हजारों रोशनी का सपना

By Prabhat Khabar Digital Desk
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।। नंद चतुर्वेदी ।।

मनुष्य की जिंदगी की सबसे बड़ी जरूरतों में रोशनी सबसे बड़ी जरूरत है. रोशनी की जरूरत समझने के लिए चाहे हम अंधकार को भी आवश्यक बताते रहें, लेकिन जिंदगी अंधेरे की सुरंग के पार देखना चाहती है जहां देखने और उत्सव मनाने के लिए बहुत कुछ है. रोशनी में सब कुछ नजर आता है, वे आपदाएं और तकलीफें भी जिनके पार जाना है, जिनके कारण रास्ते रुके और हम अनुभव करते हैं कि ‘परिवर्तन’ आवश्यक है.

अंधेरे के पार जाना जिंदगी का स्वभाव है, वह स्वार्थ नहीं है. इस स्वभाव के कारण अपने सघन अंधेरों के बीच मनुष्यों ने दुनिया की रोशनी, खुशहाली, समृद्धि के लिए प्रार्थना की है, कविताएं लिखी हैं. प्रार्थना में लिखा है- ‘कामये दु:ख तप्तानाम् प्राणिमा आर्तिनाशनम्’(चाहता हूं कि प्राणिमात्र की दुख मुक्ति हो). यह रोशनी के लिए ही प्रार्थना है. दु:ख के उन अंधेरों से मुक्त होने की चाहत जो मनुष्य को चलने आगे बढ़ने की हिम्मत देती हैं. दु:ख मुक्ति की इसी चाहत में कवि ने संसार भर के प्राणियों की दुर्लभ कामनाओं को छोड़ने की घोषणा की है. लिखा है ‘स्वर्ग भी नहीं चाहता राज्य भी नहीं और न पुनजर्न्म.’

लक्षित करें कि प्राणिमात्र के संताप-रहित करने की कामना के लिए मनुष्य के मन में कितनी उत्कट कैसी बेचैन आकांक्षा हैं. जैसे यही मनुष्य होने का अर्थ हो. देखने की बात यह भी है कि वह किसी विशेष पुरुष या किसी साधु-संत, या कि अध्यात्मवादी की आकांक्षा नहीं है.

मेरी दृष्टि में दुनिया भर के लोगों के मन में रोशनी का कोई ऐसा ‘दीया’ जलता है जो सबको, प्राणिमात्र को सब तरह के दु:खों के अंधेरों से मुक्त करना चाहता है. दरअसल करुणा की प्रकाश की नदी पर केवल बुद्ध का ही अधिकार नहीं है. पूरे मानव-वंश का है. यह कार्य कोई चमत्कार नहीं है कि मनुष्य ने अनेक प्रकार के अंधेरों से संघर्ष किया है अनेक प्रकार के अन्यायों के विरुद्ध मोर्चे खोले हैं और रोशनी से दुनिया को आलोकित करने का सपना पूरा

किया है. यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि अन्याय, विषमता और अधमताओं के अंधेरों से सेनाएं ही नहीं लड़ी हैं, मामूली, रण-कौशल की सारी कलाओं से अपरिचित अकेला आदमी भी जीत-हार की चिंता किये बिना लड़ा है.

कैसे-कैसे अंधेरे?

नि:संदेह हम सघन अंधेरों और दु:खों से घिरे हैं लेकिन हमने उतने ही साहस से उन दु:खों से मुक्त होने के प्रयत्न किये हैं. हमने बार-बार अपने समय के अंधेरों को, दु:खों को समझने की कोशिश की है. हमने उनसे मुक्त होने के लिए उन्हें श्रेणियों में बांटा है. गंभीर लोगों ने उन्हें ‘त्रय ताप’ कहा है. इस आशय की एक चौपाई दुलसीदासजी ने ‘रामचरितमानस’ के उत्तरकांड में लिखी है कि जब ‘राम राज्य’ स्थापित हो चुका है- ‘दैहिक, दैविक, भौतिक तापा/ रामराज मंह काहू न व्यापा।’ ऐसा नहीं हैकि इस चौपाई के माध्यम से तुलसीदास कोई ‘काल्पनिक रामराज्य’ या सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक यूटोपिया बना कर छोड़ देते हैं. वे उसका खुलासा करते हैं. उस राज्य की साफ-साफ उपलब्धियां बताते हैं. यह भी बता देते हैं कि कौन से अंधेरे हैं और कैसी-कैसी रोशनी हो?

