समस्या है सरकारी कर्मियों की लूट

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थाओं में िकसी भी तरह का आरक्षण लागू न करने की जरूरत की तरफ संकेत किया है. लेकिन यह छोटी समस्या है. इन संस्थाओं में आरक्षण हो जाये तो समाज को अधिक नुकसान नहीं होता है. बस कुछ अक्षम छात्र-छात्राओं को दाखिला मिल जाता है. लेकिन, […]
डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थाओं में िकसी भी तरह का आरक्षण लागू न करने की जरूरत की तरफ संकेत किया है. लेकिन यह छोटी समस्या है. इन संस्थाओं में आरक्षण हो जाये तो समाज को अधिक नुकसान नहीं होता है. बस कुछ अक्षम छात्र-छात्राओं को दाखिला मिल जाता है. लेकिन, इस आरक्षण की तुलना में सरकारी नौकरियों में आरक्षण का बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा है.
बहुत से सरकारी कर्मियों द्वारा देश को लूटा जा रहा है और इस लूट में शामिल होने के लिए देश के युवा आगे आ रहे हैं. फलस्वरूप पूरे देश को आरक्षण के बवाल से जूझना पड़ रहा है. डॉ आंबेडकर ने आरक्षण की मांग इसलिए की थी कि पिछड़े वर्ग का सर्वांगीण विकास हो, लेकिन आज आरक्षण का स्वरूप विकृत हो गया है.
कुछ मनीषियों का मानना है कि पिछड़ी जातियों से नियुक्त सरकारी कर्मचारीयों द्वारा अपने कमजोर भाइयों को मदद पहुंचायी जायेगी. परंतु प्रत्यक्ष अनुभव बताता है कि पिछड़ी जातियों से चुने गये कर्मियों का झुकाव ऊपरी जातियों से जुड़ने का होता है. हाल में मैं गुजरात के डांग जिले के आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासियों की रामायण के बारे में मान्यता का अध्ययन कर रहा था.
मित्रों ने पिछड़ी जातियों से बने दो प्रोफेसरों का नाम लिया, परंतु फिर कहा कि वे आदिवासी विरासत को तुच्छ मानते हैं. प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास ने इस प्रवृत्ति को संस्कृताइजेशन की संज्ञा दी थी. उनका कहना था कि हर समाज में कमजोर वर्ग का प्रयास रहता है कि उच्च वर्ग में शामिल हो जाये. अतः सरकारी नौकरी में आरक्षण का सामाजिक न्याय से कुछ लेना-देना नहीं है. एकमात्र एवं सीधा उद्देश्य सरकारी नौकरियों द्वारा प्रदत्त सुविधाओं पर कब्जा करना है.
नयी दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट फॉर स्टडी इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के अनुसार, 2007-08 में प्राइवेट नौकरी में औसत आय 46,802 रुपये प्रतिवर्ष थी. भारत सरकार द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इसी वर्ष में सार्वजनिक क्षेत्र में औसत आय 4,10,898 रुपये थी. सरकारी कर्मियों की आय लगभग नौगुना थी. इसके अतिरिक्त घूस से भारी आय होती है.
दूसरे देशों में ऐसा नही है. रीजन फाउंडेशन द्वारा किये गये अध्ययन में पाया गया कि अमेरिका में सरकारी कर्मी के वेतन प्राइवेट कर्मी से 11 प्रतिशत कम हैं. कुछ वर्ष पूर्व मैंने विश्व बैंक द्वारा कराया गया एक अध्ययन देखा था. पाया गया था कि भारत के सरकारी कर्मियों की आय आम आदमी की आय से पांच गुनी थी. अपने देश में सरकारी कर्मियों की इस लूट ने पांचवें वेतन आयोग के बाद विशेष रंग पकड़ा है. पांचवें तथा छठवें वेतन आयोगों ने वेतन वृद्धि की सिफारिश इस आधार पर की थी कि कर्मी की जीविका के लिए आवश्यक वेतन उसे उपलब्ध कराया जाना चाहिए.
जैसे एक कर्मी को एक कार, दो बच्चों की पब्लिक स्कूल में फीस, बेटी की शादी के लिए सोने की खरीद, रिटायरमेंट के बाद अपने मकान में बसने के लिए हाउसिंग लोन का पेमेंट इत्यादि की गणना करके वेतन की संस्तुति की गयी थी. विद्वानों ने यह नहीं पूछा कि आम आदमी बिना कार के कैसे जीविका चलाता है?
लुटेरों की लाइन में शामिल होने को आतुर जाति आधारित आंदोलनों का कोई धर्म नहीं होता. इसलिए आरक्षण की समस्या का समाधान आरक्षण के बंटवारे में उलटफेर करके नहीं निकाला जा सकता है. आरक्षण की समस्या का एकमात्र निदान है कि सरकारी अिधकािरयों की लूट बंद हो. हम अमेरिका से फास्ट फूड, लक्जरी चीजें तथा ड्रग्स आदि का आयात कर रहे हैं.
सरकारी कर्मियों को आम आदमी से 11 फीसदी कम वेतन देने की व्यवस्था का भी आयात कर लें, तो समस्या खत्म हो जायेगी. लोगों के लिए सरकारी कर्मी बनने का आकर्षण खत्म हो जायेगा और ये आंदोलन भी फुस्स हो जायेंगे. अमेरिका में अश्वेतों द्वारा सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए आंदोलन नहीं किया जाता है. ऐसा ही भारत में होने लगेगा.
सातवें वेतन आयोग को आदेश देना चाहिए कि सरकारी कर्मियों के वेतन आम आदमी की आय से अनुपात में किये जायें. आरक्षण का मुद्दा लूट के बंटवारे का है, न कि जातीय न्याय का. लूट बंद कर दें, तो ये आंदोलन समाप्त हो जायेंगे.
उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण समाप्त करने की वकालत कर सुप्रीम कोर्ट ने मूल समस्या की अनदेखी कर दी है. जरूरत सरकारी कर्मियों की लूट पर अंकुश लगाने की है. आरक्षण की ऊपरी परत पर प्रहार करने के स्थान पर मुख्य समस्या पर प्रहार की जरूरत है. (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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