के पक्ष में खड़ा करने के लिए बहुत सारे पत्रकारों की मेहनत लगी, उन तमाम रास्तों को तरुण तेजपाल ने दागदार किया. उस पीड़िता को सलाम जिसने यौन हिंसा के विरोध में तहलका से अपना इस्तीफा दे दिया. तहलका के सलाहकार संपादक जय मजूमदार और सहायक संपादक रेवती लाउल का इस्तीफा इस बात का सबूत है कि अभी नैतिक मूल्य बचे हुए हैं. आज पत्रकारिता को ऐसे ही साहस की जरूरत है. तरुण तेजपाल को अगर उनके किये की सजा नहीं मिली, तो पत्रकारिता का सर कभी ऊंचा नहीं उठेगा.

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