आगेवाली चौपाई में लिखा :

नहिं दरिद्र कोऊ दुखी न दीना।

नहिं कोऊ अबुध न लच्छन हीना।।

इस प्रकार प्रकाश के अध्यात्मवादी अर्थ से अलग करता उसे सांसारिक अभिप्रायों से जोड़ता है. तुलसीदास की यह छोटी चौपाई उन व्यवस्थाओं की जरूरतों को भी समझाती है जिससे अयोध्या जनपद के नागरिक दरिद्रता, दीनता, दु:ख, विवेकहीनता और कुलक्षणों से मुक्त होते हैं.

दरअसल भारतीय इतिहास कवि तुलसीदास के पहले से लगा कर याद वाले उन पांच सौ वर्षो में सामंतों, जातियों, संप्रदायों, धार्मिक कर्म-कांडों और अंधविश्वासों से इस तरह रौंदा गया कि वह व्यवस्था-संबंधी एक सपना और तारतम्य के बारे में कोई निर्णय करने की स्थिति में ही नहीं रहा. सबसे बड़ी दुर्घटना तो उन विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण थे, जिनका लक्ष्य देश को लूटना और मनोबल गिराना था. दुर्भाग्य से वे कामयाब भी हुए. पराधीनता के इस काल में सब तरह के अंधेरे सघन होते गये. उपनिवेशवादियों ने अपार धन अपने-अपने देशों में भेजा. गांवों के उद्योग चौपट हो गये, कृषि के उत्पाद सात समुद्र पार जाने लगे. अथाह दरिद्रता, दु:ख-दीनता, निरक्षरता, अपराध और अधमताओं ने मनुष्य होने की सारी गरिमा खंडित कर दी.

यह देखने की बात है कि अंधेरे की श्रृंखला में उस संत कवि को दरिद्रता (गरीबी) ही सबसे सघन अंधेरे के रूप में नजर आयी है. अपने आराध्य के राज्य में कोई दरिद्र नहीं है, यह बात वह सबसे पहले बताता है. जिसके राज में प्रजा दुखी है उस राजा को ‘नरक’ भोगना पड़ता है, कह कर डराता, चेताता भी है. तुलसीदास दारिद्र्य की यातना जानते हैं. अपना जीवन मांग-मांग कर खाते और मसजिद में सो-सो कर काटा है (मांग के खाइबो, मसीत में सोइबो, लेबे को एक न देबे को दोऊ). दरिद्रता के बाद दु:ख और दीनतारहित गरिमापूर्ण जीवन की बात करते हैं. अयोध्या का नागरिक न ‘रोटी का याचक है और न गरिमा-रहित जिंदगी जीता है’ जो दीनता की या लाचारी की या सामाजिक प्रताड़नाओं से क्षत-विक्षत और कमजोर हो. वह बुद्धिहीन नहीं है, वह उचित-अनुचित का भेद जानता है और सब सुलक्षणों से संपन्न हैं.

ध्यान से देखें कि अयोध्या का यह वर्णन रोशनी के आयामों का मूर्त ‘ब्लू प्रिंट’ है जो किसी भी काल में किसी भी देश को अंधेरों से मुक्त करता चमकता है और जो इस ‘तमस’, इसी कालिमा से निकलने के लिए देश को एक बार फिर स्वतंत्रता का संघर्ष करने के लिए तैयार होता है. वह गुलामी, गरीबी, अन्याय, विषमताओं के खिलाफ लड़े जानेवाले सशस्त्र युद्धों की परंपरा के बरक्स एक नैतिक जन-सत्याग्रह की तकनीक आविष्कृत करता है और औपनिवेशिक शक्तियों को परास्त कर देता है. युद्ध की इस मौलिक, मानवीय तकनीक के आविष्कारक मोहनदास करमचंद गांधी थे. मैं गांधीजी की उस पुरुषार्थपूर्ण आवाज को हमेशा समझना चाहता हूं जिसके आह्वान पर असंख्य लोग खड़े हो गये, किसी विजय जुलूस के लिए नहीं, जेलखाने, नृशंसताओं और जालियांवाला बाग जैसी क्रूर अधमताओं को सहने के लिए.

