चांदनी रात में मानसरोवर का सौंदर्य

Published at :02 Nov 2013 3:20 AM (IST)
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चांदनी रात में मानसरोवर का सौंदर्य

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।। (वरिष्ठ साहित्यकार)कैलाश-मानसरोवर भारत की सांस्कृतिक विरासत के अभिन्न अंग हैं, लेकिन आज चीन के कब्जे में हैं. इसलिए जो भी भारतीय भगवान शिव और माता पार्वती के लीला-स्थल कैलाश पर्वत का दर्शन करना चाहते हैं, उन्हें चीन से वीजा लेना पड़ता है. पारंपरिक मार्ग से यह तीर्थयात्र प्रतिवर्ष जून में केंद्रीय […]

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।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।

(वरिष्ठ साहित्यकार)
कैलाश-मानसरोवर भारत की सांस्कृतिक विरासत के अभिन्न अंग हैं, लेकिन आज चीन के कब्जे में हैं. इसलिए जो भी भारतीय भगवान शिव और माता पार्वती के लीला-स्थल कैलाश पर्वत का दर्शन करना चाहते हैं, उन्हें चीन से वीजा लेना पड़ता है. पारंपरिक मार्ग से यह तीर्थयात्र प्रतिवर्ष जून में केंद्रीय गृह मंत्रलय के प्रबंधन में और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की देखरेख में होती है. यात्री कुमाऊं मंडल विकास निगम के वाहन से भारत-तिब्बत सीमा पर पहुंचने के बाद आगे की यात्र के लिए चीनी सेना को सुपुर्द कर दिये जाते हैं.

मानसरोवर जाने का एक कुछ सुविधाजनक रास्ता काठमांडू (नेपाल) होकर है. पिछले दिनों मेरे कुछ मित्र उसी रास्ते से मानसरोवर गये थे. यह यात्र नेपाल के टूर ऑपरेटरों की देखरेख में होती है. काठमांडू पहुंचने के बाद ट्रैवल कंपनी ने उन्हें पांचसितारा होटल में ठहराया और कैलाश यात्र संबंधी आवश्यक जानकारी और ट्रेकिंग किट प्रदान की. काठमांडू में ही भारतीय यात्री आगे के खर्च के लिए रुपये से चीनी मुद्रा युवान बदलते हैं. नेपाल-चीन सीमा पर बने 2300 मीटर की ऊंचाई पर बने ‘फ्रेंडशिप ब्रिज’ पार कर यात्री तिब्बत की सीमा में प्रवेश करते हैं. वहां चीनी आव्रजन कार्यालय के अधिकारी उनके पासपोर्ट-वीजा की जांच करते हैं और विधिवत जामा तलाशी लेते हैं. इसके बाद चीनी गाइड के नेतृत्व में सभी यात्री, पांच-पांच के दल में लैंडक्रूजर पर सवार होकर, तिब्बत के मुख्य प्रवेशद्वार झंगमो के लिए रवाना होते हैं.

झंगमो से नायलम-देबुला होते हुए मानसरोवर जाना होता है. रास्ते में त्सिंग्पो नदी (हमारा ही ब्रrापुत्र नद) का प्रबल प्रवाह, नीले आकाश के नीचे तिब्बत के हरे पठारों पर उन्मुक्त विचरण करते याक के झुंड, विभिन्न आकृतियों की अगणित चट्टानों का विहंगम दृश्य प्रतिकूल मौसम में यात्रियों को अलौकिक जगत में ले जाता है. मानसरोवर का रास्ता ऊबड़-खाबड़ पठारों से गुजरता है, जिस पर लैंडक्रूजर 100 किमी की रफ्तार से दौड़ता है और वह भी यूरोपीय देशों की तरह रास्ते की दायीं ओर से. प्रसिद्ध राक्षस ताल रावण की तपस्थली है. जहां शिव ने रावण को अमरत्व का वरदान दिया था. इसमें स्नान नहीं किया जाता.

इसके बाद पूर्व में कुछ दूर चलने पर मानसरोवर आता है, जहां तक पहुंचने के लिए चीनी सरकार ने डामर वाली पक्की सड़क बना रखी है. लैंडक्रूजर में बैठ कर तीन घंटे में मानसरोवर की परिक्रमा की जा सकती है. लगभग 15 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित मानसरोवर 70 वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसके दिव्य जल का स्वाद जामुन के रस जैसा है. यह गुरला मांधाता पर्वत श्रृंखला से प्रवाहित होकर आता है. कभी इसके किनारे मात्र एक तिब्बती धर्मशाला थी. कुछ वर्ष पहले परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश के स्वामी चिदानंद महाराज (मुनिजी) के प्रयास से वहां एक और छोटी-सी धर्मशाला बनी. मानसरोवर में तेज और ठंडी हवा किसी को भी ज्यादा देर तक उसके किनारे ठहरने की अनुमति नहीं देती.

