लड़कियों के लिए पिता का साया

Updated at : 04 Nov 2015 4:12 AM (IST)
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लड़कियों के लिए पिता का साया

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार यह एक संयोग है कि वे तीनों ही ब्राह्मण थीं. लेकिन गरीबी की शायद कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, औरतों की तरह ही. वे एक ही दफ्तर में थीं. तीनों काम को लेकर संजीदा थीं.यही वजह थी कि तीनों ही अपने-अपने क्षेत्र में उच्च पदों पर पहुंचीं. अकसर […]

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क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

यह एक संयोग है कि वे तीनों ही ब्राह्मण थीं. लेकिन गरीबी की शायद कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, औरतों की तरह ही. वे एक ही दफ्तर में थीं. तीनों काम को लेकर संजीदा थीं.यही वजह थी कि तीनों ही अपने-अपने क्षेत्र में उच्च पदों पर पहुंचीं. अकसर साथ खाती-पीती थीं और जब-तब अपने बचपन की बातें भी करती थीं.

कैसा भीषण बचपन था उनका! हर तरह की मुसीबतों से भरा हुआ. ऐसा लगता कि बेशक वे अलग-अलग जगहों, परिवारों में पली-बढ़ीं, पर जीवन ने आफतें एक जैसी ही सौंपीं. कैसा साम्य था कि उन तीनों के पिता बचपन में गुजर गये थे.

कहीं परिवारों की जिम्मेवारी न उठानी पड़ जाये, इसलिए संयुक्त परिवार के लोगों ने भी किनारा करना ही बेहतर समझा. परिवार की चल-अचल संपत्तियों में से जो कुछ भी मिल सकता था, वह भी हड़प लिया गया. इन लड़कियों के हिस्से अभाव और गरीबी आयी. बस माताओं और भाई-बहनों का सहारा मिला, जो ताउम्र चलता रहा. इनकी माताओं को परिस्थितियों ने जुझारू और कर्मठ बना दिया था.

यही सीख इन्हें भी उनसे मिली. पैसे और साधनों का अभाव हमेशा मुंह चिढ़ाता था. मगर यही अभाव यह भी कहता था कि पढ़ो और जल्दी अपने पांवों पर खड़ी हो जाओ. दिल्ली जैसे शहर ने इस भावना को न केवल बढ़ाया, बल्कि आगे बढ़ने के अवसर भी दिये.

नौकरी मिली तो पैसे की ताकत समझ में आयी. यह भी कि कल तक पिता के न रहने से जो नातेदार पहचानते नहीं थे, वे भी अपनी लड़कियों को इन जैसा बनने के लिए कहने लगे. परिवार की जिम्मेवारी उठाने के समर्पण की तारीफ करने लगे. लेकिन, अब उनकी तारीफ कांटे की तरह चुभती. मुसीबत के वक्त वे हलका सा भी हाथ थामते, तो शायद इतनी आफतें हर रोज इनके घर की कुंडी न खटखटातीं. इन तीनों को मामूली फीस के लिए भी लोगों के हाथ-पांव न जोड़ने पड़ते.

गरीबी कितना कुछ सिखा देती है. इन तीनों में से एक बताती थी कि उसने अपनी पढ़ाई के साथ भाई-बहनों को पालने के लिए फैक्ट्री में हाड़-तोड़ मेहनत की थी. बस के किराये में पैसे न खर्च हों, इसके लिए लंबी-लंबी दूरियां पैदल ही तय की थीं.

दूसरी बताती कि कैसे महीने में कोई मनपसंद चीज खाने के लिए एक रुपया मिलता था और उसी दिन से अगले महीने का इंतजार शुरू हो जाता था. पुरानी बातें सोच कर इनकी आंखें गीली हो जातीं, पर यह संतोष भी मिलता है कि जीवन ने कठिनाइयां दीं, तो उनसे लड़ने का हौसला भी. यह सीख भी कि लड़कियों के जीवन में यदि परिवार अड़ंगा न लगाएं, उनके काम की अहमियत को समझें, तो वे बड़ी से बड़ी विपत्ति को चुनौती देने के लिए तैयार हो जाती हैं, न केवल खुद आगे बढ़ती हैं, बल्कि परिवार को भी आगे बढ़ाती हैं.

सार्वजनिक बहसों में अकसर पितृसत्ता को औरतों के विकास के लिए बुरा माना जाता है, मगर जिन लड़कियों के पिता बचपन में ही गुजर जाते हैं, उन पर यह समाज किस तरह के कहर ढाता है, यह उन लड़कियों से अच्छा कोई नहीं बता सकता, जिनके सिर से बचपन में ही पिता का साया उठ जाता है.

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