इतिहास को गंभीरता से देखो भई

Published at :06 Nov 2013 4:09 AM (IST)
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इतिहास को गंभीरता से देखो भई

।। चंचल।।(सामाजिक कार्यकर्ता) हस्बे जैल अर्ज कर दूं कि हम न तो इतिहास के, न ही जुगराफिया के पढ़ाकू रहे, न ही हमारी कोई दिल-च-च-चश्पी रही. हम इतना जानते हैं कि हमारा एक गांव है, जो कई गांवों से घिरा है. यहां जो भी पढ़ाकू निकले सब के सब एक लम्मर के फिसड्डी रहे. पढ़ाई-लिखाई […]

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।। चंचल।।
(सामाजिक कार्यकर्ता)

हस्बे जैल अर्ज कर दूं कि हम न तो इतिहास के, न ही जुगराफिया के पढ़ाकू रहे, न ही हमारी कोई दिल-च-च-चश्पी रही. हम इतना जानते हैं कि हमारा एक गांव है, जो कई गांवों से घिरा है. यहां जो भी पढ़ाकू निकले सब के सब एक लम्मर के फिसड्डी रहे. पढ़ाई-लिखाई हियां किये और नाली साफ करने निकल गये परदेस.. लोग चुप रहे. लेकिन अकेले कितना बोलते चुनांचे कयूम मिया भी चुप हो गये. पर ऐसा होता है क्या कि लोग चौराहे पर हों, चाय की भट्ठी गरम हो, अखबार सामने हो और लोग चुप रहें. नवल उपाधिया से नहीं रहा गया, बोले- कयूम काका! आप दिल तक तो ठीक रहे चस्पी पे चिकचिकाने लगे? कयूम ने दाढ़ी पर हाथ फेरा, मुस्कुराये. बोलना कुछ और चाह रहे थे, लेकिन ऐनवक्त पर ठिठक गये. भोला लोहार क छोटका लड़िका ठीक सामने आकर खड़ा हो गया. -ये बाबू! किताब चाही. भोला इस मुसीबत के लिए तैयार होकर तो आये नहीं थे. लिहाजा उन्हें घुड़कना पड़ा-कैसी किताब बे? नागरिक शास्त्र की. भोला ने टालना चाहा -चल सांङो के मिल जाई. लड़का फैल गया-हम इसकूल ना जाबे, मनीजर साहिब निकाल देंगे. भोला ने लंबी सी गाली दी-मनीजर की..

बहरहाल वह किसी तरह रोते हुए आगे बढ़ा. लाल साहब ने भोला को अर्दभ में लिया-ये भाई! ई लड़िका तो हूबहू वही बोलता रहा, जैसा अपने घर में सब बोलते हैं. चिखुरी ने लाल साहेब को तरेरा- तो अंगरेज हो जायेगा? लाल साहेब संभले- नहीं जे नहीं, काका, जैसे कि टाई लगाता है जूता पहिनता है, अंगरेजी मीडियम में पढ़ता है इसलिए..भोला समझ गये कि लाल साहेब क्या कह रहे हैं. भोला ने पलटवार दिया- ये बाबू साहेब! तो आप क्या चाहते हैं कि जिनगी भर ससुरा लोहार ही बना रहे और आपकी खटिया ‘साले’? हमें भी तो पढ़ने-लिखने का अधिकार मिला है. हम भी तो आगे बढ़ सकते हैं? लाल साहेब अंगरेजी और अंग्रेजियत के कत्तई खिलाफ हैं-सरकार सब कुछ दे रही है. किताब, कपड़ा, भोजन वजीफा. और का चाही भाई. ई अंगरेजी मीडियम से कोई तोप-तलवार निकला हो तो बताओ? बरबाद कर रहा है ससुरा. ये लौंडे खेलना तक भूल गये हैं. किसी लड़के को हंसते हुए नहीं देखोगे. ससुरे बचपन में ही बुढ़ा गये हैं. इसकूल जाते समय इनका थोभड़ा देखो, लगता है कसाईबाड़ा जा रहे हों.

चिखुरी बीच में नये होते तो लाल साहेब दूर तक खींचते. चिखुरी ने बहस को घुमाया- उधर का सुनिए. हा मियां क्या कह रहे थे? कयूम ने पोज बदला. हम ई कह रहे थे कि इतिहास क्यों पढ़ाया जाता है? लखन कहार से नही रहा गया- अजीब बात करते हो भाई, सरकार ने मदरसा खोला है. टीचर रखे हैं. तो क्या दंड-बैठकी करने के लिए यह सब कर रही है? कुछ न कुछ तो पढ़ाना है, सो लगे हाथ यह हिथास भी पढ़ा देते हैं. हिथास नहीं इतिहास कहते हैं-उमर दरजी ने ठीक किया. कयूम चिखुरी से मुखातिब हुए-कहां जाहिलों में फंस गया. चिखुरी आपै बताओ-इतिहास का कोई ताल्लुक है अवाम से कि वह इसको जाने?

चिखुरी ने चश्मा उतारा. मूंछ को सीधा किया- है, ताल्लुक है. अव्वल तो यह कि यह आपकी कद को नापता है. कल आप कितने बड़े थे आज कितने बड़े हैं.. उमर दरजी से नहीं रहा गया-जे बात तो सही है. हमारे परदादा हुजूर मरहूम मिया खालीफुर्रहन, अल्लाताला उन्हें जन्नत बख्सें, किस्सा बताते थे कि एक बाबू सुन्नर सिंह रहे बारहों महीने बस एक गो गमछा पहना करते थे. थे तो गरीब पर बला की ताकत थी. दस गज की ऊंचाई रही होगी. उनके ताकत की चर्चा उनके ससुराल तक थी. एक बार जब वो अपने ससुराल गये, तो उनके साले ने खुराफात कर डाली. एक बबूल के पेड़ को काट कर खूंटे की तरह गढ़ दिया और बोला कि इस खूंटे को उखाड़ दीजिए तो जाने. सुन्नर सिंह लगे उखाड़ने, उखाड़ तो दिये जड़ समेत, बबूल उखड़ा तो बीघा भर माटी भी जड़ के साथ उखड़ गयी.. कीन उपाधिया ने डांटा- अबे बकवास तो मतिये कर, सुन जो चिखुरी बता रहे हैं. हां तो दादा वो जो उस दिन पटना में चाणक्य वाली बात हुई थी कि वह इतिहास का स्वर्णिम युग था. है न सही? जीत की मुद्रा में बैठे कीन ने यह सवाल पूछ कर साबित करना चाहा कि वह और उसकी पार्टी विजय की ओर बढ़ रही है. इसलिए उसने ‘जोत्था’ भर चुनी को दो बार सहलाया और लगा चिखुरी का चेहरा देखने.

चिखुरी संजीदा हो गये. क्या स्वर्णिम युग था? अच्छा किया कि तुम लोगों ने पढ़ने-लिखने की गलती नहीं की. उस काल में किसान अपनी उपज का चौथाई हिस्सा हुकूमत को देता था. यह कायदा था. तुम जाना चाहोगे उस स्वर्णिम युग में? मेहनत किसान करे उपज राजा ले जाये यह स्वर्णिम युग था? धर्म के नाम पर जनता को चढ़ावा चढ़ाने के लिए उकसाया और वह चढ़ावा राजा के कोष में जाये? यही स्वर्णिम युग है? बकलोल! इतिहास को गंभीरता से देखना चाहिए.. समझे..

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