रिजर्व बैंक के बंधे हाथ

Published at :05 Nov 2013 5:18 AM (IST)
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रिजर्व बैंक के बंधे हाथ

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।। (अर्थशास्त्री) निर्यात और आयात के अंतर को व्यापार घाटा कहा जाता है. निर्यात से हमें डॉलर मिलते हैं. यदि निर्यात कम और आयात ज्यादा हो, तो विदेश व्यापार को घाटे में चल रहा कहा जाता है. कुछ ऐसी ही स्थिति हमारे देश की है.एक व्यक्ति प्रति सप्ताह ब्लड बैंक में […]

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।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।

(अर्थशास्त्री)

निर्यात और आयात के अंतर को व्यापार घाटा कहा जाता है. निर्यात से हमें डॉलर मिलते हैं. यदि निर्यात कम और आयात ज्यादा हो, तो विदेश व्यापार को घाटे में चल रहा कहा जाता है. कुछ ऐसी ही स्थिति हमारे देश की है.एक व्यक्ति प्रति सप्ताह ब्लड बैंक में जाकर अपना खून बेच आता है. वह कमजोरी से ग्रसित हो गया है. ऐसी ही स्थिति हमारे रिजर्व बैंक की है. वह चाहता है कि हमारी अर्थव्यवस्था गति पकड़े. परंतु सरकार द्वारा विभिन्न तरह से अर्थव्यवस्था का खून निकाला जा रहा है. ऐसे में रिजर्व बैंक के सभी अस्त्र फेल हो जाते हैं.

अक्तूबर के अंत में जारी मौद्रिक नीति की समीक्षा में रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की वृद्घि की है. यह इस बात का द्योतक है कि रिजर्व बैंक के हाथ बंधे हुए हैं. धीमी विकास दर और महंगाई की दोहरी मार में रिजर्व बैंक को रास्ता नहीं मिल रहा है. यदि रिजर्व बैंक के द्वारा ब्याज दर में ज्यादा वृद्घि की जाती है, तो महंगाई नियंत्रण में आती है, लेकिन विकास दर गिरती है. इसके विपरीत यदि ब्याज दर कम की जाती है, तो विकास दर बढ़ती है, परंतु महंगाई बढ़ती है.

महंगाई इसलिए पनपती है कि सरकार अधिक संख्या में नोट छापती है. सरकार को नोट छापने पड़ रहे हैं, चूंकि राजस्व का दुरुपयोग हो रहा है. सरकारी कर्मियों के बढ़े हुए वेतन एवं ठेकों के माध्यम से सरकारी राजस्व का रिसाव हो रहा है. इस रिसाव की पूर्ति सरकार के द्वारा नोट छाप कर की जा रही है.

ऐसे में रिजर्व बैंक ऐसा कर सकता है कि बैंकों के लिए ऋण देना कठिन बना दे. ऐसा करने से प्रचलन में आनेवाले नोट कम हो जायेंगे. महंगाई नियंत्रित होगी. परंतु उद्यमी को माल बनाने के लिए वर्किंग कैपिटल नहीं मिलेगा और आर्थिक विकास दर गिरेगी.

दूसरी समस्या विकास दर में रही गिरावट की है. पूर्व में आठ प्रतिशत विकास दर के स्थान पर आज पांच प्रतिशत को भी बनाये रखना कठिन हो रहा है. विकास दर बढ़ाने के लिए खपत कम और निवेश ज्यादा करना होता है.

सरकार यदि राजस्व का उपयोग सड़क, बंदरगाह, रिसर्च, रेल लाइन इत्यादि के लिए करे, तो विकास दर बढ़ती है. इसके विपरीत यदि सरकार सरकारी कर्मियों के वेतन, मनरेगा, राइट टू फूड तथा मिडडे मील पर खर्च बढ़ाये, तो विकास दर गिरती है.

तीसरी समस्या बढ़ते व्यापार घाटे की है. निर्यात और आयात के अंतर को व्यापार घाटा कहा जाता है. निर्यात से हमें डॉलर मिलते हैं. आयातकों द्वारा इन डॉलरों को खरीद कर विदेशों से फर्टीलाइजर, सेब अथवा मशीन खरीदने के लिए उपयोग किया जाता है. निर्यात कम और आयात ज्यादा हो तो विदेश व्यापार को घाटे में चल रहा कहा जाता है जैसे कि हमारी स्थिति है.

व्यापार घाटे को पाटने के दो उपाय होते हैं. एक यह कि मुद्रा का अवमूल्यन होने दें. रुपया सस्ता हो जायेगा तो हमारे निर्यात बढ़ेंगे और आयात महंगे हो जायेंगे. 1991 में मनमोहन सिंह ने इस उपाय को लागू किया था और देश को दीवालिया होने से बचाया था.

इस बार वे विदेशी निवेश के माध्यम से घाटे को पाटने का प्रयास कर रहे हैं. जैसे ऑटो रिक्शा चालक की आय कम और खर्च ज्यादा हो, तो वह ऑटो में दस प्रतिशत की पार्टनरशिप बनाकर कुछ रकम पा सकता है. लेकिन यह प्रक्रिया ज्यादा दिन नहीं चलती. पार्टनर के समझ में जाता है कि ऑटो रिक्शा घाटे में चल रहा है. तब चालक ने कहा कि आप 51 प्रतिशत की पार्टनरशिप कर लो.

फिर भी निवेशक ने पैसा नहीं लगाया, क्योंकि घाटे में चल रही कंपनी में कोई पूंजी लगाना नहीं चाहता. इसीलिए घरेलू उड्डयन, रिटेल, बीमा आदि में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के बावजूद निवेश नहीं रहा है. ऐसे में रिजर्व बैंक केवल अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बेच कर कुछ समय के लिए रुपये को गिरने से बचा सकता है. अर्थव्यवस्था की समस्या सरकारी नीति है.

वोट खरीदने के लिए सरकारी राजस्व का उपयोग करने से विकास दर गिर रही है. विदेशी निवेश को आकर्षित कर खपत करने से व्यापार घाटा बढ़ रहा है. सरकार यदि राजस्व का उपयोग हाइवे, रिसर्च आदि उत्पादक कार्यो में करती है, तो विकास चक्र चालू हो जाता है. हाइवे बनाने से यात्री अपने गंतव्य स्थान पर जल्दी पहुंच जाते हैं और उत्पादन करते हैं. हाइवे बनाने में सीमेंट, स्टील और श्रम की मांग बढ़ती है.

लोगों के हाथ में क्रय शक्ति आती है और वे बाजार से माल खरीदते हैं. पुन: विकास का सुचक्र चालू हो जाता है. इसके विपरीत यदि सरकार कर्मियों को बढ़ा कर वेतन दे अथवा ठेकों से रिसाव कराये तो रकम का बड़ा हिस्सा अर्थव्यवस्था से बाहर चला जाता है. सरकारी कर्मचारी सोना खरीद कर तिजोरी में रख देते हैं.

भ्रष्टाचार का काला धन विदेश चला जाता है. माल की मांग पैदा नहीं होती है. हाइवे अनुपलब्ध होने से यात्री का समय बस में बैठे व्यतीत हो जाता है और देश की उत्पादक क्षमता का ह्रास होता है. अत: अर्थव्यवस्था में गति लाने के लिए सरकार को अपने खर्चो की गुणवत्ता में सुधार करना होगा. रिजर्व बैंक के पास इसका उपचार नहीं.

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