यह सवाल भी वाजिब है कि आखिर गांधी किसका आदमी था? किसका हिमायती? अहमदाबाद के टेक्सटाइल मिल के मालिकों का या मजदूरों का? पूंजीपतियों का या प्रोलीतेरियत का? मेरी दृष्टि में वह ‘दरिद्रनारायण’ का हिमायती था. वह ‘ग्राम्य-स्वराज’ का आदमी था. वह गांववालों को औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा उजाड़े गांव उन्हीं के सुपुर्द करना चाहता था. वह मानता था कि देश का राष्ट्रपति गांव की दलित बेटी हो. वह पंचम जार्ज से ढाई गज कपड़ा पहन कर मिला था. वह और उसके आश्रमवासी अपने पाखाने साफ करते थे. उसने अपनी टूटी चप्पलें गांठीं और दूसरों की चप्पलें बनायीं. वह सब प्रकार की प्रभुताओं से लड़ा, और अपने स्वधर्म को बचाते हुए मारा गया.

नि:संदेह भारत का महाअंधकार ‘दरिद्रता’ ही है जिसने दूसरे क ई अंधेरों, अनिश्चयों, अपराधों और अवसादों के घेरे बनाये हैं. ‘दरिद्रता’ ने कई-कई तरह के अंध-विश्वास, अहंकार, अज्ञान और अनुदारता के दायरे फैलाये हैं. ‘दरिद्रता’ ने ही यह समझने नहीं दिया है कि हमारी गैर-बराबरी, विषमताएं, कुपोषण, कुशिक्षा और अनेक तरह के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक अन्याय ‘ईश्वरीय’ नहीं हैं और न वे अटल हैं. वे उस व्यवस्था का परिणाम हैं जिसने देश को अघाये हुए लोगों और भूखे, दरिद्रों के बीच बांट दिया है.

उस अमानवीय, लद्दड़ सामाजिक व्यवस्था का ही परिणाम है कि देश उच्चतम समतावादी दर्शन की पक्षधरता करते हुए असंख्य जातियों में बंटा हुआ है. ध्यान से देखें तो दरिद्रता और जाति का सघन रिश्ता बना है जिसने अपमान-अपकार्य के अंधेरों का सनातन संबंध बना दिया है. जातियों को बड़प्पन ने मनुष्य के कर्म, प्रतिभा, बुद्धि, जिजीविषा को अलंघ्य श्रेणियों में बांट दिया है. जाति और सामाजिक कर्म का रिश्ता अटल है. इतना अटल कि न बड़ी जातियों को यह त्रसदायक लगता है कि जाति-दंभ के कारण उनका कितना ‘अमानुषीकरण’ हो गया है और न छोटी दलित जातियों के लोगों को यह प्रतीत होता है कि वे अकारण अन्याय की मार सह रहे हैं.

भारतीय समाज के अनेक लक्षित-अलक्षित अंधेरों के बीच पुरुष वर्चस्व में डूबी स्त्री का पराधीन जीवन अचर्चित ही है. पांच सौ वर्ष पहले कवि तुलसीदास ने अत्यंत उदास मन से स्त्री पराधीनता पर यह चौपाई लिखी थी- ‘केहि बिधि सृजी नारि जग माँही, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं.’ (कौन-सी विधि से स्त्री की विधाता ने रचना की है? पराधीन को तो सपने में भी सुख नहीं मिलता).

डॉ राम मनोहर लोहिया ने भारतीय समाज के दो कटघरों से मुक्ति चाही है - वर्ण और स्त्री.

क्या भारतीय-समाज ने कट्टरता के क ई-कई अंधेरों से मुक्त होने का संघर्ष नहीं किया है? दरिद्रता, स्त्री, जाति, संस्थानिक धर्म और पंथवाद के विरुद्ध आक्रामक संघर्ष नहीं लड़े हैं? क्या तर्क, विज्ञान, प्रश्नानुकूलता के लिए और अंध-मतवाद के विरुद्ध शास्त्रर्थ नहीं किये हैं. क्या प्रकृति, सृष्टि, ईश्वर, जन्म-मरण के विषय में भारतीय मनीषा में गहन विचार-विमर्श नहीं हुआ है. आशा की बात यह है कि हमारे पास ‘सभ्य जीवन’ को बचाने की दृढ़ परंपरा और प्रमाण हैं. यह बात अलग है कि हम सामाजिक क्रूरताओं और विषमताओं से आज तक निर्णायक मुक्ति हासिल नहीं कर सके.

किसी भी शक्तिशाली राष्ट्र की मुक्ति-यात्र ‘द्वंद्व’ रहित नहीं होती. अच्छे, सभ्य, समतावादी समाज को क ई अवरोधों से लड़ना पड़ता है. अकल्पित यातनाएं भी आती हैं लेकिन अंधकार की हार होती है. रोशनी के सहस्रों दिये जलते हैं.

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