मानसरोवर में ऑक्सीजन की कमी से सांस जल्दी-जल्दी लेनी पड़ती है और रक्तचाप भी बहुत घट जाता है. इस समस्या से या तो निरंतर प्राणायाम करके या डाइमॉक्स टेबलेट खाकर निबटा जाता है. मानसरोवर के शांत और निर्मल जल की लहरों पर तैरते, लंबी गर्दन वाले राजहंस तपस्वी ऋषि-मुनियों की तरह ही ध्यान-मग्न दिखते हैं. वहां का पूरा परिवेश धवल है, जिसकी उपमा शिव के अट्टहास से दी गयी है, लेकिन इसके लकदक पानी पर तैरते राजहंस अपने अद्वितीय सौंदर्य के कारण आदिकाल से भारतीय मानस को आकर्षित करते रहे हैं.

वह श्रवण पूर्णिमा की रात थी. रात में हवा कम चलने के कारण वातावरण सुखद लग रहा था. पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से आकाश को मद्धिम आलोक से सुशोभित कर रहा था. उसका प्रतिबिंब मानसरोवर के विशाल जल-दर्पण पर पड़ रहा था. तिब्बतियों की मान्यता है कि पूर्णिमा की रात मानसरोवर में स्नान करने के लिए देवगण उतरते हैं. इसलिए, उस रात भारतीय यात्रियों के दल के साथ तिब्बती भी इसके तट पर आ डटे थे. आकाश में विभिन्न प्रकार के अद्भुत दृश्य उपस्थित हो रहे थे, जिन्हें यात्री मुग्ध भाव से देख रहे थे. एक-दो यात्रियों को साक्षात शिव-पार्वती आकाश से उतर कर सरोवर के पवित्र जल में प्रवेश करते दिखायी पड़े. किसी को आसमान से सरोवर में तेज आवाज के साथ कुछ गिरता दिखायी दिया. सभी यात्री एक दिव्य आध्यात्मिक अनुभूति से रोमांचित थे. वैसे भी, श्रवणी पूर्णिमा की सुबह आचारवान ब्राह्मण नदी के नये जल में स्नान कर देव-पितरों, ऋषि-मुनियों, आचार्यो, नदी-पर्वतों का स्मरण करते हैं. इस दिन यदि कोई इसके तट पर गुजारे और रात में देवों की अदृश्य लीला की झलक पा ले, तो उससे भाग्यशाली और कौन हो सकता है!

मानसरोवर में स्नान करना यद्यपि सबके वश की बात नहीं होती, क्योंकि सौ किमी की रफ्तार से चलनेवाली बफीर्ली हवा यदि शरीर के अंदर घुस गयी, तो हार्ट अटैक का डर है. पानी में डुबकी लगाते ही पूरा शरीर अकड़ जाता है. मगर पूरी तरह स्वस्थ और साहसी लोग अपनी आध्यात्मिक शक्ति पर भरोसा रखते हैं. सामान्यत: धूप निकलने के बाद ही लोग स्नान करते हैं. स्नान के बाद लोग सरोवर के पास गुफा में जाकर पूजा-हवन करते हैं. कोई पंडा-पुजारी नहीं. आप स्वयं ईश्वर के इतने समीप हैं कि उन तक पहुंचने के लिए आपको किसी माध्यम की जरूरत ही नहीं. यात्रियों के हवन आदि से बचे सामान तिब्बती स्त्रियां अपने घर ले जाती हैं. इसका पवित्र जल बैगेज में डालकर अपने घर अवश्य ले आइए, क्यों काठमांडू हवाई अड्डे पर सेक्योरिटी वाले इसे फेंक देंगे.

मानसरोवर में कुछ देर भोजन-विश्रम के बाद यात्री कैलाश पर्वत के दर्शन के लिए अष्टपद की ओर रवाना होते है. अष्टपद में दुर्लभ रत्नवाले पत्थर बिखरे पड़े होते हैं, जिन्हें यात्री स्मृति-चिह्न् के रूप में घर ला सकते हैं. इन पर देवी-देवताओं के चित्र भी उत्कीर्ण मिल जाते हैं. अष्टपद से दारचेन और यमद्वार होते हुए कैलाश पर्वत जाया जाता है. मान्यता है कि जो व्यक्ति यमद्वार के भीतर से गुजरता है, उसके मन से मृत्यु का भय हमेशा के लिए निकल जाता है. यहीं से कैलाश पर्वत की जोखिम भरी परिक्रमा शुरू होती है. आगे बढ़ने पर यात्रियों के विश्रम के लिए दिरापुक में चीन सरकार द्वारा यात्रियों की सुविधा के लिए आधार शिविर बनाया गया है. इस घाटी में अनेकों गुफाएं हैं, जिनमें साधक योगी वर्षो से तपस्यारत हैं. यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हिमालय पर्वत श्रृंखला का गौरव और करोड़ों भारतीयों की आस्था का केंद्र कैलाश-मानसरोवर आज पराये घर (चीन) में बंधक पड़ा है.

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